जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। गुरुवार को एक बार फिर साबित हो गया कि संसद चाहे तो वक्त की बर्बादी की भरपाई मुश्किल नहीं है। गुरुवार को लोकसभा और राज्यसभा दोनों में देर रात तक बजट और रेल मंत्रालय की अनुदान मांगों पर चर्चा हुई। कोशिश यह रही कि जो भी सदस्य बोलना चाहे उसे अवसर मिले।

संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने बताया कि रेलवे के लिए अनुदान मांगों पर लोकसभा में गुरुवार रात 11.58 बजे तक चर्चा हुई। लगभग 18 साल में ऐसा पहली बार हुआ कि लोकसभा इतनी रात तक बैठी। जोशी ने बताया कि गुरुवार दोपहर बाद चर्चा शुरू हुई थी। लगभग 100 सदस्यों ने चर्चा में हिस्सा लिया।जोशी ने कहा कि इतनी देर तक लोकसभा का बैठना एक रिकॉर्ड है।

पिछले तीन चार दिनों से खासतौर पर राज्यसभा जहां विपक्ष का बहुमत है वहां कार्यवाही बाधित रही। कर्नाटक के मुद्दे पर सदन की कार्यवाही बार-बार स्थगित होती रही। और इसी कारण बजट पर चर्चा पूरी नहीं हो पाई, लेकिन गुरुवार को सरकार और विपक्ष ने आपसी समझ से तय कर लिया कि देर रात तक इसे पूरा कर ही कार्यवाही स्थगित की जाएगी। यही हुआ भी। सामान्यतया कार्यवाही छह बजे तक स्थगित हो जाती है।

बजट में गरीब, किसान व बेरोजगारों की उपेक्षा का आरोप
राज्यसभा में विपक्ष ने बजट को ऐसा दस्तावेज बताया जिसमें गरीबों, किसानों तथा बेरोजगारों के लिए ठोस योजनाओं के बजाय अवास्तविक लक्ष्य पेश किए गए हैं। दूसरी ओर भाजपा ने ये कहकर बजट का बचाव किया कि इससे विकास को गति मिलेगी।

राज्यसभा में बजट पर चर्चा में भाग लेते हुए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता व पूर्व वित्तमंत्री पी. चिदंबरम ने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण की ये कहते हुए खिंचाई की कि उन्होंने बजट भाषण में राजस्व प्राप्तियों और खर्चो समेत अर्थव्यस्था के वृहत आंकड़े तक नहीं बताए हैं। जबकि आम जनता बजट के कागजात नहीं पढ़ती, बल्कि वित्तमंत्री को सुनती है।

चिदंबरम ने जीडीपी का स्पष्ट अनुमान न दिए पर भी सवाल उठाया और कहा सरकार और मुख्य आर्थिक सलाहकार अलग-अलग अनुमान बता रहे हैं। अगर भारत के महालेखाकार के जीडीपी आंकड़ों के आधार पर विकास दर के अनुमान को देखा जाए तो यह 7 फीसद बैठती है, लेकिन वित्तमंत्री ने 8 फीसद विकास दर का अनुमान लगाया है। एक प्रतिशत का अंतर काफी बड़ा होता है।

यही नहीं, पिछले वर्ष जीएसटी संग्रह केवल 3.38 फीसद बढ़ने के बावजूद इस वर्ष इसमें 45 फीसद बढ़ोतरी का हवाई अनुमान लगाया गया है। इस तरह आप खर्च के लक्ष्य कैसे पूरे करेंगे। बजट में संरचनात्मक सुधारों की चर्चा तो है, मगर एक भी सुधार दिखाई नहीं देता। विकास के लिए खपत आवश्यक है, लेकिन गिरती खपत से आप निवेश के लिए संसाधन कहां से जुटाए जाएंगे। तीन वर्ष तक सकल फिक्स पूंजी निर्माण 28.5 तीन स्थिर रहा है जो वर्ष 2018-19 में जाकर 29.5 फीसद हुआ। जबकि कभी ये 34.5 फीसद था।

एनडीए सरकार के पांच वर्षो में अर्थव्यवस्था सुस्त रही है। पिछले वर्ष को छोड़, चार वर्षो में निर्यात 300 अरब डालर से आगे नहीं बढ़ा। ऐसे में आप कहां से कहते हैं कि निवेश बढ़ाने के लिए घरेलू बचत बढ़ना जरूरी है। मगर घरेलू बचत करने वाले मध्यम वर्ग के लिए आपने क्या किया। जब बचत नहीं बढ़ेगी तो निवेश के लिए अतिरिक्त पैसा कहां से आएगा। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) भी कहां बढ़ रहा है।

