नई दिल्ली, पीटीआइ। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि वह कोरोना से मरने वाले लोगों की अंत्येष्टि में मदद करने वालों और शवदाह गृहों में काम करने वाले कर्मियों को अग्रिम मोर्चे के अन्य कर्मियों की तर्ज पर बीमा कवर उपलब्ध कराने पर विचार करेगी। सरकार ने इस मसले को वैध चिंता करार दिया।

न्यायमूर्ति अशोक भूषण और न्यायमूर्ति एम आर शाह की अवकाश पीठ से अधिवक्ता गौरव कुमार बंसल ने कहा कि शवदाह गृहों में काम करने वाले लोगों को बगैर किसी बीमा कवर के छोड़ दिया गया है। शवदाहगृह के कर्मी कोरोना से संक्रमित हो रहे हैं जिससे उनकी मौत हो रही है।

इस पर केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलीसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि यह एक वैध चिंता है। शवदाह गृहों के कर्मचारियों को बीमा योजना के दायरे में नहीं लाया गया है। मैं इस पहलू को देखूंगा। हालांकि उन्‍होंने यह भी बताया कि मौजूदा वक्‍त में 22 लाख स्वास्थ्य सेवा कर्मियों को बीमा योजना कवर प्राप्त है।

सुप्रीम कोर्ट ने कोरोना से मौत पर मृत्यु प्रमाणपत्र जारी करने की केंद्र सरकार द्वारा बताई गई प्रक्रिया को जटिल बताया। शीर्ष अदालत ने कहा कि इसे सरल करने पर विचार होना चाहिए। साथ ही जिनके पहले मृत्यु प्रमाणपत्र जारी हो चुके हैं, लेकिन उनमें मौत का कारण कोरोना दर्ज नहीं है, उनमें सुधार की व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि उनके परिजन घोषित योजनाओं का लाभ उठा सकें।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा कि क्या प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एनडीएमए (नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी) ने कोरोना से मौत पर स्वजन को चार लाख रुपये अनुग्रह राशि नहीं दिए जाने के बारे में कोई निर्णय लिया था? बाद में पीठ ने कोरोना से मौत पर चार लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की मांग पर विस्तृत सुनवाई के बाद सोमवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि कई मामलों में माता-पिता दोनों की मृत्यु हो गई है। सिर्फ बच्चे ही बचे हैं। कहीं पर परिवार में सिर्फ बुजुर्ग बचे हैं। मृत्यु प्रमाणपत्र में मौत का कारण कोरोना नहीं लिखा है। कुछ और कारण दिया है। जैसे दिल का दौरा या कुछ और। ऐसे में पीडि़त परिवार को घोषित योजना का लाभ कैसे मिलेगा?