प्रो. लल्लन प्रसाद। हमारे अधिकांश पड़ोसी देशों में विदेशी मुद्रा का भंडार लगभग खाली हो चुका है। श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देशों में खाद्यान्न समेत आवश्यकता की अधिकांश वस्तुएं बहुत महंगी हो चुकी हैं। डालर के मुकाबले मुद्रा की कीमत जमीन छूने लगी है, व्यापार घाटा तेजी से बढ़ा है, बजटीय घाटा भी नियंत्रण के बाहर जा रहा है। चीन ने इन देशों को बड़े बड़े प्रोजेक्ट बनाने का ख्वाब दिखाकर भारी कर्ज में डुबो दिया और अब दिया हुआ ऋण वापस मांग रहा है, जिसको देने की क्षमता इन देशों में नहीं है, विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियन डेवलपमेंट बैंक और अन्य देशों के कर्जो का भुगतान भी ये देश करने में असमर्थ हैं और कर्ज माग रहे हैं। राजनीतिक अस्थिरता, व्यापक भ्रष्टाचार एवं गलत आर्थिक नीतियां इन देशों की वर्तमान दशा के लिए जिम्मेदार हैं।

श्रीलंका : श्रीलंका का विदेशी कर्ज 51 अरब डालर पर पहुंच चुका है। इस वर्ष सात अरब डालर एवं 2027 तक उसे 28 अरब डालर का भुगतान करना है। विदेशी मुद्रा का भंडार उसके पास मात्र 25 करोड़ डालर है। आंतरिक कर्ज (पब्लिक डेट) जीडीपी का 140 प्रतिशत हो गया है। डालर के मुकाबले लंका के रुपये की कीमत 80 प्रतिशत नीचे जा चुकी है। मुद्रास्फीति 57 प्रतिशत ऊपर जा चुकी है। पिछली सरकार ने सस्ती लोकप्रियता के लिए टैक्सों में भारी कमी कर दी थी। फर्टिलाइजर का आयात बंद होने से खेती की पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। खाद्य पदार्थो की कमी हो गई, कीमतें आसमान छूने लगीं। आवश्यक दवाओं के आयात के लिए विदेशी मुद्रा नहीं है। सत्ता में बैठे एक ही परिवार के अधिकांश सदस्यों द्वारा बनाई गई नीतियों के कारण भी यहां की आर्थिकी दुष्प्रभावित हुई है। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को 2019 में ही बड़ा धक्का लग चुका था जब बड़ा आतंकी हमला हुआ था। पर्यटन श्रीलंका की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा आधार था जो दुष्प्रभावित हुआ और कोविड महामारी के बाद पर तो लगभग समाप्त ही हो गया। कर्ज में डूबी अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए नई सरकार आइएमएफ के दरवाजे पर दस्तक दे रही है।

पाकिस्तान : इस पड़ोसी देश की आर्थिकी पिछले कुछ वर्षो से डांवाडोल है। जून 2013 में पाकिस्तान पर 44.35 अरब डालर का कर्ज था जिसका मात्र 9.3 प्रतिशत चीन का दिया हुआ था। अप्रैल 2021 में कुल कर्ज 90.12 अरब पर पहुंच गया जिसका 27.4 प्रतिशत चीन का था। विदेशी मुद्रा का भंडार एक अरब डालर से भी कम है। बड़ी संख्या में यहां गरीब जनता भुखमरी का शिकार है। इस देश में मुद्रास्फीति 24.9 प्रतिशत पर पहुंच गई है। पाकिस्तानी रुपये की कीमत डालर के मुकाबले 236 रुपये तक पहुंच चुकी है। अर्थव्यवस्था को दोबारा पटरी पर लाने के लिए पाकिस्तान को कम से कम ़36 अरब डालर की आवश्यकता है। अप्रैल 2022 में चीन ने पाकिस्तान को ़5.5 करोड़ डालर कर्ज वापस करने के लिए कहा। अधिकांश प्रोजेक्ट के लिए चीन ने पाकिस्तान को भारी कर्ज दिए हैं, लेकिन अभी वे पूरे नहीं हुए हैं। ग्वादर के 15 प्रोजेक्ट में से मात्र तीन ही पूरे हुए हैं। बिजली पानी आदि के कई प्रोजेक्ट अधर मे लटके हैं। राजनेताओं और प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, राजनीतिक उथल-पुथल एवं नीतिगत असफलताएं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को पिछले सात दशकों के सबसे नीचे स्तर पर ले आई हैं।

