माला दीक्षित, नई दिल्ली। अयोध्या राम जन्मभूमि के मुकदमे की 40 दिन चली मैराथन सुनवाई में जहां हिन्दू और मुस्लिम पक्षकारों की ओर से अपने हक का दावा करते हुए लंबी चौड़ी दलीलें रखी गईं वहीं कोर्ट ने केस की पेचीदिगियां और दावों की गहराई समझने के लिए बहस कर रहे वकीलों से बहुत से सवाल भी पूछे। सुनवाई कर रही पांच न्यायाधीशों की पीठ में से जस्टिस एसए बोबडे ने सबसे अधिक सवाल पूछे जबकि जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने सबसे कम। इतना ही नहीं सवाल पूछने के दौरान न्यायाधीशों की अपनी अपनी शैली और विशेष भावभंगिमा भी ध्यान देने लायक थी।

मुकदमे की 40 दिन चली सुनवाई

इस मुकदमे की 40 दिन चली सुनवाई की रोजाना रिपोर्टिग करने के दौरान जो देखा और जो सुना उसे कागज पर उकेर कर पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास है। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर ने की। जस्टिस बोबडे ने जो सवाल पूछे उसमे देवता किसे कहा जाएगा। देवता कैसा होगा निराकार या साकार। स्वयं भू कैसा होगा। क्या मूर्ति के बगैर भी मंदिर हो सकता है। और फिर उसके बाद उनका स्वयं ही दक्षिण भारत के चिदंबरम मंदिर का उदाहरण देना। इतना ही नहीं जस्टिस बोबडे ने सुनवाई के दौरान चिदंबरम का अर्थ भी बताया कि चिदंबरम का मतलब चित और अंबर मिलकर है। चिदंबरम मंदिर आकाश का मंदिर है जहां कोई मूर्ति नहीं है।

काबा स्वयं प्रकट है या बनाया गया

इतना ही नहीं जस्टिस बोबडे ने मुस्लिम पक्ष की ओर से पैरोकारी कर रहे वरिष्ठ वकील राजीव धवन से यह भी पूछा था कि काबा स्वयं प्रकट है या बनाया गया। हालांकि इस सवाल जवाब धवन के बजाये मुस्लिम पक्ष की ओर से सुनवाई में मदद कर रहे वकील एजाज मकबूल ने दिया था कि काबा का निर्माण पैगंबर ने कराया था। मस्जिद में इस्लाम की मान्यता के मुताबिक क्या होना चाहिए और क्या नहीं इससे संबंधित भी बहुत से सवाल जस्टिस बोबडे ने पूछे थे। यह भी पूछा था कि और कौन सी मस्जिदे हैं जहां आकृतियां चित्र और फूल पत्ती बने हैं। इसके जवाब में राजीव धवन ने कोर्ट में एक लिखित नोट भी दिया था जिसमें कुतुबमीनार के पास बनी मस्जिद के अलावा देश के अन्य हिस्सों में स्थिति कुछ मस्जिदों का हवाला दिया गया था। धवन का कहना था कि मस्जिद सिर्फ मुस्लिम मजदूरों ने नहीं बनाई थी इसलिए वहां सजावट के लिए फूल पत्ती आदि भी बने होते हैं और इसे इस्लाम के खिलाफ नहीं कहा जा सकता।

