यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Mar 28, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
राजनीतिक पार्टियों को आखिर क्यों चाहिए विदेशी चंदे की जांच से छूट
RTI के तहत मिली जानकारी में आयोग ने कहा कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को ...और पढ़ें

नई दिल्ली [प्रेम प्रकाश]। आज ‘तथ्य’ पर ‘छवि’ हावी हो रही है। यह काम राजनीति से लेकर बाजार तक हर क्षेत्र में हो रहा है। देश में जिस तरह की लोकतांत्रिक व्यवस्था अभी चल रही है, उसे लेकर लोगों की आंखों में जो छवियां बन रही हैं, वे सच्चाई से काफी दूर हैं। राजनीतिक या चुनाव सुधार की बड़ी दरकार को दरकिनार कर केंद्र सरकार और करीब सभी सियासी पार्टियां कैसे अपनी सहूलियत का रास्ता बुहारने में लगी हैं, इसकी मिसाल हाल ही में लोकसभा में देखने को मिली। केंद्र सरकार ने जो नई विधिक उदारता दिखाई है उसके तहत राजनीतिक दलों को 1976 के बाद मिले विदेशी चंदे की जांच अब नहीं हो सकेगी। दिलचस्प यह कि यह सब संसद में न सिर्फ आनन-फानन में हुआ, बल्कि इस संबंध में कानून में संशोधन को लोकसभा ने बिना किसी चर्चा के पारित कर दिया।
21 संशोधनों को मंजूरी
दरअसल वित्त विधेयक 2018 में सरकार ने जिन 21 संशोधनों को मंजूरी दी है, उनमें से एक संशोधन विदेशी चंदा नियमन कानून 2010 से संबंधित है। यह कानून विदेशी कंपनियों को देश के राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता है। मोदी सरकार ने पहले वित्त विधेयक 2016 के जरिये भी विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) में संशोधन किया था ताकि राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेना आसान हो। अब 1976 से ही राजनीतिक दलों को मिले चंदे की जांच की संभावना को समाप्त करने के लिए इसमें आगे और संशोधन कर दिया गया है। इससे भाजपा और कांग्रेस देश की दोनों ही बड़ी पार्टियों को 2014 के दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले से बचने में मदद मिलेगी, जिसमें उनको एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।
मामला यहीं नहीं रुकने वाला
लगता है कि राजनीतिक नैतिकता और पारदर्शिता का यह मामला यहीं नहीं रुकने वाला। चुनाव सुधार के लिए लगातार संघर्ष कर रही संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म (एडीआर) का कहना है कि वह इस कदम को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी। महत्वपूर्ण है कि कांग्रेस और भाजपा दोनों के खिलाफ एक विदेशी कंपनी की भारत स्थित शाखा से चंदा लेने का मामला 2013 में सामने आया था, जिसके बाद मार्च 2014 में दिल्ली हाइकोर्ट ने दोनों पार्टियों को विदेशी मुद्रा विनिमय कानून 1976 का दोषी पाया। दोनों पार्टियों ने यह चंदा 2009 और उससे पहले के सालों में लिया था। हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग से इस मामले में कदम उठाने को कहा। उसके बाद आयोग की ओर से इस मामले को गृह मंत्रलय को कार्रवाई के लिए भेजा गया, लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर कोई उचित कार्रवाई करने के बजाय इस पूरे मामले को कानूनी अड़चन से निकालने का नया जुगाड़ निकाला।
विदेशी कंपनी राजनीतिक दलों को दे सकती है चंदा
