लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) ओपी कौशिक। वर्ष 1962 के युद्ध में बेशक भारत को चीन से पराजय का सामना करना पड़ा था, मगर यह सैन्य नहीं एक राजनीतिक पराजय थी। भारत हिंदी-चीनी भाई-भाई के नारे में खोया हुआ था और चीन ने विश्वासघात कर भारत पर प्रहार किया। तब तिब्बत की ऊपरी पहाड़ियों पर चौकसी शून्य थी और इसकी निगरानी महज 175 पुलिस कर्मियों के भरोसे थी। मगर, अब चीन को इसके बाद के इतिहास और आज के भारत को भी याद करना चाहिए। चीन को नहीं भूलना चाहिए कि 1962 के पांच साल के भीतर ही हमारे जवानों ने वर्ष 1967 में उनके दुस्साहस का जवाब नाथू ला दर्रे पर किस तरह दिया था।

इसके बाद एक अक्टूबर 1967 को चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी ने चाओ ला इलाके में फिर भारत के सब्र का इम्तिहान लिया, मगर वहां पर मुस्तैद 7/11 गोरखा राइफल्स और 10 जैक राइफल्स नामक भारतीय बटालियन ने फिर चीन को खदेड़ दिया। दो दशक खामोश रहने के बाद वर्ष 1987 में चीन फिर अपनी हरकत पर वापस आ गया और इस दफा भारत ने ऑपरेशन फाल्कन तैयार कर लिया था। भारतीय सेना के ऊंचे मनोबल को देखते हुए चीन को फिर कदम पीछे खींचने पड़े थे। डोकलाम में फिर चीन ने अपनी हेकड़ी दिखाई और पूरी दुनिया गवाह है कि इस मोर्चे पर क्या हुआ। अगर अब तीनों सेनाओं की बात करें तो भारत के आगे निकटतम प्रतिद्वंदियों में पाकिस्तान कहीं नहीं ठहरता और चुनौती सिर्फ चीन से है।

हमारी सेना पृथ्वी पर लड़ी जाने जाने वाली लड़ाइयों के लिए दुनिया की सर्वश्रेष्ठ सेनाओं में गिनी जाती है। सेना के नेटवर्क को बढ़ाने के लिए सामरिक महत्व वाली सड़कों का निरंतर विस्तार किया जा रहा है। अब नौसेना की बात करें तो कई मुकाबले में हमारी सेना चीन से बेहतर स्थिति में खड़ी है। युद्धपोत, विमान वाहक युद्धपोत, लड़ाकू युद्धपोत, विध्वंसक युद्धपोत, छोटे जंगी जहाज, पनडुब्बियां, गश्ती युद्धपोत और समुद्री बेड़े में हमारी सेना कहीं भी कम नहीं है। वायुसेना की क्षमता में भी हम किसी भी मुकाबले कमतर नहीं हैं। हालांकि हमें स्क्वाड्रन की क्षमता में बढ़ोतरी करने की जरूरत है। फिर भी मिराज-2000, मिग-29, सी-17 ग्लोबमास्टर मालवाहक विमान, सी-130जे सुपर हरक्यूलिस जैसे मालवाहक विमानों के अलावा हमारे पास सुखोई-30 जैसे लड़ाकू विमान भी हैं, जो तीन हजार किलोमीटर दूर तक मार कर सकते हैं और लगातार पौने चार घंटे तक हवा में रह सकते हैं।

