नई दिल्ली, जेएनएन। सचिन पायलट का यह बगावती तेवर नहीं बदला तो मध्यप्रदेश की तरह राजस्थान में भी भाजपा सत्ता में बदलाव के लिए पूरी तैयार बैठी है। पायलट के अब भाजपा नेताओं से संपर्क में होने की बात कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता अनौपचारिक बातचीत में स्वीकार भी कर रहे हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने तो साफ कहा कि पायलट के तेवरों को देखते हुए इनके बगावत की राह से लौटने की गुंजाइश धीरे-धीरे कम होती जा रही है। वैसे पार्टी सूत्रों ने बताया कि हाईकमान भी एसओजी के नोटिस प्रकरण को लेकर गहलोत के कदमों से सहमत नहीं है। इसीलिए हाईकमान ने पायलट को भरोसा देने का संदेश देने के लिए राहुल के करीबी नेताओं को बतौर पर्यवेक्षक जयपुर भेजने का फैसला किया। अविनाश पांडेय चाहे सरकार पर खतरा नहीं होने का दावा करें मगर 16 कांग्रेस और 3 निर्दलीय विधायकों के पायलट के समर्थन में मानेसर के एक होटल में आने की घटना से साफ है कि सचिन पायलट वर्चस्व की इस जंग में आर-पार की लड़ाई की तैयारी में हैं। 

पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से आर-पार की जंग का एलान करते हुए दावा किया कि 30 से अधिक विधायक उनके साथ हैं। कई निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल होने की बात कह गहलोत सरकार के अल्पमत में होने का भी दावा किया है। वह भाजपा से संपर्क में हैं और राजस्थान में मध्य प्रदेश की कहानी दोहराए जाने के आसार हैं। रविवार को दिल्ली में उन्होंने ज्योतिरादित्य सिंधिया से उनके आवास पर मुलाकात भी की। वहीं, देर रात पायलट खेमे के एक विधायक ने बताया कि पायलट समर्थक विधायक आज इस्तीफा दे सकते हैं।

गहलोत सरकार को खतरा बरकरार

पायलट और ज्योतिरादित्य की दोस्ती, भाजपा नेताओं से संपर्क और सीएम से नाराजगी जैसे इन सारे तारों को जोड़ने के बाद साफ है कि गहलोत सरकार पर खतरे के बादल हैं। इस बात की चर्चा जोर पकड़ रही है कि क्या कांग्रेस के असंतुष्ट गुट के साथ मिलकर भाजपा मध्य प्रदेश और कर्नाटक की कहानी राजस्थान में भी दोहरा सकती है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर गहलोत पर सरकार पर सियासी सर्जिकल स्ट्राइक होती है तो उसमें ज्योतिरादित्य की भूमिका को भी इंकार नहीं किया जा सकता है। क्योंकि, जो स्थिति कमलनाथ सरकार में ज्योतिरादित्य की थी। कुछ वैसी ही गहलोत सरकार में सचिन पायलट की है। बार-बार मुख्यमंत्री के साथ टकराव होता हैं।

जानें- क्या हो सकता है

 - पायलट के दावे के मुताबिक, कांग्रेस के 30 विधायक सरकार का साथ छोड़ते हैं तो विस की सदस्य संख्या 170 रह जाएगी और बहुमत के लिए 86 विधायकों की जरूरत होगी। ऐसे में कांग्रेस के पास सहयोगियों समेत 94 विधायकों का समर्थन होगा और गहलोत की सरकार संभवत: बनी रहेगी।

- सूत्रों के मुताबिक, कुछ निर्दलीय भी पायलट के संपर्क में हैं। अगर उन्होंने भाजपा का दामन थामा तो तस्वीर बदल सकती है।

- मप्र में कमल नाथ सरकार को मामूली बहुमत हासिल था और ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके समर्थकों के साथ छोड़ देने से सरकार गिर गई थी। राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस के बीच अंतर बड़ा है।

राजस्थान विस की स्थिति

राज्य विधानसभा में दलीय स्थिति को देखें तो कांग्रेस के पास 107 विधायकों का समर्थन है। इसके अलावा सरकार को 13 निर्दलीय और एक राष्ट्रीय लोकदल के विधायक का भी समर्थन है यानी कांग्रेस के पास 121 विधायकों का समर्थन है । भाजपा के पास 72 विधायक हैं । राष्ट्रीय लोकदल के 3,माकपा व बीटीपी के 2-2 विधायक हैँ। अगर मध्य प्रदेश की तर्ज पर कांग्रेस के कुछ विधायक विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे देते हैं और निर्दलीय भी कांग्रेस के बजाय भाजपा का समर्थन कर दें तो गहलोत सरकार अल्पमत में आ सकती है। पायलट के समर्थक 20 विधायक हैं। इनमें 13 एनसीआर के होटल में हैं। 3 निर्दलीय भी पायलट के साथ है । अगर 23 विधायक इस्तीफा दे देते हैं तो सदन में विधायकों की कुल संख्या 177 रह जाएगी और बहुमत साबित करने का आंकड़ा 101 से कम होकर 90 रह जाएगा। भाजपा के पास इस समय 72 विधायक हैं। अगर उसे 13 निर्दलीयों का भी समर्थन मिल जाए तो उसके समर्थक विधायकों की संख्या 85 तक पहुंच जाती है।

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