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यूपी चुनाव के लिए अखिलेश यादव के सामने क्या है सबसे बड़ी चुनौती? प्रशांत किशोर से मांगी मदद, मिशन 2027 का फॉर्मूला तैयार

By Arvind SharmaEdited By: Narender Sanwariya
Published: Thu, 06 Aug 2026 10:08 PM (IST)

समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए प्रशांत किशोर से सहयोग मांगा है, ताकि नए सामाजिक समीकरणों पर काम किया जा सके।

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अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। राजनीति में संकेत अक्सर औपचारिक घोषणाओं से पहले दिख जाते हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए नए सामाजिक समीकरण की तलाश तेज कर दी है। उन्होंने जनसुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर से संपर्क कर सहयोग मांगा है।

पीडीए की नई परिभाषा गढ़ने के बाद इसे सिर्फ चुनावी मशवरा लेने की कोशिश नहीं, बल्कि नया नैरेटिव तैयार करने की कवायद माना जा रहा है। बांकीपुर में भाजपा के अपराजेय गढ़ को ध्वस्त कर प्रशांत किशोर ने जिस तरह का चुनावी माडल पेश किया है, उसने विपक्षी दलों का ध्यान खींचा है।

प्रशांत किशोर का रणनीतिक सहयोग

सूत्रों के अनुसार अखिलेश यादव ने प्रशांत किशोर से फोन पर बात कर उत्तरप्रदेश में साथ काम करने की संभावनाओं पर चर्चा की है। प्रारंभिक बातचीत सकारात्मक मानी जा रही है। यदि संवाद आगे बढ़ता है तो यह सिर्फ प्रशांत किशोर का रणनीतिक सहयोग नहीं होगा, बल्कि सपा की राजनीतिक सोच में भी बदलाव का संकेत माना जाएगा। दरअसल, बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले कुछ चुनावों ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल परंपरागत वोट बैंक के भरोसे सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं रह गया है।

वोटरों का समीकरण

राजद को मुस्लिम-यादव (माय) समीकरण तक सीमित रहने की कीमत चुकानी पड़ी है। विधानसभा चुनाव से पहले राजद के 77 विधायक थे, जो अब घटकर 25 रह गए। तेजस्वी यादव के इस हश्र से सबक लेते हुए अखिलेश अपने आधार का विस्तार करना चाहते हैं। इसी उद्देश्य से उन्होंने पीडीए की परिभाषा में पंडित को शामिल किया। साफ है कि उनकी नजर सवर्ण वोटरों पर भी है। जनेश्वर मिश्र की जयंती को बड़े स्तर पर मनाना भी इसी रणनीति का संकेत है।

जनप्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों का माहौल बनाया

प्रशांत किशोर का चुनावी माडल यहीं पर अखिलेश के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। बांकीपुर में उन्होंने चुनाव को केवल जातीय गणित तक सीमित नहीं रहने दिया। रोजगार, शिक्षा, स्थानीय विकास, भ्रष्टाचार और बेहतर जनप्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को उभारकर ऐसा माहौल बनाया, जिसमें भाजपा का परंपरागत ध्रुवीकरण कमजोर पड़ गया।

सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती

उत्तर प्रदेश में भी सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा से मुकाबला करना नहीं है। 2024 के बाद के राजनीतिक माहौल में उसे युवाओं, शहरी मध्यवर्ग, पहली बार मतदान करने वाले वोटरों एवं सवर्ण समाज के एक हिस्से तक पहुंच बनानी होगी। इसके लिए जातीय गठजोड़ के साथ-साथ ऐसा विमर्श भी तैयार करना होगा जो भाजपा के वोट बैंक में सेंध लगा सके।

संगठन के दम पर चुनाव लड़ने पर विचार

यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि कुछ महीने पहले तक अखिलेश चुनावी रणनीतिकारों की भूमिका को लेकर अलग राय रखते थे। बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की हार के बाद उन्होंने प्रशांत किशोर की पूर्व कंपनी आईपैक की सेवाएं लेने से इनकार कर दिया था। तब सपा बाहरी रणनीतिकारों के बजाय अपने संगठन के दम पर चुनाव लड़ने पर विचार कर रही थी, मगर बांकीपुर के नतीजों के बाद परिस्थितियां बदलती दिखाई दे रही हैं।

संगठन निर्माण और प्रत्यक्ष राजनीति

प्रशांत किशोर का राजनीतिक अनुभव भी अब पहले जैसा नहीं माना जाता। 2017 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ उनका प्रयोग सफल नहीं रहा था, मगर उसके बाद उन्होंने बिहार में लंबी पदयात्रा, संगठन निर्माण और प्रत्यक्ष राजनीति के जरिए नया अनुभव अर्जित किया। बांकीपुर की जीत ने इस धारणा को भी मजबूत किया है कि अब उन्हें चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि जमीन पर चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले विशेषज्ञ नेता के रूप में भी देखा जाने लगा है।