नई दिल्ली [जागरण ब्यूरो]। देश के प्रमुख उद्योगपति विजय माल्या के लंदन भागने को लेकर उपजे नए विवाद के मामले में देश का सबसे बड़ा बैंक भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) भी फंसता दिख रहा है। खास तौर पर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट में एसबीआइ की तरफ से माल्या के खिलाफ मामला देख रहे एक वकील ने बैंक पर बेहद सुस्त रवैया अपनाने का आरोप लगाया है उसका भी बैंक कोई ठोस जबाव नहीं दे पाया है।

वैसे आधिकारिक तौर पर एसबीआइ का कहना है कि विजय माल्या के मामले में उसने जो भी किया वह नियमों के मुताबिक किया और उनसे कर्ज वसूलने में कोई कोताही नहीं की गई। हालांकि एसबीआइ यह जवाब नहीं दे पाया कि उसने माल्या के विदेश जाने की सूचना मिलने के बावजूद आपातकालीन तौर पर कोई कदम क्यों नहीं उठाये।

सीबीआइ के भरोसे बैठा रहा एसबीआइ!

दैनिक जागरण ने एसबीआइ के कुछ आला अधिकारियों से बात की जो तीन वर्ष पहले किंगफिशर एनपीए मामले को सीधे तौर पर देख रहे थे। उनका कहना है कि माल्या के खिलाफ समय पर ठोस कार्रवाइ नहीं होने के पीछे एक वजह यह भी था कि वह राज्य सभा के सांसद थे। साथ ही सीबीआइ ने अपनी जांच प्रक्रिया के तहत उनके विदेश जाने पर रोक लगाई हुई थी।

माल्या के विदेश जाने के बाद ही यह पता चला कि सीबीआइ ने माल्या के विदेश जाने संबंधी नियमों में ढील दे दी थी। यह भी एक वजह है कि जब कानूनी सलाहकारों ने विदेश जाने की संभावना जताते हुए माल्या के खिलाफ दूसरे कदम उठाने का सुझाव दिया तो उस पर तुरंत कार्रवाई नहीं की गई। क्योंकि सभी को यह भरोसा था कि सीबीआइ के निर्देश के मुताबिक माल्या के एयरपोर्ट पर पहुंचते हुए उसे गिरफ्तार कर लिया जाएगा लेकिन बैंक अधिकारियों को यह मालूम नहीं था कि इस नियम में बदलाव कर दिया गया है। नये नियम में एयरपोर्ट पर तैनात सुरक्षा अधिकारियों को माल्या के बारे में सिर्फ सूचना देने का बात कही गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के वकील दुष्यंत दवे ने यह दावा किया है कि उन्होंने एसबीआइ को बताया था कि माल्या जल्द ही विदेश भाग सकते हैं। इसलिए उन्हें रोकने की कोशिश होनी चाहिए। इसके लिए वह सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचे थे लेकिन एसबीआइ का प्रतिनिधि नहीं आने की वजह से कोई कार्रवाई नहीं हो सकी।

'आसान नहीं सांसद के खिलाफ कार्रवाई करना'

इस बारे में एसबीआइ के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि किसी भी सरकारी बैंक के लिए एक सांसद के खिलाफ कार्रवाई करना आसान नहीं होता। साथ ही यह मामला सिर्फ एसबीआइ का नहीं था बल्कि इस बारे में फैसला करने से पहले माल्या की कंपनी किंगफिशर को कर्ज देने वाले 17 अन्य बैंकों के कंसोर्टियम को भी सूचना देनी थी और उनसे मंजूरी लेनी थी। इस काम को रातों रात नहीं किया जा सकता था।

Posted By: Vikas Jangra