कई बार मैग्नीफाइंग ग्लास का भी प्रयोग किया

जस्टिस बोबडे ने विवादित जमीन से जुड़ी फोटुएं और पुराने महीन नक्शों और दस्तावेजों को देखने के लिए सुनवाई के दौरान कई बार मैग्नीफाइंग ग्लास का भी प्रयोग किया जिस पर राजीव धवन ने भी कई बार टिप्पणी की। जब सुन्नी वक्फ बोर्ड की ओर से जफरयाब जिलानी ने कहा कि आइने अकबरी को भारत का सांस्कृतिक शब्दकोष कहा जा सकता सकता है इसमे हर छोटी बड़ी घटना का जिक्र है लेकिन इसमे अयोध्या में राम जन्मस्थान का जिक्र नहीं है। इस दलील पर जस्टिस बोबडे ने जिलानी से सवाल किया था कि क्या उसमें बाबरी मस्जिद का जिक्र है। जिलानी ने कहा कि इसमें उस मस्जिद का भी जिक्र नहीं है। इसका आगे स्पष्टीकरण देते हुए जिलानी ने कहा कि आइने अकबरी मे सिर्फ महत्वपूर्ण चीजों का जिक्र है, अयोध्या मे बहुत सी मस्जिदें थी इसलिए इसमें उसका जिक्र नहीं है।

मस्जिद महत्वपूर्ण नहीं थी

जस्टिस बोबडे का अगला सवाल था कि बाबर के कमांडर द्वारा बनवाई गई मस्जिद महत्वपूर्ण नहीं थी। जिलानी ने फिर कहा अयोध्या मे बहुत सी मस्जिदें थीं। जस्टिस बोबडे ने अगला सवाल किया कि आइने अकबरी में मस्जिद का जिक्र न होने को क्या दूसरी तरह नहीं समझा जा सकता, कि जैसे वहां मस्जिद रही ही न हो। जिलानी ने कहा कि रामलला के मुकदमें मे भी कहा गया है कि वहां बाबर ने मस्जिद बनवाई थी। जस्टिस बोबडे ने कहा कि वह गलत भी तो हो सकते हैं।

बाबर ने मस्जिद बनवाई थी

तभी जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि रामलला के मुकदमें में गैजेटियरों के आधार पर कहा गया है कि वहां बाबर ने मस्जिद बनवाई थी। जस्टिस बोबडे का सवाल करने का तरीका अलग होता था। वह अपनी कुर्सी पर काफी आराम की मुद्रा में बैठकर सवाल करते थे और जवाब आने तक ध्यान से उस वकील को देखते रहते थे। एक सवाल से अगला और अगले के बाद और दूसरा पूछते थे जबतक कि उन्हें अपनी बात का संतोषजनक जवाब नहीं मिल जाता वह एक सवाल को कई तरह से पूछते रहते थे। उन्होंने विवादित स्थान के बारे में भी बहुत से सवाल पूछे थे। जस्टिस बोबडे के बाद अगर दूसरे नंबर पर किसी ने वकीलों से सबसे ज्यादा सवाल पूछे तो वह थे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़।

जस्टिस चंद्रचूड़ के कई सवाल जवाब की अपेक्षा करने वाले थे

जस्टिस चंद्रचूड़ भी अपना सवाल कई तरह से घुमा-घुमा कर पूछते थे ताकि जिस चीज का वह जवाब जानना चाहते हैं वह निकल कर सामने आये। जस्टिस चंद्रचूड़ का सवाल पूछने का तरीका बिल्कुल अलग होता था। वह उस सवाल में इस तरह इन्वाल्व हो जाते थे कि सवाल पूछते वक्त उनके शब्द, चेहरे और हाथों की भावभंगिमा भी सवाल पूछने मे शामिल होती थी। जैसे कि वह अपनी बात पूरी तरह से सामने वाले को स्पष्ट कर देना चाहते हैं ताकि उसे जवाब देने में कोई अस्पष्टता न रहे। जस्टिस चंद्रचूड़ ने विवादित स्थान, हिन्दू धर्मावलंबियों के वहां पूजा करने और अंग्रेजों द्वारा रेलिंग लगाकर विवादित स्थल का अंदरूनी और बाहरी अहाता अलग अलग किये जाने से संबंधित बहुत से सवाल पूछे, उनके कई सवाल ऐसे थे जो पुराने कालखंड की परिस्थितियों को देखते हुए जवाब की अपेक्षा करने वाले थे। विवादित स्थल के अंदर के हिस्से में रेलिंग लगने के बाद तुरंत ही बाहर राम चबूतरा बनना और वहां हिन्दुओं का जन्मस्थान कहते हुए पूजा शुूरू कर देने के मायनों को लेकर भी उन्होंने सवाल किये।

