जयप्रकाश रंजन, नई दिल्ली। तालिबान और अमेरिका के बीच होने वाली शांति वार्ता अंतिम समय में टूट गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रविवार को ट्विटर पर इस बेहद गोपनीय वार्ता के टूटने की जानकारी दी। अमेरिका के ऐतिहासिक शहर कैंप डेविड में राष्ट्रपति ट्रंप और तालिबान नेताओं के बीच प्रस्तावित बातचीत के बाद शांति समझौते की घोषणा होने वाली थी।

हर गतिविधि पर पैनी नजर

बहरहाल, वार्ता टूटने की सूचना बाहर आने के बाद विश्व बिरादरी में तरह-तरह की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं, लेकिन भारत ने फिलहाल राहत की सांस ली है। अफगानिस्तान में होने वाला बदलाव सीधे तौर पर भारत के हितों को प्रभावित करता है इसलिए विदेश मंत्रालय के अधिकारी हर गतिविधि पर पैनी नजर रखे हुए हैं।

ट्रंप ने कहा, काबुल में तालिबान के ताजा हमले की वजह से रद की वार्ता

राष्ट्रपति ट्रंप ने ट्विटर पर अपना बयान जारी करते हुए कहा है कि किसी को भी मालूम नहीं है कि रविवार को तालिबान के नेताओं और अफगानिस्तान के राष्ट्रपति के साथ मेरी कैंप डेविड में अलग-अलग गोपनीय वार्ता होनी थी। वे आज रात अमेरिका आ रहे थे। दुर्भाग्य से गलत तरीके से लाभ उठाने के लिए उन्होंने काबुल में हुए हमले की जिम्मेदारी ली है जिसमें हमारे एक सैन्यकर्मी और 11 अन्य लोगों की मौत हुई है। मैंने तुरंत बैठक को रद कर दिया है और शांति वार्ता को भी स्थगित कर दिया है।

तालिबान के पास अर्थपूर्ण समझौते को लागू करने की शक्ति नहीं है

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि ये कैसे लोग हैं जो वार्ता में मोल-तोल करने के लिए लोगों की हत्या कर रहे हैं। अगर वे इतने महत्वपूर्ण शांति वार्ता के दौरान हत्या करने से नहीं चूक रहे हैं और 12 लोगों की हत्या कर रहे हैं तो असल में उनके पास एक अर्थपूर्ण समझौते को लागू करने की शक्ति नहीं है।

अपने तीन ट्वीट का अंत राष्ट्रपति ट्रंप ने बेहद उल्लेखनीय बात से की है, 'कितने दशक वे और लड़ना चाहते हैं?' उनकी इस बात के निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।

पाकिस्तान को करारा झटका

राष्ट्रपति ट्रंप के इस फैसले से भारत ने फिलहाल राहत की सांस ली है। माना जा रहा है कि इससे पाकिस्तान को करारा झटका लगा है। विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने दैनिक जागरण को कुछ समय पहले बताया था कि अमेरिका और तालिबान के बीच शांति वार्ता की वजह से अंतरराष्ट्रीय जगत में अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान एक बार फिर अपनी उपयोगिता साबित करने में जुट गया है।

ट्रंप अफगान से अपनी पूरी सेना की वापसी चाहते हैं

पीएम इमरान खान को वाशिंगटन के दौरे पर आमंत्रित करने से लेकर राष्ट्रपति ट्रंप की तरफ से कई बार कश्मीर में हस्तक्षेप करने के बयान को इसी से जोड़ कर देखा जाता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने आगामी चुनाव से पहले अफगानिस्तान से अपनी पूरी सेना की वापसी चाहते हैं। इसके लिए उन्हें पाकिस्तान की जरूरत है क्योंकि बगैर उसके समर्थन के काबुल में तालिबान को सत्ता नहीं सौंपी जा सकती है।

कैंप डेविड में होनी थी राष्ट्रपति ट्रंप और तालिबान नेताओं के बीच वार्ता

पाकिस्तान की उपयोगिता की वजह से ही अफगानिस्तान शांति वार्ता में भारतीय हितों को काफी हद तक नजरअंदाज भी किया जा रहा था। अब देखना होगा कि गोपनीय शांति वार्ता के रद होने के बाद अमेरिकी प्रशासन अफगानिस्तान को लेकर क्या नीति अख्तियार करता है।

वार्ता रद होने पर भारत ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया

विदेश मंत्रालय ने अपनी तरफ से अभी तक ट्रंप-तालिबान वार्ता के रद होने पर आधिकारिक तौर पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन भारत सरकार काफी पहले से यह कहती रही है कि अफगानिस्तान समस्या का कोई समाधान वहां के स्थानीय लोगों की तरफ से और उन्हीं के नेतृत्व में होनी चाहिए।

कश्मीर को लेकर भारत चिंतित

तालिबान और पाकिस्तान के पुराने संपर्क को देख कर भारत पहले से ही काफी संशकित है। भारत को सिर्फ इस बात की चिंता नहीं है कि अफगानिस्तान के विकास को लेकर उसने पिछले 15-16 वर्षो में जो काम किया है उस पर पानी फिर जाएगा बल्कि तालिबान के आने से कश्मीर को लेकर भी भारत की नई चिंताएं पैदा हो सकती हैं। पूर्व में भी जब तालिबान का वहां शासन था तो कश्मीर में जेहाद के नाम पर आतंकी भेजने के लिए वहां प्रशिक्षण आदि देने का काम तालिबान ही कर रहा था।

क्यों भारत है अफगानिस्तान को लेकर चिंतित

1. तालिबान के आने से पाकिस्तान की पकड़ अफगान पर होगी मजबूत

2. अफगान में भारत की लगभग 5,000 करोड़ रुपये की परियोजनाएं हैं जारी

3. तालिबान की वापसी से कश्मीर में आतंकी हिंसा बढ़ने की आशंका

4. पूर्व में भारत विरोधी गतिविधियों को तालिबान ने दिया है बढ़ावा

5. अफगान-भारत कारोबार को तालिबान पहुंचा सकता है नुकसान।

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Posted By: Bhupendra Singh

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