सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। यह बहुत अविश्वसनीय लग सकता है कि सक्रिय राजनीति में पचास से ज्यादा सफल साल गुजार चुके लोजपा अध्यक्ष राम विलास पासवान के जीवन में एक वक्त ऐसा भी आया था जब उन्हें संसदीय लोकतंत्र पर बहुत भरोसा नहीं था। बजाय इसके उनके मन में समाज के दबे और पिछड़ों को न्याय दिलाने के लिए नक्सलवाद के प्रति आकर्षण बढ़ने लगा था। यह आकर्षण इतना ताकतवर था कि पहले ही चुनाव में जीतने के बावजूद संसदीय लोकतंत्र में मन नहीं रम रहा था। भला हो उस जेपी आंदोलन का जिसके सर्वधर्म और सर्वजातीय स्वरूप ने उनके अंदर चल रहे द्वंद को बाहर निकाल फेंका और फिर कभी लोकतंत्र से विचलित नहीं होने दिया।

राम विलास पासवान का जीवन विभिन्न अनुभवों से भरा रहा है। चार नदियों से घिरे दलितों के गांव की ज्यादातर उपजाऊ जमीन बड़ी जातियों के लोगों के कब्जे में थी, जो यहां खेती करने और काटने आते थे। ऐसा नहीं था कि पासवान को मूलभूत जरूरतों के लिए संघर्ष करना पड़ा था लेकिन आसपास ऐसे हालात देखने को खूब थे। पिताजी के मन में बेटे को पढ़ाने की ललक ऐसी कि उसके लिए कुछ भी करने को तैयार। पहला हर्फ गांव के दरोगा चाचा के मदरसे में सीखा। तीन महीने बाद ही तेज धार वाली नदी के बहाव में मदरसा डूब गया। फिर दो नदी पार कर रोजाना कई किमी दूर के स्कूल से थोड़ा पढ़ना लिखना सीख गये। जल्दी ही शहर के हरिजन छात्रवास तक पहुंच बनी, फिर तो वजीफे की छोटी राशि से दूर तक का रास्ता तय कर लिया। पढ़ाई होती गई और आगे बढ़ने का मन भी बढ़ता गया। एक अड़चन जरूर आई, हॉस्टल में रहते हुए आंखों की रोशनी कम होने लगी। डॉक्टर को दिखाया तो लालटेन की रोशनी में पढ़ने को मना कर दिया। तब पासवान की दूसरी शक्ति जाग्रत हुई। श्रवण व स्मरण शक्ति कई गुना बढ़ गई। वह क्लास में बैठते और एकाग्रता से सुनते, वहीं याद भी करते जाते। आज आप पासवान से मिलने जाएं तो आभास हो जाएगा कि उनकी स्मरण शक्ति कितनी तेज है।

हॉस्टल में रहते हुए फिल्मों का चस्का भी खूब लगा। लिहाजा घर से आए अनाज के कुछ हिस्से को सामने के दुकानदार के पास बेचकर फिल्म का शौक भी पूरा करने लगे। खैर पढ़ाई पूरी होने लगी तो घर से नौकरी का दबाव भी बढ़ने लगा। दरोगा बनने की परीक्षा दी पर पास न हो सके। लेकिन कुछ ही दिन बाद डीएसपी की परीक्षा में पास हो गए। घर में खुशी का माहौल था लेकिन पासवान के दिमाग में कुछ और ही चल रहा था। उनके गृह जिला खगड़िया के अलौली विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव होना था और वह घर जाने की बजाय पहुंच गए टिकट मांगने सोशलिस्ट पार्टी के दफ्तर। उस वक्तकांग्रेस के खिलाफ लड़ने के लिए कम ही लोग तैयार हुआ करते थे।

सो टिकट मिल भी गया और वे जीत भी गए। पिताजी का दबाव पुलिस अफसर बनने पर था लेकिन दोस्तों ने कहा- सर्वेंट बनना है या गवर्नमेंट, ख़ुद तय करो। नतीजा सामने है। लंबी राजनीतिक यात्र रही। कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

पर इससे पहले की जिंदगी प्रयोग और रोमांच से भरी थी। कॉलेज में रहते हुए पासवान अपने साथियों के साथ हर साल नौ अगस्त को भूमि मुक्ति आंदोलन करते हुए 'धरती चोरों-धरती छोड़ो' के नारे के साथ जेल जरूर जाते थे। यह राजनीतिक यात्रा की शुरूआत थी। जेल से बाहर आने के लिए कभी जमानत नहीं मांगते थे। 14 अक्टूबर से पहले जेल से छूटना नहीं चाहते थे। इसके पीछे की एक रोचक दास्तां भी है। बकौल, पासवान 14 अक्टूबर को जेल में जाड़े का मौसम घोषित हो जाता था, तब सभी कैदियों को गरम कपड़ा मिल जाता था। इसमें पैंट, शर्ट, कोट और कंबल बांटा जाता था।

राजनीतिक जीवन में उतरे रामविलास पासवान, कांशीराम और मायावती की लोकप्रियता के दौर में भी, बिहार के दलितों के मज़बूत नेता के तौर पर लंबे समय तक टिके रहे हैं। उनकी खूबी यह है कि दलित उन्हें अपना मानते हैं और अगड़ी जाति भी उन्हें नेता के रूप में स्वीकारती है। पहली पढ़ाई मदरसे से शुरू करने वाले पासवान का अल्पसंख्यक प्रेम दिखावा या सिर्फ राजनीतिक नहीं कहा जा सकता है। राजनीति की परख इतनी है कि वह आने वाले वक्त को पहचानते हैं और भविष्य का फैसला अक्सर सौ फीसदी दुरुस्त होता है।

Posted By: Shashank Pandey

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस