जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा से कामकाज छीनने का आदेश रद करते हुए उन्हें काम पर बहाल कर दिया है। हालांकि कोर्ट ने फिलहाल उन्हें कोई बड़ा नीतिगत या संस्थागत फैसला लेने से रोक दिया है। कोर्ट ने कहा है कि आलोक वर्मा पर कार्रवाई या कामकाज वापस लेने के बारे में निदेशक का चयन करने वाली उच्च स्तरीय समिति सात दिन के भीतर विचार करेगी और जबतक समिति मामले पर विचार करती है तब तक आलोक वर्मा कोई बड़ा नीतिगत फैसला नहीं लेंगे सिर्फ सीबीआइ का रुटीन कामकाज ही देखेंगे।

नियुक्ति की सिफारिश करने वाली उच्च स्तरीय समिति ही लेगी आगे का फैसला

कोर्ट ने फैसले में सीबीआइ की स्वायत्तता और बाहरी दखल से मुक्त रखने की कानूनी मंशा और उद्देश्य स्पष्ट किया है। फैसले से साफ हो गया है कि सीबीआइ निदेशक से कामकाज छीनने या उन्हें पद से हटाने का फैसला सिर्फ नियुक्ति की सिफारिश करने वाली उच्च स्तरीय चयन समिति ही कर सकती है। सरकार या सीवीसी ऐसा नहीं कर सकती। पिछले ढाई महीने से जबरिया छुट्टी पर चल रहे सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा 31 जनवरी को सेवानिवृत हो जाएंगे।

सीबीआइ निदेशक की नियुक्ति की सिफारिश प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायाधीश और नेता विपक्ष की उच्च स्तरीय चयन समिति करती है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, संजय किशन कौल व केएम जोसेफ की पीठ ने यह फैसला आलोक वर्मा व गैर सरकारी संस्था कामनकाज की याचिका निपटाते हुए सुनाया है। केन्द्र सरकार ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा व विशेष निदेशक राकेश अस्थाना द्वारा एक दूसरे पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए जाने को देखते हुए आरोपों की जांच होने तक दोनों से कामकाज छीन लिया था।

सरकार ने यह आदेश केन्द्रीय सर्तकता आयोग (सीवीसी) की सिफारिश पर जारी किया था। वर्मा और संस्था ने आलोक वर्मा से कामकाज छीनने और उनकी जगह एम नागेश्वर राव को अंतरिम तौर पर सीबीआइ निदेशक का कामकाज सौंपने के सीवीसी और सरकार के 23 अक्टूबर 2018 के आदेश को चुनौती दी थी। मुख्य दलील थी कि निदेशक का दो साल का तय कार्यकाल होता है और उसे चयन करने वाली उच्च स्तरीय समिति की पूर्व मंजूरी के बगैर स्थानांतरित भी नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आदेश को सही ठहराने वाली सरकार की दलीलें खारिज करते हुए कहा है कि उच्च स्तरीय समिति से पूर्व मंजूरी लेने का प्रावधान लाने का उद्देश्य सीबीआइ निदेशक के दफ्तर को बाहरी दखलंदाजी से पूरी तरह मुक्त रखने का था ताकि सीबीआई की संस्था के तौर पर विश्वसनीयता और स्वायत्तता कायम रहे। सीबीआइ किसी भी तरह के प्रभाव से मुक्त रहे और वह भय मुक्त होकर जनहित में प्रतिष्ठित जांच एजेंसी के तौर पर काम कर सके। इसलिए सीबीआइ के मुखिया यानी निदेशक स्वायत्तता और विश्वसनीयता का रोल माडल होना चाहिए और यह तभी हो सकता है जबकि वह संसद को छोड़ कर सभी तरह के नियंत्रण और दखलंदाजी से मुक्त हो।

कोर्ट ने सरकार की ओर से आदेश जारी करने के बारे में परिस्तिथितियों की जरूरत की दलील का जवाब देते हुए कहा कि आवश्यकता सिर्फ डीएसपीई एक्ट की धारा 4ए (1) के तहत गठित उच्च स्तरीय जांच समिति ही परख सकती है जिसे निदेशक की नियुक्त की सिफारिश का अधिकार है।

