मोदी सरकार - 2.0 के 100 दिन

[अवधेश कुमार]। प्रियंका वाड्रा ने कांग्रेस मुख्यालय में बतौर महासचिव छह फरवरी से बैठना आरंभ कर दिया। यह संयोग है या जानबूझकर अपनाई गई रणनीति कि जिस दिन उनके पति रॉबर्ट वाड्रा की कथित विदेशी संपत्तियों के मामले में न्यायालय के आदेश से प्रवर्तन निदेशालय ने पहली पूछताछ की उसी दिन उन्होंने अपना कार्यभार ग्रहण किया।

क्या इसका उद्देश्य यह संदेश देना था कि उनके प्रत्यक्ष राजनीति में आने के कारण ही परेशान किया जा रहा है। बहरहाल यह प्रश्न अपनी जगह है कि आगे इसमें क्या होगा, किंतु बतौर महासचिव एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के प्रभारी के रूप में उनका क्या प्रभाव होगा या कांग्रेस के भविष्य को देश भर में वह कितना संवार पाएंगी इसके अब ठोस आकलन का समय आ गया है।

प्रियंका को महासचिव बनाए जाने यानी प्रत्यक्ष राजनीति में लाए जाने को लेकर खूब बहस चल रही है। 2019 का चुनाव कांग्रेस के लिए करो-मरो का प्रश्न है। इसमें वह अपने सारे शस्त्र आजमाएगी। प्रियंका नामक अस्त्र को कांग्रेस ने बचाकर रखा था। हालांकि इसका उपयोग कहां और कब करना है इसकी कोई स्पष्ट कल्पना किसी के मन में रही हो यह भी सच नहीं है। वैसे भी इसका फैसला सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी को ही करना था। जिस तरह राहुल ने इस फैसले को गोपनीय रखा तथा अमेठी में घोषणा की, उसका अर्थ यही था कि वह रणनीति के तहत एक संदेश देना चाहते थे।

वैसे राहुल गांधी के 2004 के आम चुनाव में उतरने के समय कांग्रेस के अंदर जैसा उत्सव मनाया गया था या 2007 में उनके महासचिव तथा पिछले वर्ष अध्यक्ष बनाए जाने पर जो कांग्रेस में माहौल था वैसा इस समय नहीं दिखा। शायद कांग्रेस प्रियंका को लेकर ऐसा माहौल निर्मित नहीं करना चाहती जिससे राहुल गांधी की आभा फिकी पड़ जाए। राहुल गांधी कांग्रेस का चेहरा हैं तो उनको सबसे ऊपर रखना रणनीति के लिहाज से आवश्यक है। इसलिए प्रियंका के आगमन को उत्सव नहीं बनने दिया गया।

प्रियंका और कांग्रेस के भविष्य का आकलन करते समय इस पहलू की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह एक ऐसा पहलू है जिसका असर लंबे समय तक रहेगा। पार्टी के नेता राहुल गांधी होंगे और प्रियंका की भूमिका फिलहाल सहयोगी तक ही सीमित रखी जाएगी। पूर्वी उत्तर प्रदेश का उन्हें प्रभारी बनाने से यह गलतफहमी नहीं होनी चाहिए कि प्रियंका की अखिल भारतीय भूमिका होगी ही नहीं।

पार्टियों में नेताओं को किसी एक प्रांत या उसके भाग का प्रभारी बनाया जाता है, पर पद के अनुरूप उनकी शेष भूमिकाएं कायम रहती हैं। इसलिए प्रियंका की भूमिका राहुल गांधी के सहयोगी के रूप में हर स्तर पर होगी। राहुल ने स्पष्ट कर दिया कि प्रियंका पूरे देश में काम करेंगी। किंतु लोकसभा चुनाव से लेकर आगामी विधानसभा चुनाव तक शायद उनका मुख्य फोकस यूपी ही होगा। चूंकि यूपी सर्वाधिक सांसद देता है, लिहाजा कांग्रेस का अपने तुरूप के पत्ते को वहां केंद्रित करना स्वाभाविक है।

