अनिल त्रिवेदी, इंदौर। तथाकथित धर्म निरपेक्षता के हिमायती उस वक्त कहां थे जब धर्म के नाम पर भारत के टुकड़े कर मुस्लिमों को एक पूरा देश दे दिया गया। इसके बाद 1971 में जब पाकिस्तान के दो टुकड़े हुए तो एक नया मुस्लिम बहुल देश अस्तित्व में आ गया। उस वक्त भारत ने बांग्लादेश को बंगाल में क्यों नहीं मिलाया? आखिर किसी जमाने में वो बंगाल का ही तो हिस्सा था। अब पाकिस्तान और बांग्लादेश में रह रहे अल्पसंख्यक दशकों से भीषण नारकीय यातनाएं झेल रहे हैं। ऐसे में अगर उन्हें वापस भारत की नागरिकता दी जा रही है तो इसमें गलत क्या है?

'गजवा--ए--हिंद' का ख्वाब देखने वाले कई लोगों के चेहरे बेनकाब

ये सीधा सवाल है पाकिस्तान में जन्मे मशहूर कनाडाई लेखक तारेक फतह का। 'इंदौर लिटरेचर फेस्टिवल' में हिस्सा लेने इंदौर आए तारेक ने 'नईदुनिया' से खास गुफ्तगू में बेबाकी से अपने खयालात और जज्बात साझा किए। उन्होंने कहा कि इसी बहाने 'गजवा--ए--हिंद' का ख्वाब देखने वाले कई लोगों के चेहरे बेनकाब हो रहे हैं। अब तो यहां के लोगों को 'गंगा--जमनी तहजीब' का राग छोड़कर अपनी आंखें खोल लेनी चाहिए। सस्ते महंगे आलू, टमाटर, प्याज की चिंता छोड़कर 'कटक से अटक' तक अपने देश के बारे में सोचिए।

जिस बिजली को बनाया उससे आप ही झुलस जाएं

अगर सवा अरब लोग हर रोज कटक से अटक के बारे में सोचेंगे तो एक दिन उनका ये ख्वाब हकीकत की शक्ल अख्तियार क्यों नहीं करेगा? जिस बिजली को बनाया, उससे झुलस न जाएं तारेक धर्मनिरपेक्षता की बात करने वालों से पूछते हैं कि कश्मीरी पंडितों को विदेशी ताकतों की मदद से अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिया जाता है तो कोई उफ क्यों नहीं करता? बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ठीक चल रही है। ऐसे में अगर वो अपने नागरिक वापस मांग रहा है तो हमें उन्हें देने में क्या हर्ज है? लेकिन बांग्लादेश पर भी आंख मूंदकर ऐतबार न करें। कहीं ऐसा न हो कि आपने जिस बिजली को बनाया उससे आप ही झुलस जाएं।

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