सद्गुरु शरण। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के जन्मदिन 25 दिसंबर को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने गुड गवर्नेस इंडेक्स-2021 जारी की जिसके अनुसार मध्य प्रदेश ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, छत्तीसगढ़, बंगाल, ओडिशा, झारखंड आदि को पछाड़ते हुए कृषि और संबद्ध क्षेत्रों में बेहतरीन परफार्मेस के लिए पहला स्थान प्राप्त किया। कहने की बात नहीं कि कोरोना काल में गंभीर आर्थिक संकट से गुजरने वाले प्रदेश के लिए यह हौसला बढ़ाने वाली रिपोर्ट है। इसका सारा श्रेय प्रदेश के पराक्रमी किसानों को जाता है जिन्होंने कोरोना काल की घोर प्रतिकूलता में भी प्रदेश का मान बढ़ाया। इसके बावजूद किसानों के पराक्रम की सराहना में प्रदेश के किसी भी राजनीतिक दल के मुख से बधाई के शब्द नहीं निकले। निकलते भी कैसे, प्रदेश के राजनीतिक दलों के पास अपने किसानों की उपलब्धि पर गर्व करने का समय ही नहीं है।

प्रदेश की सियासत फिलहाल सावरकर पर शोध करने में व्यस्त है। भारतीय जनता पार्टी अपने एजेंडे के मुताबिक उन्हें सबसे बड़ा देशभक्त एवं स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बहादुर योद्धा साबित करने पर तुली है तो कांग्रेस इसके विपरीत उन्हें अंग्रेजों से बार-बार माफी मांगकर घुटने टेकने वाला निहायत साधारण व्यक्ति। बुजुर्ग कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की ऐसे विवादों को हवा देने में रुचि जगजाहिर है। उनका नवीनतम शोध है कि सावरकर गोमांस खाने के पक्षधर थे।

यह विडंबना ही है कि जिस वक्त देश के राज्य विभिन्न क्षेत्रों की उपलब्धियों में एक-दूसरे को पछाड़ने की स्पर्धा में शामिल हैं, उस वक्त मध्य प्रदेश की सियासत निहायत अर्थहीन मुद्दों पर विवाद कर रही है। सियासत के लिए कृषि और किसान शायद इसलिए भी अहमियत नहीं रखते, क्योंकि लाख प्रयास के बावजूद किसान खुद को वोटबैंक के रूप में संगठित नहीं कर पाए। वे जातियों में बंटे हैं, लिहाजा सियासत का काम तो चल ही जाता है। इसीलिए सियासी दल किसानों की इस उपलब्धि पर भी गर्व नहीं कर पाते हैं कि वे गेहूं उत्पादन में पंजाब को टक्कर दे रहे हैं, जबकि बासमती चावल, सोयाबीन, तिलहन और सब्जियों के उत्पादन में कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं।

केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुना करने के लिए कई उपाय कर रही है जिसका लाभ स्वाभाविक रूप से मध्य प्रदेश के किसानों को भी मिल रहा है। इसी नीति के तहत शिवराज सिंह सरकार ने भी किसानों की उपज को लाभकारी न्यूनतम समर्थन मूल्य उपलब्ध कराने में खासा उत्साह दिखाया। किसानों ने शानदार उपलब्धियों की शक्ल में सरकार को रिटर्न गिफ्ट भी दिया है। पिछले दो वर्षो के कृषि परिणामों ने सरकार को यह प्रबल संदेश दे दिया है कि छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद अपने प्राकृतिक संसाधन नए राज्य के हिस्से में चले जाने से मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था को जो झटका लगा, किसान उसकी भरपाई करने में सक्षम हैं।

बहरहाल, यह केवल उस हालत में संभव होगा, जब सियासी दल कृषि और किसानों के प्रति संवेदनशील रहें। मौजूदा उपलब्धि किसानों के निजी संकल्प और परिश्रम का नतीजा है। कल्पना की जा सकती है कि किसानों को आधुनिक तकनीक और इनपुट का सहारा मिले तो वे क्या कर सकते हैं। प्रदेश के राजनीतिक दलों को अपने किसानों की क्षमता को समझना चाहिए। विभिन्न माध्यमों से प्राप्त संकेतों से स्पष्ट है कि कृषि और पर्यटन मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था की शक्ल बदलने की हैसियत रखते हैं, यद्यपि इस क्षमता का वास्तविक दोहन तब तक नहीं हो सकता, जब तक ये क्षेत्र सियासत की प्राथमिकता नहीं बनते। फिलहाल ये दोनों क्षेत्र उपेक्षित हैं।

मध्य प्रदेश भाग्यशाली है कि यहां सांप्रदायिक उन्माद और जातिवाद की बुराइयां उत्तर भारतीय राज्यों की तरह प्रबल नहीं हैं, किंतु कुछ खाली नेता कभी गांधी तो कभी सावरकर के नाम पर नकारात्मकता फैलाने के प्रयास में लगे रहते हैं। इन नेताओं को समझना चाहिए कि भारतीय जीवन परंपरा में पूर्वजों के केवल सद्गुणों और सद्कार्यो से सीख ली जाती है, छिद्रान्वेषण नहीं किया जाता। पूर्वजों के आचरण पर बहस के बजाय मौजूदा पीढ़ी को समाज और राजनीति के लिए अपने योगदान की सार्थकता पर ईमानदारी से विचार करना चाहिए।

चुनावी राजनीति में पक्ष-विपक्ष अपनी भूमिकाएं जरूर निभाएं, पर वोटबैंक की राजनीति के लिए प्रदेश के गर्व, क्षमताओं और उपलब्धियों के साथ खिलवाड़ कदापि न करें। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह अक्सर कहते हैं कि मध्य प्रदेश शांति का टापू है। उनका यह कथन फिलहाल अर्धसत्य है। राजनीतिक दल समझदारी का परिचय दें तो मुख्यमंत्री की इस भावना को पूर्ण सत्य में बदलना असंभव नहीं है।

[संपादक, नई दुनिया, मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़]

Edited By: Sanjay Pokhriyal