धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। सियासी दांवपेच भले ही नए दिखें, लेकिन इसमें भी इतिहास खुद को दोहराता है। राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस जिस चुनौती से गुजर रही है, उसका वह 33 साल पहले मध्य प्रदेश में भी सामना कर चुकी है।

माधव राव सिंधिया को MP का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे राजीव गांधी

तब चुरहट लाटरी कांड में नाम आने से हाईकोर्ट के प्रतिकूल फैसले के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह के लिए इस्तीफा देने की नौबत आ गई थी। उन्होंने इस पद के लिए केंद्रीय नेतृत्व की पसंद स्व. माधव राव सिंधिया का विरोध करते हुए आलाकमान को चुनौती दे डाली। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरह जनवरी, 1989 में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस आलाकमान की अनदेखी की थी और नेतृत्व की इच्छा के विपरीत स्व. मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनवा दिया था।

गुलाम नबी आजाद आए थे माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनवाने

कांग्रेस अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को भोपाल भेजकर माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाने के निर्देश दिए थे, लेकिन नेतृत्व का यह फरमान अर्जुन सिंह ने नहीं माना। गुलाम नबी आजाद खाली हाथ दिल्ली लौट गए। बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह को भोपाल भेजा। सख्त संदेश लेकर आए बूटा सिंह भी अर्जुन सिंह को आसानी से राजी नहीं कर पाए। बूटा सिंह ने राजभवन में 40 घंटे तक बैठक की, तब जाकर अर्जुन सिंह ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मोतीलाल वोरा के नाम पर सहमति देकर उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दिया।

हरवंश सिंह के यहां एकत्र हुए थे 70 विधायक

उस दौरान सत्ता परिवर्तन के साक्षी रहे एक नेता बताते हैं कि दिल्ली से कांग्रेस नेतृत्व ने विशेष विमान से मध्य प्रदेश के सभी कांग्रेस सांसदों को माधव राव सिंधिया के साथ भोपाल भेजा था। उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने का फैसला आलाकमान ने किया था। सांसदों ने माधव राव सिंधिया को बधाई दी, तो उन्होंने स्वीकार भी की थी। जब सांसद भोपाल पहुंचे तो यहां हर तरफ हलचल मची हुई थी। चारों तरफ अव्यवस्था का आलम था।

राजस्थान की ही तरह मध्य प्रदेश में भी तब कांग्रेस के 70 विधायक अर्जुन सिंह समर्थक हरवंश सिंह के बंगले में एकत्र हो गए थे। माहौल ऐसा बन गया था कि नेतृत्व ने फैसला नहीं बदला तो कांग्रेस में टूट हो जाती। अंतत: कांग्रेस आलाकमान झुक गया और अर्जुन सिंह की बात मान ली गई। हालांकि, मोतीलाल वोरा की शपथ ग्रहण के दौरान राजभवन में युवक कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी भी की थी और वहां के कुछ गमले भी तोड़ दिए थे।

ताकतवर था कांग्रेस नेतृत्व

मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का जब यह संकट आया था, तब कांग्रेस का नेतृत्व राजीव गांधी के हाथों में था। उस दौर में कांग्रेस अध्यक्ष को बेहद ताकतवर माना जाता था। बाद में अर्जुन सिंह को कांग्रेस ने महत्व देकर वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी बनाया था। कार्यकारी अध्यक्ष की भांति उन्हें अधिकार भी दिए गए थे।

धनंजय प्रताप सिंह, भोपाल। सियासी दांवपेच भले ही नए दिखें, लेकिन इसमें भी इतिहास खुद को दोहराता है। राजस्थान में सत्तारूढ़ कांग्रेस जिस चुनौती से गुजर रही है, उसका वह 33 साल पहले मध्य प्रदेश में भी सामना कर चुकी है।

माधव राव सिंधिया को MP का मुख्यमंत्री बनाना चाहते थे राजीव गांधी

तब चुरहट लाटरी कांड में नाम आने से हाईकोर्ट के प्रतिकूल फैसले के चलते तत्कालीन मुख्यमंत्री स्व. अर्जुन सिंह के लिए इस्तीफा देने की नौबत आ गई थी। उन्होंने इस पद के लिए केंद्रीय नेतृत्व की पसंद स्व. माधव राव सिंधिया का विरोध करते हुए आलाकमान को चुनौती दे डाली। राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की तरह जनवरी, 1989 में अर्जुन सिंह ने कांग्रेस आलाकमान की अनदेखी की थी और नेतृत्व की इच्छा के विपरीत स्व. मोतीलाल वोरा को मुख्यमंत्री बनवा दिया था।

गुलाम नबी आजाद आए थे माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री बनवाने

कांग्रेस अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी ने वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद को भोपाल भेजकर माधव राव सिंधिया को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलवाने के निर्देश दिए थे, लेकिन नेतृत्व का यह फरमान अर्जुन सिंह ने नहीं माना। गुलाम नबी आजाद खाली हाथ दिल्ली लौट गए। बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह को भोपाल भेजा। सख्त संदेश लेकर आए बूटा सिंह भी अर्जुन सिंह को आसानी से राजी नहीं कर पाए। बूटा सिंह ने राजभवन में 40 घंटे तक बैठक की, तब जाकर अर्जुन सिंह ने तत्कालीन केंद्रीय मंत्री मोतीलाल वोरा के नाम पर सहमति देकर उन्हें मुख्यमंत्री बनवा दिया।

हरवंश सिंह के यहां एकत्र हुए थे 70 विधायक

उस दौरान सत्ता परिवर्तन के साक्षी रहे एक नेता बताते हैं कि दिल्ली से कांग्रेस नेतृत्व ने विशेष विमान से मध्य प्रदेश के सभी कांग्रेस सांसदों को माधव राव सिंधिया के साथ भोपाल भेजा था। उन्हें मुख्यमंत्री बनाए जाने का फैसला आलाकमान ने किया था। सांसदों ने माधव राव सिंधिया को बधाई दी, तो उन्होंने स्वीकार भी की थी। जब सांसद भोपाल पहुंचे तो यहां हर तरफ हलचल मची हुई थी। चारों तरफ अव्यवस्था का आलम था।

राजस्थान की ही तरह मध्य प्रदेश में भी तब कांग्रेस के 70 विधायक अर्जुन सिंह समर्थक हरवंश सिंह के बंगले में एकत्र हो गए थे। माहौल ऐसा बन गया था कि नेतृत्व ने फैसला नहीं बदला तो कांग्रेस में टूट हो जाती। अंतत: कांग्रेस आलाकमान झुक गया और अर्जुन सिंह की बात मान ली गई। हालांकि, मोतीलाल वोरा की शपथ ग्रहण के दौरान राजभवन में युवक कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने नारेबाजी भी की थी और वहां के कुछ गमले भी तोड़ दिए थे।

ताकतवर था कांग्रेस नेतृत्व

मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का जब यह संकट आया था, तब कांग्रेस का नेतृत्व राजीव गांधी के हाथों में था। उस दौर में कांग्रेस अध्यक्ष को बेहद ताकतवर माना जाता था। बाद में अर्जुन सिंह को कांग्रेस ने महत्व देकर वरिष्ठ उपाध्यक्ष भी बनाया था। कार्यकारी अध्यक्ष की भांति उन्हें अधिकार भी दिए गए थे।

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Edited By: Arun kumar Singh

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