इसके अलावा हमारे पास ब्रह्मोस जैसी जबरदस्त मिसाइल भी है, जिसकी रफ्तार 952 मीटर प्रति सेकंड है। इसके सामने दुश्मन के रडार भी फेल हो जाते हैं। हाल में राफेल और रूस के साथ हवाई रक्षा प्रणाली एस-400 की डील से हमारी सेना को नई ताकत मिलेगी, जिसकी मदद से दुश्मनों की मिसाइलों को मार गिराने के मामले में देश की क्षमता में विस्तार हो सकेगा। हालांकि जिस तरह चीन की घुसपैठ लगातार बढ़ रही है, उसे देखते हुए देश के रक्षा में बजट में इजाफा करने की भी जरूरत है। पिछला बजट जीडीपी का महज 1.78 फीसद था, जिसे बढ़ाकर अब तीन फीसद तक करने की जरूरत है। बजट बढ़ने पर ही देश की सेनाओं को हर तरह के अत्याधुनिक हथियारों से लैस किया जा सकेगा। फिर भी इस बात में कोई संदेह नहीं है कि हमारी सेना बेहद क्षमतावान है और किसी भी मोर्चे पर दुश्मन को मुहंतोड़ जवाब दे सकती है।

ताकत के साथ आ रहा है तेवर

लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) कमलजीत सिंह। पिछले कुछ सालों में भारतीय सेना न सिर्फ हाईटेक हुई है, बल्कि उसके तेवर भी बदले हैं। भारत सरकार ने भी सैन्य तैयारी को लेकर अपना नजरिया बदला है, बावजूद इसके अभी भी काम करने की जरूरत है। देश के बजट का एक बड़ा बजट हथियारों की खरीदफरोख्त में देश के बाहर जा रहा है। पिछले कुछ सालों के मुकाबले में देखें, तो भारत ने काफी तेजी से अपनी सैन्य शक्ति में विकास किया है। अभी रूस से एस -400 रक्षा प्रणाली खरीदने का बड़ा समझौता किया है, इससे पहले फ्रांस से रॉफेल लड़ाकू विमान खरीदने का समझौता हुआ, यह सब बड़े रक्षा सौदे हैं। इससे पहले सेना ने परमाणु पनडुब्बी आइएनएस चक्र, सुपरसोनिक ब्रह्मोस क्रूज मिसाइल, टी-72 और टी -90 जैसे टैंकों को अपने सामरिक बेड़े में शामिल किया है। डोकलाम विवाद में पूरी दुनिया ने देखा है कि कैसे हमारे सैनिक बार्डर पर डटे रहे।

 म्यांमार और पाकिस्तान की सीमाओं के अंदर जाकर हमारे सैनिकों ने सर्जिकल कर अपने हौसले को दिखाया है। हमारी सेना हाईटेक जरूर हुई है, लेकिन हमें सामरिक हथियारों के लिए अपनी विदेशी निर्भरता कम करनी होगी, हमें दुनिया के अन्य देशों की तरह स्वदेशी टेक्नोलॉजी और स्वदेशी हथियारों को बनाने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ना होगा। इसके अलावा अभी भी हम चीन के मुकाबले अपना बुनियादी ढांचा मजबूत करने की दिशा में काफी पीछे हैं। मुझे लगता है कि अभी हमें इस दिशा में और तेजी से काम करना पड़ेगा।

 रक्षा बजट के मामले में चीन चाहे हमसे आगे हो, लेकिन चीन भारत पर आज ऐसे ही हावी हो जाएगा, यह आसान नहीं है, उसे भी पता है कि हिमालय पर युद्ध लड़ना आसान नहीं है। डोकलाम विवाद में भारत का रूख देखकर चीनी फौज और सरकार को अच्छे से समझ आ गया है कि भारत के आगे उसकी विस्तारवादी नीति काम नहीं करेगी। हमारी सैन्य शक्ति अर्जन हमारी सीमाओं की सुरक्षा के लिए है, आज देश इससे सुरक्षित है, क्योंकि हम हर मोर्चे पर दुश्मन सेना को जवाब देने में सक्षम है, हमें अपने पड़ोसी देशों से लगातार संबंध सुधारने की दिशा की आगे बढ़ता रहना चाहिए। कुछ मसलों के जवाब सीमा पर सैनिक खुद ही दे देते हैं। हम युद्ध लड़ने के लिए तैयारी नहीं कर रहे हैं, बल्कि अपनी जरूरत के लिए सैन्य साजो समान को अपडेट कर रहे हैं।   

Posted By: Kamal Verma

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