नई दिल्ली, प्रेट्र। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि मुकदमों में न्याय मिलने में अत्यधिक देरी का कारण स्थगनादेश की संस्कृति को मानक बना लेना है। न्यायपालिका इस आचरण को बदलने का प्रयास कर रही है।

देश की विभिन्न अदालतों में लंबित मामलों की समस्या पर राष्ट्रपति ने शनिवार को कहा कि सुनवाई के स्थगन की संस्कृति अपवाद होने के बजाय एक मानक बना दी गई है। हालांकि बार-बार के स्थगन पर धीरे-धीरे एक नई विचारधारा उत्पन्न हो रही है। उन्होंने कहा कि अत्यधिक देरी भारतीय कानून प्रणाली की पहचान बन गई है। इसका एक कारण आधारभूत ढांचे में गैप और रिक्तियां हैं। यह समस्या निचली अदालतों में अधिक है।

उन्होंने कहा कि विश्व भर में भारतीय न्यायपालिका का सम्मान है। चूंकि वह पीडि़तों के लिए न्याय करते हैं। लेकिन यह बात भी सही है कि मुकदमों की अधिकता से जज काम के बोझ से दबे हुए हैं। नतीजतन भारतीय कानून प्रणाली को लंबे चलने वाले मुकदमो के लिए जाना जाता है।

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड एसोसिएशन (एससीएओआरए) के समारोह में राष्ट्रपति ने कहा कि देश की विभिन्न अदालतों में 3.3 करोड़ मामले लंबित हैं। इनमें से 2.84 करोड़ लंबित मामले निचली अदालतों में हैं। अन्य 43 लाख लंबित मामले उच्च न्यायालयों में हैं। और करीब 58,000 मामले सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कहा कि तकनीकी संसाधनों से न्यायिक डाटा बेस को और सशक्त बनाया जा सकता है।

कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर नियमों का पालन निर्भर: चीफ जस्टिस

भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने कहा है कि कानून के नियमों का अनुपालन देश में कानूनी शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

चीफ जस्टिस मिश्रा ने शनिवार को दसवें लॉ टीचर्स डे अवार्ड समारोह के उद्घाटन भाषण में कहा कि कानूनी शिक्षा एक विज्ञान है। इससे कानून के छात्रों में परिपक्वता आती है। वह समाज को समझने लगते हैं। और नागरिक जिम्मेदारियों की संरक्षा के लिए खुद को ढाल लेते हैं।

 

Posted By: Bhupendra Singh