चिंता इस बात को लेकर भी है कि अब कोई भी विदेशी कंपनी राजनीतिक दलों को चंदा दे सकती है, जिसकी जांच भी नहीं होगी। सरकार की चालाकी इस रूप में भी दिखती है कि वह इस बिल को फाइनेंस बिल के रूप में लेकर आई, जिससे राज्यसभा में भी इसको अब नहीं रोका जा सकेगा। भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबना ही है कि इसकी पालकी ढोने वाले लगातार नैतिकता के मोर्चे पर विफल हो रहे हैं। सियासी जमात देश की जनता की उस लोकतांत्रिक आस्था और ललक को लगातार दरकिनार कर रहे हैं, जिसमें जनाधार के बूते राजनीति करने की चुनौती शामिल है। धनबल और बाहुबल के बूते जनमत का दावा एक बड़े लोकतांत्रिक झांसे से ज्यादा कुछ नहीं है।
लोकतांत्रिक सशक्तीकरण
21वीं सदी के दूसरे दशक में लोकतांत्रिक सशक्तीकरण के लिए जब सिविल सोसाइटी देश में सड़कों पर उतरी और सरकार के पारदर्शी आचरण के लिए अहिंसक प्रयोगों को आजमाया गया तो इस बदले सूरते हाल को एक क्रांतिकारी संभावना के तौर पर हर तरफ देखा गया। मीडिया में तो खासतौर पर इसकी चर्चा रही। अमेरिका और यूरोप से निकलने वाले अखबारों में कई लेख छपे कि भारत में फिर से गांधीवादी दौर की वापसी हो रही है, लोकतांत्रिक संस्थाओं की वित्तीय पारदर्शिता और उनके सांगठनिक विकेंद्रीकरण के लिए बड़ा जनमत तैयार हो रहा है। उसने जयप्रकाश आंदोलन के बाद फिर से एक बार देश की सियासी जमातों के आगे यह सवाल रखा कि चुनाव लड़ने का खर्च जब आम जनता की हैसियत से बाहर होगा तो फिर देश की राजनीतिक प्रक्रिया में सामान्य और नए लोगों का प्रवेश कैसे होगा? क्या लोकतंत्र में जनता की भूमिका सिर्फ एकदिनी मतदान प्रक्रिया में शिरकत करने भर से ही पूरी हो जाती है?
करमुक्त राशि का विवरण आयोग के पास नहीं
देश को आर्थिक प्रगति और शुचिता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल खुद अपने सांगठनिक ढांचे में भी कितने लोकतांत्रिक और पारदर्शी हैं, इसकी एक मिसाल कुछ माह पहले आया चुनाव आयोग का वह वक्तव्य है, जिसमें कहा गया है कि राजनीतिक दलों को कितना चंदा करमुक्त राशि के रूप में प्राप्त होता है, इसका विवरण उसके पास उपलब्ध नहीं है। सूचना का अधिकार कानून के तहत मिली जानकारी में आयोग ने कहा कि मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय दलों और राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में प्राप्त हुई राशि का विवरण आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध है, लेकिन राजनीतिक दलों को चंदे के रूप में प्राप्त करमुक्त राशि का विवरण आयोग के पास नहीं है। एडीआर ने गत वर्ष पिछले चार साल में राजनीतिक दलों को मिले चंदे का विश्लेषण किया है।
85 फीसद चंदा कॉरपोरेट कंपनियों से आता है
उसके मुताबिक भाजपा का 92 फीसद और कांग्रेस का 85 फीसद चंदा कॉरपोरेट कंपनियों से आता है। इन चार वर्षो में कॉरपोरेट एवं व्यापारिक घरानों ने पांच राष्ट्रीय पार्टियों को कुल 956.77 करोड़ रुपये का चंदा दिया। वित्त वर्ष 2012-13 से 2015-16 के बीच चार वर्ष में भाजपा को 705 करोड़, जबकि कांग्रेस को 198 करोड़ रुपये का कॉरपोरेट चंदा मिला। भाकपा और माकपा को सबसे कम कॉरपोरेट चंदा मिला, जो क्रमश: चार फीसद और 17 फीसद है। साफ है कि कुबेरी प्रबंधन के बूते चुनाव जीतने को लेकर राजनीतिक दलों के बीच व्यापक स्वीकृति है। वे इस स्वीकार को अस्वीकार कर जनता की अदालत में खड़ा होने का नैतिक साहस बहुत पहले खो चुके हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)
