नीलू रंजन, नई दिल्ली। ओडिशा के नीलगिरी जिले के गोपीनाथपुर में एक छोटी सी झोपड़ी के बाहर कार्यकर्ताओं का जमावड़ा लगा था, कुछ लोग यज्ञ भी कर रहे थे ताकि उस घर में रहने वाली वृद्ध महिला का मन बदले और अपने बेटे प्रताप चंद्र सारंगी को चुनाव लड़ने की अनुमति दे दें। आखिरकार कार्यकर्ताओं का दबाव काम आया और सारंगी को विधायक का चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गई। लेकिन यह अनुमति लेने से पहले उन्हें अपनी माता को यह समझाना पड़ा कि विधायक बनने के बाद वह जनसेवा ही करेंगे, कोई रिश्वत नहीं लेंगे और न ही झूठे वादे करेंगे। दरअसल, उनकी माता ने तीन-चार एमएलए का नाम लेते हुए बताया था कि नौकरी दिलाने के नाम पर उन्होंने लोगों से पैसे लिए थे और अब लोग उन्हें गाली दे रहे हैं। आखिरकार अनुमति मिली और सारंगी विधायकी जीत भी गए। अब सांसद भी हैं और मंत्री भी लेकिन माता को दिया गया आश्वासन उन्हें याद है।

संन्यासी जीवन जीने वाले की कला
पांच साल की उम्र में पिता की मौत के बाद सारंगी ने माता का दामन जो थामा, वह पिछले साल उनकी मौत के बाद ही छूट पाया। एक बार संन्यासी बनने की जिद में माता को भी त्यागने की कोशिश जरूर की, लेकिन वह कोशिश सफल नहीं हो सकी। संन्यासी बनने के लिए रामकृष्ण मिशन के बेल्लूर मठ भी पहुंच गए। लेकिन वहां से उन्हें बैरंग वापस लौटा दिया गया। अपने माता की सेवा करने के लिए। त्याग, समाजसेवा और आध्यात्म में उनकी रुचि को देखते हुए कई मठों और संप्रदायों ने उन्हें अपने यहां साधु बनाने की पेशकश की, लेकिन रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के जीवन और व्यक्तित्व से प्रभावित प्रताप चंद्र सारंगी ने साफ मना कर दिया। उद्देश्य साफ था संन्यासी बनना है तो रामकृष्ण मिशन में, नहीं तो जीवन भर अविवाहित रहते हुए समाज की सेवा करनी है और यही दूसरा रास्ता उन्हें पसंद आया।

साइकिल पर घूमते और झोपड़ी में रहने वाले 'सारंगी'
छोटी सी झोपड़ी में रहना और दो बार विधायक रहने के बावजूद साइकिल पर घूमते हुए प्रताप चंद्र सारंगी को देखने वालों को शायद ही मालूम होगा कि उनका जन्म नीलगिरी के सबसे बड़े जमींदार परिवार में हुआ था। लेकिन पिता की मौत के पांच-छह साल बाद पारिवारिक कलह के बीच अचानक उनकी माता ने घर छोड़ने का फैसला किया और रात में अपने बच्चों के साथ छोटी सी गठरी में कुछ सामान लिए गोपीनाथपुर आ गईं। दिल्ली में केंद्रीय मंत्री परिषद का सदस्य बनने तक यही उनका पता रहा। कभी पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करने का विचार भी नहीं आया।

विवेकानंद से प्रभावित रहा जीवन
अपनी माता के अलावा प्रताप चंद्र सारंगी के जीवन में यदि किसी दूसरे व्यक्ति का सबसे अधिक प्रभाव था तो वो थे स्वामी विवेकानंद। आठवीं कक्षा में पढ़ने के दौरान एक सज्जन स्कूल आए और विवेकानंद का भाषण दिया। इसका सारंगी के मन पर गहरा प्रभाव पड़ा। इसके बाद बगल के गांव के रहने वाले एक व्यक्ति से विवेकानंद पर पुरानी पुस्तकें आधी कीमत पर खरीद कर ले आए। बाद में महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस और सरदार पटेल की जीवनी ने भी प्रताप सारंगी पर गहरा प्रभाव डाला।

सामाजिक कार्य से मिली जीवन में प्रेरणा
सादगी और समाजसेवा से विचारों से लबरेज सारंगी के जीवन को दिशा दी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने। वैसे कॉलेज के प्रथम वर्ष 1972 में ही सारंगी आरएसएस के संपर्क में आ गए थे। लेकिन इसके दस साल बाद संघ में पूरी तरह सक्रिय हुए तो फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। तहसील, जिला से होते हुए बजरंग दल समेत आरएसएस के विभिन्न संगठनों में कई पदों पर रहे। 2004 में देश के सबसे पिछड़े जिले के रूप में चिह्न्ति नीलगिरी में लोगों के जीवन में गुणात्मक सुधार लाने को उन्होंने अपने जीवन का ध्येय बना लिया और इसके लिए शिक्षा का रास्ता चुना। यहां कई स्कूल खुलवाये। इसके रामकृष्ण मिशन, तिरूपति मंदिर, कलिंगा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंस से लेकर गुजरात के कई स्कूलों में बच्चों का नामांकन कराकर उन्हें उच्च स्तरीय शिक्षा उपलब्ध कराने में भी लगे और इसके लिए खेती और पेंशन से मिले पैसे को खर्च करते रहे।

सामाजिक कार्य में अति व्यस्त रहने वाले सारंगी को पढ़ने का मौका कम ही मिल पाता है। लेकिन यात्रा के दौरान बसों और ट्रेनों में वह अध्ययन करना नहीं भूलते हैं। सारंगी बहुभाषी भी हैं और यह संसद में अपने पहले संबोधन में ही उन्होंने साबित कर दिया। वह घंटों संस्कृत बोल सकते हैं और किसी को भी दस दिनों में बोलने लायक संस्कृत सिखाने का दावा भी करते हैं। यही नहीं संस्कृत का प्रचार-प्रसार करने के लिए अखिल भारतीय अमृतवाणी सेवा प्रतिष्ठानम् नाम की संस्था भी चलाते हैं। अब केंद्र सरकार में मंत्री रहते हुए उन्हें यह साबित करना होगा कि वह प्रशासन का जिम्मा भी संभाल सकते हैं।

Posted By: Shashank Pandey

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