ईरान : ईरान की आर्थिक स्थिति भी कमजोर है। इंटरनेशनल एटामिक एनर्जी एजेंसी द्वारा लगाई गई शर्ते पूरी न करने के कारण जो प्रतिबंध लगे हैं उनसे ईरान के निर्यात में भारी कमी हुई है, जो उसकी अर्थव्यवस्था का आधार है। डालर के मुकाबले ईरान की करेंसी रियाल में भारी गिरावट आ चुकी है। महंगाई दर 40 प्रतिशत के ऊपर जा चुकी है। ईरान विश्व का नेचुरल गैस का दूसरा सबसे बड़ा और क्रूड आयल का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक देश है, किंतु आर्थिक प्रतिबंधों के कारण वह ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम से अलग-थलग पड़ गया है। जीडीपी में गिरावट आई है, बजटीय घाटा बढ़ा है। आटा जैसी आवश्यक वस्तु से भी सरकार ने सब्सिडी हटा दी है, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ है। नेपाल की अर्थव्यवस्था भी गिरावट पर है, विदेशी मुद्रा का भंडार अप्रैल 2022 में पिछले वर्ष की अपेक्षा दो अरब डालर कम था, जो छह महीने के आयात के लिए ही काफी था। देश का व्यापार घाटा दिनों दिन बढ़ता जा रहा है, निर्यात की अपेक्षा आयात 12 गुना बढ़ गया है। खाद्य सुरक्षा भी खतरे में है।

संभल गया भारत : महंगाई, विदेशी मुद्रा भंडार में कमी, रुपये के मूल्य में गिरावट, व्यापार एवं बजटीय घाटा जैसी समस्याएं भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने भी आई, किंतु नियंत्रण में रही, आर्थिक संकट की स्थिति नहीं बनी। कोविड काल में गरीबों को मुफ्त राशन की व्यवस्था की गई जो अब तक चल रही है, किसान सम्मान निधि के तहत हर छोटे किसानों को प्रत्येक माह के हिसाब से पांच सौ रुपये की आर्थिक मदद जैसी अनेक योजनाएं केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा चलाई जा रही हैं। वैसे कुछ राजनीतिक दलों के द्वारा चुनावी वादे आसमान से तारे तोड़कर लाने की होती है। उनमें से कुछ को अमल में लाने का प्रयत्न किया जाता है जो सरकारी खजाने पर डाका डालने जैसा है, अर्थव्यवस्था को अस्थिर और खोखला करता है। समाज के एक वर्ग की मेहनत की कमाई दूसरे को मुफ्त में दे दी जाती है। वोटर्स को भ्रमित किया जाता है, सही निर्णय लेने से रोका जाता है। इस तरह की मुफ्त सुविधाओं पर रोक लगाना आवश्यक है। इसके लिए उच्चतम न्यायालय ने एक समिति गठित करने का सुझाव दिया है, जिस पर शीघ्र अमल करने की आवश्यकता है। अन्यथा ऐसा न हो कि कहीं हमारा देश भी पड़ोसी देशों की तर्ज पर आर्थिक बदहाली की चपेट में आ जाए, इसलिए समय रहते इस बारे में सख्ती बरतना शुरू करना होगा।

कोविड महामारी और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध ने पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था को हिला दिया है। इसका सर्वाधिक दुष्प्रभाव गरीब और मध्यम आय वर्ग के देशों पर पड़ रहा है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था भी प्रभावित हुई, किंतु आधार मजबूत होने एवं स्वस्थ आर्थिक नीतियों के कारण यहां तो संकट के बादल छंट गए हैं। वहीं भारत के अधिकांश पड़ोसी देश आर्थिक संकट से उबर नहीं पाए। 

[पूर्व विभागाध्यक्ष, बिजनेस इकोनमिक्स विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय]

Edited By: Sanjay Pokhriyal

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