सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली: कहा जाता है वादे तो वादे हैं, चुनाव के बाद भूल जाने हैं। यही कारण है कि बड़े-बड़े वादों के बावजूद कई बार वोटर बहुत नहीं डिगते हैं। लेकिन कई वादे ऐसे होते हैं, जो पूरी तैयारी के बिना लागू किए जाएं तो घातक हो सकते हैं। गन्ने को लेकर राजनीतिक वादे इसी दिशा में हैं। उत्तर प्रदेश, पंजाब विधानसभा चुनाव में कई दल बिना आकलन गन्ने की कीमत बढ़ाने का वादा कर रहे हैं। लेकिन उसके बाद महंगी चीनी कहां बिकेगी, गन्ना किसानों का भुगतान कैसे होगा, एथनाल की महत्वाकांक्षी योजना का क्या होगा, इनको लेकर शुगर मिल्स एसोसिएशन अभी से सशंकित है।

चुनावी मौसम में किसान को लुभाने की होड़

राजनीतिक दलों में गन्ना किसानों को लुभाने के लिए होड़ लगी हुई है। इसमें हर कोई गन्ना मूल्य बढ़ाने, भुगतान का तरीका और भी बहुत कुछ समझाने में जुट गया है। कांग्रेस ने गन्ने का मूल्य 400 रपये प्रति क्विंटल तक करने की चुनावी घोषषणा कर भी दी है। चालू पेराई सीजन में पंजाब में सत्तारूढ़ कांग्रेस ने गन्ने का राज्य समर्थित मूल्य (एसएपी) सर्वाधिक 360 रपये प्रति क्विंटल कर भी दिया है। गन्ने में यह मूल्य वृद्धि चार वर्षों बाद ठीक चुनावी साल में एक साथ 50 रुपए प्रति क्विंटल की गई है। उत्तर प्रदेश में तीन साल बाद गन्ने का भाव 25 रुपए प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है। यहां गन्ने का एसएपी 350 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किया गया है।

गन्ने का मूल्य चार सौ से अधिक देने का वादा

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी भी गन्ने का मूल्य 400 रुपए से अधिक करने की बात कहती रही है, जिसका जिक्र उसके घोषणापत्र में भी हो सकता है। इसके लिए स्वामीनाथन आयोग का फार्मूला सुझाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में राजनीति करने वाला राष्ट्रीय लोकदल तो पहले ही 450 रपये प्रति क्विंटल की मांग करता रहा है। उसके चुनावी घोषणापत्र में भी इसका वादा किया गया है। दोनों पार्टियां राज्य में गठबंधन कर चुनाव मैदान में हैं।

महंगी चीनी को नहीं मिलेगा बाजार

राजनीतिक दलों के चुनावी एसएपी के वादों के आधार पर चीनी उत्पादन की लागत मूल्य 10 फीसदी की औसत रिकवरी दर से जो़ड़े तो 40 रुपए पड़ेगा। इस मूल्य पर जीएसटी, प्रोसेसिंग खर्च, लाजिस्टिक्स और बैंक ब्याज के साथ थोक खुदरा व्यापारी के मार्जिन के साथ उपभोक्ता को यह चीनी 50 से 55 रपये प्रति किलो मिल पाएगी। देश में तैयार इस महंगी चीनी की पूछ न तो निर्यात बाजार में होगी और न ही घरेलू बाजार में। इसका दूसरा पक्ष यह होगा कि आयातित चीनी से घरेलू बाजार पट सकता है। वैश्विक बाजार में सस्ती चीनी की भारी आपूर्ति है। विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का सदस्य होने के नाते वर्ष 2023 में उसके प्रविधानों के मुताबिक सरकार निर्यात अथवा अन्य किसी तरह की सब्सिडी नहीं दे सकेगी।

चीनी के साथ सभी फसले होंगी महंगी

इंडियन शुगर मिल्स एसोसिएशन (इस्मा) के महानिदेशक अविनाश वर्मा ने राजनीतिक दलों के वादों के बारे में कहा कि फिर तो घरेलू बाजार में चीनी का भाव बढ़ाकर बेचने की छूट दी जाए। लेकिन इसी के साथ बाकी फसलों के भी दाम बढ़ा दिए जाएं। नहीं तो सब लोग गन्ना ही उगाना शुरू कर देंगे, क्योंकि गन्ने जैसी फायदे की कोई और खेती नहीं है। हैरानी के अंदाज में उन्होंने कहा कि केवल गन्ने का दाम बढ़ा तो स्टाक में चीनी पड़ी रहेगी। मिलों के पास गन्ने के भुगतान के लिए पैसे नहीं होंगे। मिलों का घाटे में जाना तय है।

एथनाल परियोजना के ध्वस्त होने की आशंका

इससे सरकार की महत्वाकांक्षी एथनाल परियोजना पटरी पर आने से पहले ही ध्वस्त हो जाएगी। एथनाल का मूल्य 70 से 80 रपये प्रति लीटर पड़ेगा। फिर तो पेट्रोलियम क्रूड खरीदने में ही फायदा होगा। चुनाव जीतने के लिए ऐसे वादे ठीक हो सकते हैं, लेकिन लागू करने पर इसका पहला और अंतिम शिकार गन्ने की खेती ही होगी। चीनी उद्योग के लिए गन्ना किसान कच्चा माल उत्पादक है। राजनीतिक दल उनके हितों का ध्यान रखें, लेकिन ऐसा असंतुलन पैदा न कर दें, जिससे इस उद्योग की किड़यां चटक जाए।

Edited By: Amit Singh