आपने सकल एफडीआइ 64.37 अरब डालर बढ़ने की बात कही है। लेकिन शुद्ध एफडीआइ कहां बढ़ा है। चर्चा में भाग लेते हुए तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर राय का कहना था कि बजट न तो बेरोजगार युवाओं की उम्मीदें बढ़ाता है और न बुजुर्गो की। वित्तमंत्री ने बजट छपते वक्त हलवा बांटा था, लेकिन कुछ हलवा आम आदमी को भी तो मिलता।

माकपा के डी. राजा ने कहा कि बजट में वास्तविक मुद्दों को छोड़ दिया गया है। यहां तक कि निजी निवेश बढ़ाने के लिए इसमें कुछ नहीं है। उन्होंने लाभदायक पीएसयू को बेचने की योजना का विरोध किया और सरकार से जानना चाहा कि उसने सामाजिक क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा मनरेगा, अल्पसंख्यकों तथा एससी/एसटी के लिए बजट में कितना आवंटन किया है।

विपक्षी नेताओं का कहना था कि किसानों की समस्याओं, आर्थिक मंदी, औद्योगिक सुस्ती तथा बेरोजगारी पर बजट एकदम चुप है, लेकिन भाजपा के प्रभात झा ने विपक्ष की आलोचना को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि वास्तव में ये गरीबों का बजट है। इसमें कृषि क्षेत्र के लिए आवंटन में खासी बढ़ोतरी की गई है, जिससे विकास दर बढ़ेगी।

उन्होंने कहा कांग्रेस ने दस दिनों में किसानों का कर्ज माफ करने के वादे के साथ हाल में पांच राज्यों में सरकार बनाई है। लेकिन अभी भी कर्ज माफ नहीं हुआ है। जुर्म आप करें और आरोप हम पर मढ़ दें।

भाजपा के अनिल जैन ने राज्यसभा में अपने पहले भाषण में बजट की तारीफ की। उन्होंने कहा पूर्व में गरीबी हटाओ के नारे खूब दिए गए पर किया कुछ नहीं गया। जबकि मोदी सरकार ने गरीबों के लिए सचमुच में काम कर उनकी दशा बदली है। पहले हर 15 दिन में घोटाले होते थे। जबकि अब हर 15 रोज में गरीबों के लिए कोई योजना आती है।

रेल को लेकर भी आरोप प्रत्यारोप

कांग्रेस पार्टी ने मोदी सरकार पर रेल की परिसंपत्तियों को बेचने का आरोप लगाया है। विपक्षी पार्टी का कहना है कि भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए जमीन पर ज्यादा कुछ करने के बजाय लोगों को सपने बेच रहा है। वहीं भाजपा ने विपक्ष के आरोपों को दरकिनार करते हुए रेल दुघर्टनाओं में बीते पांच साल में 73 प्रतिशत की कमी आने का दावा किया है।

रेल मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर चर्चा की शुरुआत करते हुए लोक सभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि नागर विमानन मंत्री एयर इंडिया को बेचना चाहते हैं जबकि रेल मंत्री रेल की परिसंपत्तियों को बेचना चाहते हैं। भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार 2014 में सत्ता में आने के बाद लगातार अपने लक्ष्य हासिल करने में असफल रही है।

सरकार पर निशाना साधते हुए चौधरी ने कहा कि बजट में रेल पर 50 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की बात कही गयी है जबकि रेल मंत्री पीयूष गोयल के पूर्ववर्ती सुरेश प्रभु ने 8.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का दावा किया था, उसका क्या हुआ।

चर्चा में भाग लेते हुए भाजपा सदस्य सुनील कुमार सिंह ने कहा कि रेल दुर्घटनाओं में 2014 से 2019 के दौरान 73 प्रतिशत की कमी आई है। उन्होंने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकारों पर निशाना साधते हुए कहा कि उनके कार्यकाल में पार्टी और उनके नेताओं के हित प्राथमिकता में ऊपर थे जबकि एनडीए सरकार के लिए देश हित सबसे ऊपर है।

उन्होंने कहा कि रेल की स्थिति और प्रदर्शन अब पहले से काफी बेहतर है। भाजपा के एक ओर सदस्य गोपाल चिनय्या शेट्टी ने पीपीपी मॉडल को बढ़ावा देने पर जोर दिया और कहा कि इससे देश की प्रगति को प्रोत्साहन मिलेगा। खबर लिखे जाने तक रेल मंत्रालय की अनुदान की मांगों पर लोक सभा में देर रात तक जारी रही। 

Posted By: Bhupendra Singh