जस्टिस अशोक भूषण ने कम सवाल किये

तीसरे नंबर पर जस्टिस अशोक भूषण आते हैं उन्होंने जस्टिस बोबडे और जस्टिस चंद्रचूड़ की तुलना में कम सवाल किये लेकिन फिर भी विवादित स्थल को राम जन्मस्थान मानने और वहां लगातार पूजा किये जाने के बारे मे हाईकोर्ट मे आये साक्ष्यों और गवाहियों से जुड़े गई सवाल जस्टिस भूषण ने वकीलों से पूछे। रामलला के वकील से उन्होंने जन्मस्थान को न्यायिक व्यक्ति मानने की दलीलों पर सवाल पूछे थे। जस्टिस अशोक भूषण संक्षिप्त और सीधा सवाल पूछते थे। सवाल पूछते वक्त उनके चेहरे के भाव भी ज्यादा बदलते नहीं थे बहुत कम बार ऐसा हुआ कि उन्होंने अपनी बात को ज्यादा जोर देकर कहा हो। उसमें से एक प्रकरण था जबकि राजीव धवन रेलिंग के पार पूजा होने के संबंध में हाईकोर्ट मे हुई गवाही का हवाला दे दलीले रख रहे थे तभी जस्टिस भूषण ने उन्हें टोकते हुए कहा कि आप गवाही का पूरा अंश पढि़ए चुना हुआ हिस्सा कोर्ट मे न रखें। इस पर धवन ने जस्टिस भूषण के यह कहने पर टिप्पणी भी की थी जिस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने ऐतराज जताया था।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने वकीलों से काफी कम सवाल पूछे

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने बहस कर रहे वकीलों से काफी कम सवाल पूछे। उन्होंने निर्मोही अखाड़ा से उसका दावा साबित करने के लिए सबूत देने को लेकर कुछ सवाल किये थे। इक्का दुक्का सवाल और किये। जस्टिस गोगोई के सवाल पूछने का तरीका एकदम सीधा और सटीक होता था। हालांकि सवाल करते वक्त चेहरे के भाव में थोड़ा अंतर आता था जैसे कि वह अपनी बात पर जोर दे रहे हैं। जस्टिस अब्दुल नजीर ने सबसे कम सवाल किये। हालांकि उन्होंने एएसआइ की खुदाई में मिले ढांचे को मुस्लिम पक्ष द्वारा ईदगाह और कनाती मस्जिद बताए जाने की दलीलों पर उन्होंने सवाल किया था कि अगर वह मस्जिद थी तो इमाम के बैठने की जगह कहां थी। जस्टिस नजीर का सवाल पूछने का तरीका काफी हल्का फुल्का होता था। ऐसे मे जवाब देने वाला वकील दबाव नहीं महसूस करता हालांकि वकील सवाल का उसी तत्परता से जवाब देते थे जैसे पीठ के अन्य न्यायाधीशों के सवालों का देते थे।

सुनवाई की ऐसी बहुत सी चीजें थीं जो छोटी छोटी मगर ध्यान खींचने वाली लगती थीं। सुनवाई के दौरान ही एक दिन राजीव धवन ने हिन्दू महासभा के वकील विकास सिंह की ओर से पेश किया गया विवादित भूमि का नक्शा फाड़ दिया था। वह घटना भी अलग थी। धवन ने बीच सुनवाई मे नये दस्तावेज पेश करने का विरोध करते हुए पीठ से कहा था कि इन्हें स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। ये रिकार्ड पर नहीं लिये जा सकते। और फिर उन्होंने कहा कि मै इन्हें नहीं स्वीकार करता। पीठ ने कहा ठीक है। धवन ने पीठ से कहा तो क्या मै इसे फाड़ दूं।

Posted By: Bhupendra Singh

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