राज्यवर्धन सिंह राठौर। लाल किले से हर 15 अगस्त को देश के प्रधानमंत्री अपनी जनता के नाम सम्बोधन देते हैं। इस बार स्वतंत्रता के 75 साल पूरे होने का जश्न अमृत महोत्सव के रूप में मनाया जा रहा है। हो सकता है कि आपके दिल में ये सवाल आता हो कि पन्द्रह अगस्त पर देश के प्रधानमंत्री लाल किले से ही क्यों राष्ट्र को सम्बोधित करते हैं, कहीं और से क्यों नहीं?

लाल किले से देश की कुछ भावनाएं हीं ऐसी जुड़ी हैं। देश की आजादी के ऐलान के वक्त देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने यहीं तिरंगा फहराया था। ये सिलसिला आगे लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी से होते हुए 18वें प्रधानमंत्री के रूप में माननीय नरेन्द्र मोदी भी निभाते आ रहे हैं। ऐसा कोई दस्तावेज या कोई लिखित संविधान नहीं कि लाल किले से ही झंडा फहराया जाए। लेकिन ये एक रिवायत है, परम्परा है, जिसे देश बड़े ही गौरव के साथ इस बार आज़ादी के 75वर्ष पूर्ण होने के उत्साह के साथ निभाएगा।

मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के लाल किले से पहले भाषण की बात कर लेते हैं। क्योंकि 2014 में जिस बहुमत के साथ एनडीए ने सरकार बनाई, वो एक इतिहास था। 2014 में लाल किले से दिए अपने पहले भाषण में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने खुद को 'प्रधान सेवक' कहकर सम्बोधित किया था। यह एक सामान्य शब्द नहीं था। इसकी चर्चा पूरी दुनिया में हुई।

आखिर ऐसा क्या कारण रहा होगा कि देश का प्रधानमंत्री और वो भी प्रचंड बहुमत से चुना प्रधानमंत्री, खुद को प्रधान सेवक क्यों बता रहा है? कारण था.. सहजता। एक गरीब परिवार से आने वाले व्यक्ति का देश का प्रधानमंत्री बनना। जीवन के संघर्षों का सफर तय करके देशवासियों के दिल में बस जाने वाला, हमेशा जनता के साथ ही दिखता है, इसलिए जनता की बात करता है। पहले ही स्वतंत्रता दिवस भाषण में मोदी जी ने देश को बता दिया कि मैं राज करने नहीं, सेवा करने आया हूं।

देश के एक बड़े वर्ग ने इस भाषण और इस शब्द की तुलना पिछले प्रधानमंत्रियों के भाषण से भी की। स्वभाविक सी बात है, डेढ़ सौ करोड़ लोगों का इतना बड़ा देश है, उसके प्रधानमंत्री की कही बात की तुलना पिछले प्रधानमंत्रियों से तो होगी ही। ध्यान देने वाला तथ्य है कि कई बार लाल किले से कुछ ऐसी बातें भी पहले कही गईं, जो विचारनीय रही, देश के लिए गंभीर रही।

1959 को लाल किले से दिया वो भाषण याद कीजिए, जिसमें मौजूदा प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने देश की जनता को 'लेजी' कहा था। जी हां, अगर आप यह बात पहली बार सुन रहे हैं तो हैरत होगी। ये हैरत पूरी दुनिया को हुई थी कि क्या कोई प्रधानमंत्री देश के स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश की जनता को मेहनत न करने वाला आलसी बताए। पर सच तो सच है। ऐसा हुआ है।

हाल ही में न्यूज 18 डॉट कॉम पर सुहास आम्बले का ऑपिनियन कॉलम पब्लिश हुआ था, उसमें भी एक बार फिर नेहरू के 'लेजी इंडियन्स' बयान पर झकझोरा गया था।

ये अकेला उदाहरण नहीं है, 1957 में भी नेहरू के लाल किले से राष्ट्र को सम्बोधन की आलोचना होती आई है। ये वक्त था जब पाकिस्तान POK पर हमला कर चुका था, तब देश के सैनिकों का हौसला बढ़ाने की बजाए नेहरू ने पाकिस्तान के साथ प्रेम का राग अलापने की बात कही थी।

ये ऑन रिकॉर्ड है और आकाशवाणी के आरक्राइव्स में सुरक्षित है। यूट्यूब पर भी आपको इसके लिंक आसानी से मिल जाएंगे। लाल किले से देश को स्तब्ध कर देने वाले भाषणों के क्रम में इंदिरा गांधी का नाम भी लिया जाता है। 1968 में उन्होंने देश के उद्योगपतियों को 'क्रुक्स' कहा था। 1975 में उन्होंने लाल किले से अपने भाषण में आपातकाल की तुलना देश की आजादी से कर डाली थी।

बहरहाल जो बीत गया सो बीत गया.. बस चर्चा होते रहनी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां कल आज और कल को जान सकें। 2014 अब तक के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के किसी भाषण को आप सुनिए। लगता है देश का एक आम आदमी, जनता का ही प्रतिनिधि जनता की बात कह रहा है। हर साल अपने रिपोर्ट कार्ड को सामने रखता है, उत्साह के लिए नारे देता है, आत्मनिर्भता के मंत्र देता है, देश के जवान, किसान और वैज्ञानिक का हौसला बढ़ता है। यही कारण है कि अब हर 15 अगस्त पर एक उत्सुकता रहती है, इस बार क्या कहेंगे प्रधान सेवक? इस बार भी है। है ना.. !

Edited By: Arun kumar Singh