वास्तविक तस्वीर और चुनौतियां
कांग्रेस लंबे समय से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अपने खोए हुए जनाधार को पाने के लिए व्याकुल है, पर उसे हर बार निराशा मिलती है। कांग्रेस के लिए राष्ट्रीय स्तर का चुनावी अंकगणित बदलने की संभावना जिन कुछ प्रदेशों में बाधित है, उत्तर प्रदेश उसमें सबसे ऊपर है। उसे वहां भाजपा की संख्या को नीचे लाने तथा स्वयं ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश करनी होगी। यह यूं ही नहीं हो सकता। तो एक ओर प्रियंका एवं दूसरी ओर ज्योतिरादित्य सिंधिया को लगा दिया गया है। पूर्वी उत्तर प्रदेश का विस्तार कांग्रेस बलिया से लखनऊ तक करती है। यानी प्रियंका के जिम्मे करीब 42 सीटें आती हैं। 2009 में कांग्रेस द्वारा जीती गई 21 सीटों में 15 इसी क्षेत्र से थी। कांग्रेस कल्पना कर सकती है कि अगर वह 2009 की अवस्था में आ जाए तो सत्ता की दावेदारी ज्यादा दमदार हो सकती है। इसलिए कांग्रेस उस क्षेत्र पर फोकस करे, यह बिल्कुल सही रणनीति है। वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, दोनों उप-मुख्यमंत्री, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र पांडे, भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष वीरेंद्र सिंह, वजनदार केंद्रीय मंत्री मनोज सिन्हा जैसे नेता उसी क्षेत्र से हैं। इन चेहरों का सामना करने के लिए कांग्रेस के पास कोई दूसरा व्यक्ति है भी नहीं। इसमें प्रियंका उपयुक्त लग सकती हैं।

हालांकि यह अलग बात है कि पार्टी की चाहत और जमीनी यथार्थ में कई बार काफी अंतर रहता है। ध्यान रखिए 2009 में जब कांग्रेस की झोली में 206 सीटें आईं थी, उसके खाते में 28.56 प्रतिशत मत थे। वर्ष 2004 में भी 145 सीटें उसे मिलीं थी तो उसका आधार 26.53 प्रतिशत मत था। वर्ष 1999 में कांग्रेस ने जब 114 सीटें जीती थीं तब भी उसे 28.3 प्रतिशत मत मिला था। अगर उसे 150 तक भी जाना है तो मतों में भारी छलांग चाहिए। जहां तक उत्तर प्रदेश का प्रश्न है तो पिछले लोकसभा चुनाव में वहां उसे केवल 7.53 प्रतिशत मत मिला था और 2017 विधानसभा चुनाव में 6.2 प्रतिशत। हाल के चुनावों में कांग्रेस का सबसे बढ़िया प्रदर्शन 2009 में हुआ जब उसने 21 सीटें जीतीं। तब उसे मिले थे 18.25 प्रतिशत मत। 2004 में उसे 12.04 मत और नौ सीटें मिली थीं। वर्ष 1999 में उसने 14.72 प्रतिशत मत पाकर 10 सीटें जीती थीं। ये अंकगणित सामने लाना इसलिए आवश्यक है ताकि प्रियंका के आने से अतिउत्साह में पड़े कांग्रेस के समर्थकों के सामने वास्तविक तस्वीर और उतुंग चुनौतियों का आईना आ जाए। मतों के पायदान पर इतनी बड़ी छलांग प्रबल मोदी विरोधी तथा कांग्रेस के अनुकूल लहर में ही संभव है। निष्पक्ष आकलन करने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं कह सकता कि ऐसी लहर इस समय है। इसका आभास कांग्रेस नेतृत्व को भी है।

क्षमता साबित करना शेष
ये सारे परिणाम तब हैं जब बसपा और सपा अलग-अलग थे। अगर वो एक साथ होते तो पता नहीं कांग्रेस कहां होती। वर्ष 2014 में मोदी लहर के तर्क को स्वीकार कर आंकड़ों को छोड़ भी दें तो उसके पहले एवं बाद के अंकगणित को तो आधार बनाना ही होगा। प्रियंका गांधी वहां क्या कर सकतीं हैं इस बारे में कुछ भी कहना कठिन है। उनकी राजनीतिक क्षमता और प्रतिभा या सोच का संपूर्ण आभास देश को नहीं है। प्रियंका को हमने अभी तक अपनी मां एवं भाई के क्षेत्र रायबरेली और अमेठी संभालते देखा है। वहां चुनाव प्रबंधन से लेकर प्रचार अभियान, बीच में जनसंपर्क आदि उनके जिम्मे रहा है। हिंदी का प्रवाह उनका बेहतर है। सच यही है कि उनके अंदर कोई विशेष राजनीतिक क्षमता है इसका प्रमाण अभी तक नहीं मिला है। यह कल्पना कि उनमें इंदिरा गांधी की छवि दिखती है जिसका मतदाताओं पर चमत्कारिक असर होगा, व्यावहारिक धरातल पर नहीं ठहरता। 1984 में इंदिरा जी की हत्या हो गई। 45 तक की उम्र वालों को तो उनकी याद भी नहीं होगी।