कानूनी मंशा के मुताबिक सिर्फ इसीतरह सीबीआई निदेशक के दफ्तर की स्वायत्ता सुनिश्चित रह सकती है। इसके साथ ही कोर्ट ने 23 अक्टूबर के सीवीसी और सरकार की ओर से आलोक वर्मा से निदेशक पद का कामकाज छीनने के तीनों आदेश निरस्त कर दिए।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि इस मामले को आगे विचार के लिए जल्दी से जल्दी अधिकतम सात दिन के भीतर उच्च स्तरीय समिति के सामने पेश किया जाए। सक्षम अथारिटी समिति की बैठक बुलाए। कोर्ट ने कहा कि सीबीआइ निदेशक से कामकाज छीनने का मुद्दा समिति के विचार के लिए खुला हुआ है।

कोर्ट ने आलोक वर्मा को निदेशक पद पर बहाल करते हुए कहा है कि वह तब तक कोई बड़ा नीतिगत या संस्थागत फैसला नहीं लेंगे जबतक कि उच्च स्तरीय समिति उन्हे इसकी इजाजत न दे। वर्मा फिलहाल सीबीआइ का रुटीन कामकाज देखेंगे। कोई नया कदम नहीं उठाएंगे और न ही कोई नीतिगत फैसला लेंगे। हालांकि कोर्ट ने वर्मा पर लगे आरोपों के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की है। कोर्ट नागेश्वर राव द्वारा विभिन्न अधिकारियों का तबादला किये जाने के संबंध में दाखिल अर्जियों पर भी कोई आदेश नहीं दिया है कहा है कि उन लोगों को उचित फोरम के सामने अपनी बात रखने का अधिकार होगा।

बता दें कि सीबीआई के डायरेक्टर आलोक वर्मा ने पूर्व जॉइंट डायरेक्टर राकेश अस्थाना के साथ विवाद के चलते शक्तियां छीने जाने और छुट्टी पर भेजने के खिलाफ याचिका दायर की थी। अस्थाना और वर्मा के बीच करप्शन को लेकर छिड़ी जंग के सार्वजनिक होने के बाद केंद्र की मोदी सरकार ने दोनों अधिकारियों को छुट्टी पर भेज दिया था।

23 अक्टूबर को सरकार ने भेजा था अवकाश पर
वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच छिड़ी जंग सार्वजनिक होने के बाद सरकार ने पिछले साल 23 अक्टूबर को दोनों अधिकारियों को उनके अधिकारों से वंचित कर अवकाश पर भेज दिया था। दोनों अधिकारियों ने एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। इसके साथ ही केंद्र ने ब्यूरो के संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को जांच एजेंसी के निदेशक का अस्थायी कार्यभार सौंप दिया था।

 छह दिसंबर को याचिका पर सुनवाई पूरी हो गई थी 
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई, संजय किशन कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने पिछले साल छह दिसंबर को याचिका पर सुनवाई पूरी कर ली थी। पीठ ने वर्मा, केंद्र सरकार, केंद्रीय सतर्कता आयोग और अन्य की दलील सुनने के बाद कहा था कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएगा। कोर्ट ने गैर सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर भी सुनवाई की थी। इस संगठन ने न्यायालय की निगरानी में विशेष जांच दल से राकेश अस्थाना सहित जांच ब्यूरो के तमाम अधिकारियों के खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच कराने का अनुरोध किया था।

न्यायालय ने जांच ब्यूरो की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से केंद्रीय सतर्कता आयोग को कैबिनेट सचिव से मिले पत्र में लगाए गए आरोपों की जांच दो सप्ताह के भीतर पूरी करके अपनी रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे में सौंपने का निर्देश दिया था। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश एके पटनायक को सीवीसी जांच की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया था।

कांग्रेस ने कहा- सरकार को सबक
सीबीआइ विवाद में सुप्रीम फैसले पर कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने सरकार को एक सबक सिखाया। आलोक वर्मा के पास राफेल की फाइल आने वाली थी इसलिए केंद्र सरकार ने जल्दबाजी में उनको हटाने का फैसला लिया।

केजरीवाल ने राफेल से जोड़ा केस
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने देश की सभी संस्थाओं को बर्बाद कर दिया है। केजरीवाल ने सवालिया लहजे में कहा कि क्या राफेल घोटाले की जांच रोकने के लिए आधी रात को सीबीआई डायरेक्टर को हटाया गया ?

Posted By: Manish Negi

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