दावोस, प्रेट्र : पश्चिमी देशों को अपनी तरक्की का फायदा बाकी दुनिया से साझा करना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि विभिन्न उभरती अर्थव्यवस्थाओं के सहयोग के बिना बहुत आगे बढ़ना संभव नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने मंगलवार को यह बात कही। राजन यहां व‌र्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की सालाना बैठक को संबोधित कर रहे थे।
राजन ने आगाह किया कि यदि चीजों को जल्द दुरुस्त नहीं किया गया, तो कोई भी टुकड़ों में बंटी इस दुनिया की समस्याएं हल नहीं कर सकता। किसी देश का नाम लिए बिना उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों को समझना चाहिए कि उनकी आबादी की आयु बढ़ रही है। ऐसे में उनके उत्पादों की मुख्य मांग उभरती दुनिया से ही आएगी। आगे चलकर इस बात का जोखिम है कि जब पश्चिमी देश सहयोग के लिए उभरती दुनिया के पास जाएंगे, तब उनसे पूछा जा सकता है कि पहले उन्होंने फायदों को साझा क्यों नहीं किया। राजन ने तकनीक, आबादी की बढ़ती उम्र और जलवायु परिवर्तन को पश्चिमी दुनिया के सामने आने वाली चुनौती के रूप में रेखांकित किया।
आरबीआइ के पूर्व गवर्नर राजन 'आर्थिक विमर्श की ताकत और नीति निर्माताओं के समक्ष 21 वीं सदी की चुनौतियों से निपटने के विकल्प' विषय पर सत्र को संबोधित कर रहे थे। बतौर उदाहरण उन्होंने कहा कि सिंगापुर जैसे देशों ने आय असमानता और समाज में विभाजन से सामने आई समस्याओं से निपटने के लिए कदम उठाया है। वहां ऐसी आवासीय परियोजनाएं बनाई गई हैं, जिनमें मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के परिवार एक साथ रह सकते हैं। राजन ने कहा कि उन्हें अमेरिका के बारे में पता नहीं, लेकिन कुछ देश इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। निश्चित रूप से सरकारों की इसमें भूमिका है। राजन ने उन अर्थशास्ति्रयों को भी आड़े हाथ लिया जो आर्थिक विमर्श के विचार पर भौहें सिकोड़ लेते हैं। उन्होंने कहा कि अब लोग अर्थशास्ति्रयों पर इस बात को लेकर मुश्किल से ही भरोसा करते हैं कि वे चीजों को दुरुस्त कर सकते हैं।

 

Posted By: Sachin Bajpai