जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। प्रोन्नति की मांग कर रहे विशेष जज सुरेन्द्र कुमार यादव से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा है कि वह पहले यह बताएं कि वे अयोध्या ध्वंस मामले का ट्रायल कब तक पूरा कर लेंगे। उनसे सील बंद लिफाफे में जवाब मांगा गया है। जाहिर है कि उसके बाद ही कोर्ट कोई फैसला लेगा।

सोमवार को न्यायमूर्ति आरएफ नारिमन व न्यायमूर्ति इंदू मल्होत्रा की पीठ ने विशेष जज की ओर से पेश वकील रवि सीकरी व मयूरी रघुवंशी की दलीलें सुनने के बाद उपरोक्त आदेश दिया। इससे पहले वकीलों ने गत वर्ष 19 अप्रैल के आदेश में बदलाव करने की गुहार लगाते हुए कहा कि इससे विशेष जज की प्रोन्नति रुक गई है।

हाईकोर्ट ने गत 1 जून को बदांयू के जिला जज के पद पर उनकी नियुक्ति और स्थानांतरण की अधिसूचना जारी की थी, लेकिन उसी दिन एक और अधिसूचना जारी हुई जिसमें उनकी जिला जज पद पर नियुक्ति और स्थानांतरण अगले आदेश तक निरस्त कर दिया गया। इसके पीछे ट्रायल पूरा होने तक जज का स्थानांतरण न करने के आदेश को आधार बनाया गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने गत वर्ष 19 अप्रैल को आडवाणी, जोशी और उमा भारती सहित भाजपा और वीएचपी के 14 नेताओं के खिलाफ अयोध्या में ढांचा ढहाने की साजिश का मुकदमा चलाए जाने का आदेश दिया था। कोर्ट ने नेताओं का मुकदमा रायबरेली की अदालत से अयोध्या प्रकरण की सुनवाई कर रहे लखनऊ के विशेष जज की अदालत में स्थानांतरित कर दिया था। साथ ही रोजाना सुनवाई कर दो साल में ट्रायल पूरा करने और ट्रायल पूरा होने तक जज का स्थानांतरण न किये जाने का भी आदेश दिया था।

अर्जी मे विशेष जज ने कहा है कि वह 8 जून 1990 को मुंसिफ मजिस्ट्रेट नियुक्त हुए थे। 28 साल का बेदाग कैरियर है। उन्होंने ईमानदारी और निष्ठा से काम किया। अब वह 59 साल की उम्र में सेवानिवृति के मुकाम पर पहुंचने वाले हैं। उनके साथ नियुक्त हुए सहयोगी और कनिष्ठ जिला जज नियुक्त हो चुके हैं, लेकिन उनकी प्रोन्नति नकार दी गई है वे अभी भी अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश (अयोध्या प्रकरण) पद पर काम कर रहे हैं। कोर्ट के आदेश की ऐसी व्याख्या न की जाए कि उनकी प्रोन्नति ही न हो जबकि उन्हें सेवा नियमों में उन्हें इसका अधिकार है। प्रोन्नति न होने से उन्हें न भरपाई होने वाला नुकसान होगा।

 

Posted By: Bhupendra Singh