नई दिल्‍ली, प्रेट्र। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति एम.वेंकैया नायडू ने पार्टी बदलने वालों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई के लिए दलबदल रोधी कानून में सुधार के अपने सुझाव पर रोशनी डालते हुए कहा कि अपनी पार्टी छोड़ने वालों को सदन की सदस्यता भी त्याग देनी चाहिए। उन्होंने उच्च सदन की प्रतिष्ठा को बहाल करना अपनी अविलंब प्राथमिकता बताते हुए व्यवस्था में खलल डालने वाले सदस्यों से निपटने के लिए नियमों की रूपरेखा फिर से तैयार करने की जरूरत बताई।

मंगलवार को एक इंटरव्यू में वेंकैया नायडू ने पार्टी बदलने वाले किसी सदस्य के खिलाफ शिकायत मिलने पर पीठासीन अधिकारियों की ओर से तीन महीने में निर्णय सुनाने और चुनाव संबंधी याचिकाओं के त्वरित निस्तारण के लिए विशेष अदालतें बनाने जैसे कुछ सुधार भी सुझाए।पिछले महीने ही उपराष्ट्रपति के रूप में एक साल का कार्यकाल पूरा करने वाले नायडू ने कहा कि दलबदल पर मौजूदा कानून में सदस्यों के खिलाफ राजनीतिक दलों की शिकायतों के निस्तारण के लिए पीठासीन अधिकारियों के लिए कोई समयसीमा निर्धारित नहीं है। कानून के अनुसार अगर किसी पार्टी के कम से कम दो तिहाई सदस्य पार्टी छोड़ते हैं तो सदस्यता समाप्त होने जैसे दंडनीय प्रावधानों से बचा जा सकता है।
दलबदल के मामलों में पीठासीन अधिकारियों के फैसला सुनाने में देरी पर उन्होंने कहा कि इस तरह के भी उदाहरण रहे हैं जब फैसला आने में पांच साल लग गए। यह गलत है और सभी याचिकाओं का निस्तारण तीन महीने में होना चाहिए। जदयू के राज्यसभा सदस्य शरद यादव को अयोग्य करार देने की इस पार्टी की याचिका पर अपने फैसले का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि उन्होंने रास्ता दिखाया है। नायडू ने पिछले साल यादव के खिलाफ शिकायत मिलने के तीन महीने के अंदर उन्हें अयोग्य करार दिया था।
उन्होंने राजनीतिक दलों से राज्यों में विधान परिषदों के लिए राष्ट्रीय नीति पर आम-सहमति बनाने को भी कहा। उन्होंने कहा, 'समय आ गया है कि व्यवस्था में खलल डालने वाले सदस्यों से निपटने के लिए संसद के नियमों की रूपरेखा फिर से बनाई जानी चाहिए और यदि आमसहमति बनती है तो यह संभव है।' उन्होंने कहा कि राज्यसभा के नियमों में संशोधन के लिए उनकी ओर से नियुक्त समिति ने प्रारंभिक रिपोर्ट जमा कर दी है और अक्टूबर के अंत तक अंतिम रिपोर्ट जमा करेगी।राज्यसभा के सभापति के तौर पर कार्यकाल के दूसरे साल में प्राथमिकताएं पूछे जाने पर नायडू ने कहा, 'मेरी तत्काल चिंता राज्यसभा की प्रतिष्ठा और व्यवस्था को बनाये रखना है।'

बिना अनुशासन कोई देश प्रगति नहीं कर सकता 
प्रधानमंत्री के अनुशासनप्रिय कहकर प्रशंसा करने के कुछ दिन बाद उपराष्ट्रपति ने कहा कि बिना अनुशासन के कोई देश प्रगति नहीं कर सकता। वह कम्युनिस्ट देश चीन की प्रणाली से सहमत नहीं, लेकिन अनुशासन से उन्हें मदद मिली है।
आरक्षण वाली जातियों का समान हो प्रतिनिधित्व 
उन्होंने आरक्षण का लाभ पाने वाली सभी जातियों के समानुपात में प्रतिनिधित्व की भी वकालत की। नायडू ने कहा कि आरक्षण से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए लेकिन इसके अंदर विभिन्न समुदायों, वगरें और उपवगरें को समानुपात में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
महाभियोग पर त्वरित निर्णय जरूरी था 
प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग चलाने के लिए कांग्रेस नीत विपक्ष के कदम का उल्लेख करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि इस पर निर्णय त्वरित होना जरूरी था। ऐसे मामलों में देरी से संस्था लड़खड़ा सकती है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh