इंदौर,(नईदुनिया)। हर साल चुनाव के कारण चार माह विकास के काम रुक जाते हैं। एक रिपोर्ट के आधार पर यह देखने में आया है कि जिस समय भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एकसाथ हुए उस समय वोटिंग प्रतिशत बढ़ा है। इसलिए एक देश एक चुनाव को लेकर सरकार प्रयास कर रही है। इसके लिए जनसमर्थन की आवश्यकता है।

यह बात लोकसभा सदस्य मीनाक्षी लेखी ने शनिवार शाम मप्र के इंदौर में एसजीएसआइटीएस कॉलेज में कही। वे 'एक देश-एक चुनाव' विषय पर डॉ. ओम नागपाल विचार मंच व संस्था सार्थक द्वारा आयोजित व्याख्यान में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि 1967 तक सभी चुनाव एकसाथ होते थे। फिर व्यवस्था बदली और लोकसभा व विधानसभा के चुनाव अलग-अलग होने लगे। इतने सालों में वोट डालने वालों की संख्या तो बढ़ी है पर वोटिंग का प्रतिशत नहीं बढ़ पाया। आज भी सौ प्रतिशत लोग चुनाव में भागीदार नहीं हैं। इसका एक कारण बार-बार चुनाव होना भी है। भारत का वोटर जागरूक है। एकसाथ लोकसभा, विधानसभा व अन्य चुनाव होंगे तब मतदाता अपने विवेक से प्रत्याशी का चुनाव कर सकता है। कुछ लोग कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में रहने के लिए ऐसा कानून पास कराने के पक्ष में हैं। यह बात गलत है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी व वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने भी अपने भाषणों में इस प्रक्रिया का जिक्र किया है।

हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल वीएस कोकजे ने कहा कि कई ऐसे कानून बने हैं जिसमें पहले लोग व राजनेता एक मत नहीं हुए। लेकिन आज वह कानून बन चुके हैं। जीएसटी, मंत्रिमंडल में 15 प्रतिशत सदस्यों की संख्या, दलबदल कानून इसी का उदाहरण है। इसलिए एक देश एक चुनाव की सोच गलत नहीं है। इसे लेकर देशभर में जो जनसमर्थन बनाया जा रहा है उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दे रहा है। इसे लागू करने के लिए संविधान में भी कुछ प्रावधानों को बदलना होगा। इसके बाद ही यह मूल रूप ले पाएगा। सभी चुनाव साथ में होने से स्थानीय मुद्दों को भी लोग समझ पाएंगे। चुनाव का खर्च भी बचाया जा सकता है।

Posted By: Arti Yadav