आनन्द राय़ भोपाल।  मप्र की कमल नाथ सरकार के संकट की बड़ी वजह पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं, लेकिन सत्ता के गलियारों में यह चर्चा तेज है कि जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर कई कांग्रेसी दिग्गजों के नेपथ्य में जाने से यह और गहरा गया। दरअसल, मध्य प्रदेश में कमल नाथ और दिग्विजय सिंह की जोड़ी के प्रभावी होने के साथ ही देश स्तर पर चर्चित कई सूरमाओं की चमक फीकी पड़ गई। इससे खेमेबंदी बढ़ी और जिन्हें संकटमोचक की भूमिका में आना चाहिए, उन सबने चुप्पी साध ली।

प्रदेश में कांग्रेस की गुटबाजी कोई नई बात नहीं है, लेकिन विधानसभा चुनाव के साथ ही यह बदरंग होने लगी। पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी और सत्यव्रत चतुर्वेदी की कभी ब्राह्मण चेहरे के रूप में राष्ट्रीय फलक पर पहचान थी। खेमेबंदी के चलते सत्यव्रत के बेटे नितिन को विधानसभा का टिकट नहीं मिला तो वह सपा के टिकट पर लड़ गए। इस बीच सत्यव्रत, सोनिया गांधी के खिलाफ मुखर हो गए और एक लॉबी का दबाव इतना बढ़ा कि कांग्रेस ने उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया। 24 वर्ष तक राज्यसभा सदस्य रहे जोड़-तोड़ की राजनीति के माहिर पचौरी विधानसभा का चुनाव हार गए। सरकार बनने पर शुरू में कुछ बैठकों में उन्हें बुलाया गया, लेकिन बाद में वह भी उपेक्षित कर दिए गए।

बताते हैं कि योजनाबद्ध तरीके से इन दोनों नेताओं को किनारे किया गया। कांग्रेस के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता और सिंधिया समर्थक पंकज चतुर्वेदी, कमल नाथ और दिग्विजय सिंह का नाम लिए बिना कहते हैं कि कांग्रेस में कुछ नेता विशेष को इतने अधिकार दे दिए जाते हैं कि बाकी भूमिका विहीन हो जाते हैं। फिर या तो वह अपना रास्ता बदल लेते हैं या चुप्पी साध लेते हैं।

अर्जुन सिंह के पुत्र अजय के साथ भी हुई थी साजिश सरकार बनने के बाद असंतोष इस कदर बढ़ा कि पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के पुत्र और कांग्रेस विधान मंडल दल के पूर्व नेता अजय सिंह ने तो सार्वजनिक रूप से नाराजगी जता दी। पिछले विधानसभा चुनाव में अजय को हराने में भाजपा से ज्यादा अंदरखाने की गुटबाजी सक्रिय थी। उनसे तनातनी तो तब से शुरू है, जब शहडोल में कमल नाथ के एक समर्थक को जिलाध्यक्ष बनाया गया और 24 घंटे के भीतर हटा दिया गया।

विंध्य क्षेत्र में कांग्रेस प्रभारी दीपक बाबरिया के साथ हुए दु‌र्व्यहार में भी एक बड़ी साजिश बताई जाती है। अरण यादव और कांतिलाल भूरिया भी हाशिए पर- पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया अनुसूचित जनजाति समाज के रसूखदार नेता हैं। केंद्र में मंत्री रहने के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं। उन्हें एक बड़े चेहरे के रूप में विधानसभा का उपचुनाव लड़ाया गया, लेकिन इस शर्त के साथ कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया जाएगा।

सबसे नोटिस लेने वाला नाम तो पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरण यादव का है। मध्य प्रदेश में उनके पिता सुभाष यादव किसी जमाने में कांग्रेस के अंदरखाने दिग्विजय के प्रतिद्वंद्वी हुआ करते थे और अब अरुण खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। अरण यादव की ही तरह कांग्रेस हाईकमान तक अपना प्रभाव रखने वाली मीनाक्षी नटराजन को भी किनारे कर दिया गया।  

Posted By: Sanjeev Tiwari

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस