अपने बेलौस अंदाज के लिए जाने जाने वाले केंद्रीय सड़क परिवहन, जलमार्ग व गंगा मंत्री नितिन गडकरी हाल के दिनों में कुछ ऐसे बयानों के कारण विवाद में घिर गए थे जो उन्होंने दिया ही नहीं था। ऐसे लोगों को वह सीधे सपाट शब्दों में कहते हैं- मेरे कंधे पर बंदूक रखकर मत चलाओ। वहीं चुनाव में भाषा की मर्यादा की सलाह देते हुए विपक्ष को याद दिलाते हैं कि चुनाव प्रदर्शन से जीते जाते हैं और पांच साल में सरकार ने वह कर दिखाया है जो 70 साल में नहीं हुए थे। खुद को प्रधानमंत्री की रेस से बाहर बताते हुए वह दावा करते हैं कि केंद्र में फिर से मोदी सरकार बनेगी। दैनिक जागरण के वरिष्ठ कार्यकारी संपादक प्रशांत मिश्र और विशेष संवाददाता नीलू रंजन से बातचीत के अंश:

जिस समय जनसंघ बना था, उस समय से ही कश्मीर एजेंडे पर रहा है। 370 खत्म करना और कश्मीर को मुख्यधारा के साथ जोड़ना आपके चुनावी एजेंडे में भी शामिल रहा है। लेकिन पिछले पांच साल में कश्मीर में न तो आतंकवाद कम हो पा रहा है और न ही कोई समाधान मिल रहा है। कहां कमी रह गई?

-आपने दो बातें अलग-अलग पूछी हैं। कश्मीर एजेंडे पर है। मेरा विभाग कश्मीर में सात हजार करोड़ का काम कर रहा है। छह हजार करोड़ का टनल बना रहा है जोजिला में। अभी जम्मू और श्रीनगर के बीच हमने जो 9.5 किलोमीटर की टनल बनाई है, स्टेट ऑफ आर्ट है। हमलोग बड़े-बड़े हाईवे बना रहे हैं। हमने कश्मीर के विकास के लिए पूरी ताकत लगा दी।

पर पाकिस्तान यह जानता है कि तीन बार लड़ाई में हार चुका है, इसीलिए आतंक और आतंकवादी संगठनों को मदद करके हिंदुस्तान को अस्थिर करने की साजिश रच रहा है। यह एक प्रकार का प्रॉक्सी वार है। इसका आपको सामना करना पड़ेगा। पर आज कश्मीर के विषय पर पाकिस्तान अलग-थलग हुआ है। पूरी दुनिया में उसकी भर्त्सना हुई  है।

चीन को छोड़कर कोई उसके साथ नहीं है। लड़ाई लंबी है, आगे चलेगी। इसमें जिस प्रकार से हमने आतंकवाद का मुकाबला किया है, जो निर्णायक नेतृत्व का परिचय दिया है, जो हमने हिम्मत दिखाकर निर्णय किए हैं, निश्चित रूप से उसके परिणाम मिलेंगे। हम कश्मीर में शांति चाहते हैं। अमन चाहते हैं, भाईचारा चाहते हैं। पर जब कोई आतंकवाद का सहारा लेगा तो हमारे लिए कठोर कार्रवाई करना भी उपयुक्त होगा।

लेकिन वहां पर आपके कार्यकर्ता ही मानते हैं किअनुच्छेद 370 को हटा दिया जाता तो शायद यह रास्ता आसान हो जाता?

- देखो, 370 पर हमारी भूमिका कल जो थी, आज है और आगे भी वही रहेगी। लेकिन देश के हित में कौन सा निर्णय कब करना है, यह बहुत ही विचारणीय होता है।

आपने कार्रवाई की बात की, लेकिन उस कार्रवाई का सुबूत मांगा जा रहा है।

-ऐसे सुबूत मांगना हमारे वीर जवानों का अपमान है। आंतरिक और बाह्य सुरक्षा पर राजनीति नहीं करनी चाहिए। न हम उसका क्रेडिट लेना चाहते हैं और न इस प्रकार की चर्चा विपक्ष को करनी चाहिए। इसको राजनीति से ऊपर रखना चाहिए। जो पाकिस्तानी रेडियो और टीवी बोल रहा है, वही हमारे देश में विपक्ष के नेता बोल रहे हैं। यह अच्छी बात नहीं है।

आपके नेतृत्व में बनी एक समिति को विशेष जिम्मेदारी दी गई थी, सहयोगी दलों और एनजीओ से समन्वय की। एनजीओ की भूमिका चुनाव में कैसे देखते हैं?

-मैं काफी लोगों से मिला हूं। रविशंकर जी से मिला, रामदेव बाबा से मिला, साधु-संतों से मिला। समिति के सचिव कैलाश विजयवर्गीय ने भी अलग-अलग राज्यों में काफी काम किया। एनजीओ के साथ भी बातचीत हुई। सबको विश्वास दिलाया कि इस समय आप भारतीय जनता पार्टी का समर्थन कीजिए और बहुत अच्छा समर्थन सभी लोगों से मिला है।

आपके प्रदेश महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ भाजपा इस बार झुकी हुई दिखी। यह मानकर चला जाए कि आगामी विधानसभा चुनाव में भी भाजपा और शिवसेना का समझौता कुछ ऐसा ही रहेगा?

-हमारे समझौते का आधार हिंदुत्व था। बाला साहब ठाकरे के समय से यह चल रहा है। हमने उसको निभाने के लिए त्याग करने की भी कोशिश की है। पर कोई भी समझौता निभाना दोनों पार्टी का काम होता है। हमें उम्मीद है कि पुराना भूल कर नया इतिहास लिखने के लिए हम दोनों अच्छा काम करेंगे और समझौता बरकरार रहेगा। इसमें कोई समस्या नहीं आएगी।

पिछले दिनों आपके कुछ बयानों को लेकर अटकलें तेज रहीं। जब विपक्ष की ओर से आपकी प्रशंसा की गई तो उसको भी उसी रूप में देखा गया।

-मुझे इस बात का बहुत दुख और दर्द है कि जो मैंने कहा ही नहीं, उसे मेरे नाम से चला दिया गया। मेरी तो बात छोड़ दो, लेकिन देश में मीडिया की विश्वसनीयता के लिए यह अच्छी बात नहीं है। मैं एक बैंक के कार्यक्रम में गया था और कहा कि बैंक में भी कभी लाभ होता है तो कभी लॉस होता है। संचालकों को दोनों स्थितियों में मिलकर काम करना चाहिए। मैंने कहा कि हम भी कभी चुनाव जीतते हैं, कभी हारते हैं। हार भी हमारी होती है जीत भी हमारी होती है। दोनों को स्वीकार करके आगे बढ़ते हैं। सरकारनामा नाम के एक साइट ने पांच बजे लिख दिया कि हमने कहा कि अमित शाह को हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। फिर इसे उठाकर सभी ने चला दिया।

nitin gadkari on BJP Defeat

इसी तरह एक बार मैं कार्यकर्ताओं के बीच गया था। वहां बताया कि दलित कार्यकर्ताओं के बीच में मदन जी ने कहा था कि यदि बीच में इनको छोड़ना पड़ा तो इनका क्या होगा। इसीलिए पहले अपने घर-परिवार को अच्छी तरह से संभालो। फिर पार्टी का काम करो। जो परिवार को नहीं संभाल सकता, वह देश कैसे चला पाएगा। मैंने किसी का नाम नहीं लिया। उसको मोदी जी से जोड़कर मेरा स्टेटमेंट डाल दिया।

इसी तरह आइबी के सम्मेलन में मैंने कहा कि जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि जितने लोग हैं उतनी समस्या है। हम इतना तो तय कर सकते हैं कि हम देश के लिए समस्या नहीं रहेंगे। इससे बहुत बड़ी समस्या का समाधान हो जाएगा। इसको नेहरू की तारीफ कहकर चला दिया। तीनों भाषण यूट्यूब पर है। अनुरोध करूंगा कि मैं जो कह रहा हूं, उसको जरूर छापिए। लेकिन आपके मन में जो बात है उसको मेरे नाम पर लिखना और विवाद खड़ा कर देना ठीक नहीं है। किसी ने तुम्हें गोली मार दिया है तो तुम मारो ना। तुम्हारी हिम्मत नहीं है। मेरे कंधे पर बंदूक रखकर गोली क्यों मारते हो।

जब सात-आठ साल पहले आप दिल्ली आए थे, तब कहा था कि यहां के लोग आपको समझ नहीं पाते हैं। आपको लगता है कि इन आठ सालों में आपमें दिल्ली को लेकर कोई बदलाव आया है। 

-यह तो आप देखिए। लेकिन एक बात है दिल्ली की मीडिया और राजनीतिक हलकों में। जिन लोगों ने मेरे ऊपर टीका-टिप्पणी की थी, उनके खिलाफ मैंने केस भी किया था। अब वे सब लोग मेरे बारे में बहुत अच्छा मत रखते हैं। मैं राजनीतिज्ञ नहीं हूं। थोड़ा-सा कैलकुलेटिव भी नहीं हूं। कोई निजी महत्वाकांक्षा भी नहीं है। पर मैं अपने विचारों पर काम करता था। लगता है दिल्ली के लोगों में मेरे प्रति बहुत प्रेम है, सहानुभूति है। मेरे स्वाभाव को अच्छी तरह से पहचान गए हैं। इसके पीछे मेरा कोई पॉलिटिकल कैलकुलेशन नहीं है। मैं क्लीयर कर चुका हूं कि मैं कहीं किसी रेस में नहीं हूं। 

आपका जो विजन है, देश की उन्नतिऔर सबको साथ लेकर जो चलने का प्रयास होता है, विपक्षी नेता भी इसकी तारीफ करते हैं। इसी कारण से आपका नाम सामने आ जाता है कि यदि सीटें कम हुईं तो आप पीएम पद के प्रबल दावेदार होंगे?

-नहीं, मैं इसको बहुत बार स्पष्ट कर चुका हूं। इस विषय के साथ न मैंने कभी कोई प्रयास किया और न ही इससे कोई संबंध है। मोदी जी ही प्रधानमंत्री बनेंगे और पिछली बार से ज्यादा सीटें उन्हें मिलेंगी। मैं इस रेस में नहीं हूं, मेरा नाम भी नहीं डालिए।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषक ऐसा कह रहे हैं। 

-क्या करूं, उन सबको मैं कैसे चुप करा सकता हूं।

अंग्रेजी मीडिया भाजपा के एंटी क्यों रहता है?

-देखिये कुछ लोग ईमानदारी से विचारों के आधार पर विरोधी हैं। कुछ लोग ऐसे हैं कि जो पहले से हमारे विचारों के विरोधी हैं। वे हमारी सरकार बन जाने को सह ही नहीं पाए, तो नाराज हैं। अब जो पुरस्कार वापस किए ना, कांग्रेस के राज में कम घटनाएं नहीं हुईं। लेकिन उन्होंने कभी पुरस्कार वापस नहीं किए।

ये चलता रहेगा। हमारा उद्देश्य और मिशन क्या है, ये समझना चाहिए और उसको हासिल करने के लिए पॉजिटिव एप्रोच अपनाना चाहिए। देश, समाज और गरीब के प्रति हमारा जो उत्तरदायित्व है उसके लिए हमें काम करना चाहिए।

चर्चाएं होती हैं कि भाजपा अंत आते-आते इस चुनाव को हिंदू-मुस्लिम कर देगी।

-एक सच्चाई है, जो थोड़ा-बहुत हमारा दुर्भाग्य है। हमारी पार्टी के प्रति इमेज वर्सेस रियलिटी और ग्राउंड रियलिटी वर्सेस परसेप्शन। हमने सात करोड़ लोगों को गैस कनेक्शन हिंदू-मुसलमान देखकर तो नहीं दिए। हमने 34 करोड़ बैकों में खाते खोले कोई हिंदू- मुसलमान, दलित-आदिवासी का भेद नहीं किया। हमने सब गांव में बिजली भेजी, कोई भेद नहीं किया। हमने सब किसानों को पैसा दिया। छह हजार रुपये कोई भेदभाव करके नहीं दिया।

हम जातीयता, सांप्रदायिकता और परिवारवाद से मुक्त हैं। ये भाषणों की बात नहीं है, व्यक्तिगत आचरण की बात है। चाल-चलन, व्यवहार और चरित्र में इस बात का अनुकरण हम करते हैं। लेकिन दुर्भाग्यवश वोटबैंक की पॉलिटिक्स के लिए दो चीजों का इस्तेमाल किया जा रहा है। एक तो डर पैदा किया जा रहा है हमारे बारे में। दूसरा जातिवाद और सांप्रदायिकता का विष

घोल-घोलकर लोगों को पिलाया जा रहा है। ऐसा करने वाले खुद को समाजवादी और प्रगतिशील कहते हैं। वे सबसे अधिक जातिवादी पार्टी हैं, जो एक समाज की राजनीति करते हैं। हम सबका साथ-सबका विकास बोलते हैं, फिर भी हम पर ही जातिवाद और सांप्रदायिकता का ठप्पा लगा देते हैं।

हम लोगों के बीच जाएंगे और इस गलतफहमी को दूर करेंगे। हम जातिवाद से मुक्त, सांप्रदायिकता से मुक्त आर्थिक और सामाजिक समानता के आधार पर नए भारत का निर्माण करना चाहते हैं। जहां न ऊंच-नीच का भाव होगा, न स्पृश्यता होगी। सुखी, संपन्न, समृद्ध राष्ट्र बनेगा। यही हमारा विचार है, यही हमारा मिशन है। यही हमारा उद्देश्य है। 

लेकिन आपके जो कोर सपोर्टर हैं, जो भाजपा का वोटर रहा है, उनकी शिकायत रही है कि राम मंदिर का मुद्दा जब विपक्ष में होते हैं तो चुनावी घोषणापत्र से लेकर हर जगह होता है। लेकिन जब सरकार में आते हैं, तो भूल जाते हैं। इस बार भी पांच साल में राम मंदिर के लिए कुछ नहीं हुआ।

-आप समझिए की ये बातें सुप्रीम कोर्ट में चल रही हैं। आप भी अच्छी तरह समझते हैं कि जो मैटर सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होता है उस पर सरकार का निर्णय करने का कोई अधिकार नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट जल्द निर्णय करे, यही हमारी अपेक्षा है।

दूसरा मार्ग है कि आपसी सहमति हो, वह भी कोशिश की जा रही है। तीसरा मार्ग है संसद में दो-तिहाई बहुमत से कानून पास करना, जो संभव नहीं है। चौथा मार्ग आप मुझे बताइए क्या है। हम पहले भी कटिबद्ध थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। मैं उम्मीद करता हूं कि सुप्रीम कोर्ट जल्दी इसका निर्णय करके इस विषय को समाप्त करेगा।

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