सपा-बसपा से जुड़ा विरोधाभास
प्रियंका आज भले ही कांग्रेस की नजर में सुरक्षित मारक अस्त्र हैं, परंतु समय के अनुरूप चुनावी अंकगणित के उतुंग लक्ष्य को इससे वेध पाना फिलहाल दूर की कौड़ी लगती है। अगर उनको अपेक्षित सफलता नहीं मिलती है तो विरोधी बंद मुट्ठी लाख की खुल गई तो खाक की, जैसी कहावतों से उनका उपहास भी उड़ा सकते हैं। अगर प्रियंका मां सोनिया के क्षेत्र रायबरेली से लड़ती हैं, तो इसका असर आसपास के क्षेत्रों में होगा। उसमें अगर ब्राह्मण सहित अगड़ी जातियों के थोड़े मतदाता आकर्षित होंगे तो मुस्लिम भी। कांग्रेस का कुछ मत प्रतिशत बढ़ जाए, लेकिन 2009 की पुनरावृत्ति नहीं दिखती। राहुल की सपा-बसपा के प्रति नरम नीति से प्रियंका इन दलों के विरुद्ध कुछ बोल नहीं पाएंगी। वस्तुत: प्रियंका की आभा और क्षमता का आकलन तभी हो सकता है जब उत्तर प्रदेश ही नहीं देश भर में उनको स्वतंत्र रूप से काम करने दिया जाए। अभी तक तो उनको सीमा में ही बांधे रखने का संकेत है ताकि राहुल गांधी के एकल नेतृत्व पर मनौवैज्ञानिक खरोंच तक न आए।

प्रियंका के भाषण से हारे अरुण नेहरू
प्रियंका को पहली बार 1999 में लोगों ने भाषण देते हुए सुना। उस समय अमेठी में कांग्रेस से सतीश शर्मा तथा भाजपा से अरुण नेहरू उम्मीदवार थे। उन्होंने अपने भाषण में कहा, ‘आपने उस व्यक्ति को कैसे जिताया जिसने हमारे पिता को धोखा दिया।’ अरुण नेहरू चुनाव हार गए। अरुण नेहरू ने स्वीकार किया था, ‘प्रियंका के भाषण के प्रभाव को मैं कमजोर नहीं कर सका।’ हालांकि उनके एक भाषण का कितना प्रभाव पड़ा इसका अध्ययन किसी ने नहीं किया है। दरअसल उस समय भाजपा पूरे उत्तर प्रदेश में विभाजन का शिकार थी। कल्याण सिंह नाराज थे। भाजपा को राज्य में केवल 25 सीटें मिली थीं।

गाड़ी की छत पर भाई-बहन का रोड शो
वर्ष 2002 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी एवं राहुल गांधी के कई रोड शो कराए गए। दोनों भाई-बहन एक गाड़ी की छत पर बैठे रहते थे और हाथ हिलाते थे। कांग्रेस के लोगों ने माहौल ऐसा बनाया मानो उसके उद्धार का समय आ गया। कांग्रेस के परंपरागत समर्थकों की बातचीत में उत्साह दिखता भी था। यह बात सही है कि उनके रोड शो में सड़कों के दोनों ओर लोग दिखाई देते थे, किंतु चुनाव परिणामों में कांग्रेस जहां थी वहीं रहीं। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनावों में भी प्रियंका की भूमिका ज्यादा नहीं थी।

वर्ष 2014 के चुनाव में मोदी की तीखी आलोचना
प्रियंका वाड्रा को सबसे ज्यादा रायबरेली एवं अमेठी में सक्रिय देखा गया है। वर्ष 2014 के आम चुनाव में उनकी नुक्कड़ सभाएं हमने खूब देखी। वह भी अन्य कांग्रेसी नेताओं की तरह नरेंद्र मोदी की आलोचना करतीं थीं, लेकिन सामान्य तरीके से। हालांकि महिलाओं की एक छोटी सभा में उन्होंने नरेंद्र मोदी की कुछ तल्ख आलोचना कर दी और मीडिया की कृपा से यह देश भर में फैल गया। इसका नकारात्मक असर ज्यादा हुआ। माना जाता है कि उत्तर प्रदेश के लोगों ने इस आलोचना को पसंद नहीं किया। कांग्रेस केवल दो सीटों तक सिमट गई। उसमें भी अमेठी वह किसी तरह जीत पाई। 2017 के विधानसभा चुनाव में भी वह यहां सक्रिय थीं, किंतु भाजपा ने यहां एकपक्षीय जीत हासिल की।

प्रचार और सोशल मीडिया समन्वय
वर्ष 2014 के चुनाव में प्रियंका केंद्रीय स्तर पर सक्रिय थीं। वह चुनावी रणनीति बनाने की बैठकों का हिस्सा होती थीं। घोषणा पत्र तैयार करने की बैठकों में शामिल होती थीं। उम्मीदवारों के चयन में भी उनकी बात चल रही थी। हालांकि इसमें उनका दखल ज्यादा नहीं था। सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी की सभाएं कहां-कहां होंगी इसे तय करने में उनकी प्रमुख भूमिका थी। प्रचार विभाग के साथ उनका लगातार समन्वय था। सोशल मीडिया संभालने वाले टीम को वह दिशानिर्देश देती थीं। इस तरह भले उन्हें कोई पद नहीं दिया गया था, लेकिन वह कांग्रेस की शीर्ष नीति-निर्धारण का हिस्सा थीं।
[वरिष्ठ पत्रकार]

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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