नई दिल्ली, जेएनएन। सेना के पास हथियारों की कमी से लेकर बजट में कटौती का मसला इन दिनों सियासी विमर्श के केंद्र में है। यूपीए और एनडीए में इसको लेकर आरोप प्रत्यारोप हो रहा है। अपनी ईमानदारी के अलावा बेहद कम बोलने के लिए चर्चित पूर्व रक्षा मंत्री एके एंटनी ने दैनिक जागरण के एसिस्टेंट एडिटर संजय मिश्र से विशेष साक्षात्कार में सेना से जुड़े इन सवालों पर पहली बार खुलकर बात की।

साक्षात्कार- पेश है इसके अंश:

सबसे लंबे समय तक देश के रक्षामंत्री रहने के नाते सेना के सामने इस वक्त आपके हिसाब से क्या अहम चुनौतियां हैं?

इसमें कोई शक नहीं कि सेना का आधुनिकीकरण इस वक्त सबसे अहम मसला है। क्योंकि हमारे सामने पहले केवल पाकिस्तान की चुनौती थी मगर अब दो मोर्चे सामने हैं। इसीलिए हमने चीन के साथ बेहतर रिश्तों को तवज्जो दी क्योंकि दो बड़े पड़ोसी लगातार संघर्ष में रहें यह ठीक नहीं। सीमा पर शांति जरूरी है।

चीन की आक्रामक रणनीति का जवाब किस तरह दिया जाना चाहिए?

दोनों देशों की सीमा पर शांति बनी रहे इसके लिए सैन्य ताकत बढ़ाना हमारे लिये अहम है। तभी यूपीए सरकार ने चीन की आपत्ति के बावजूद सेना के स्ट्राइक कोर का गठन किया। पूर्वोत्तर राज्यों में वायुसेना के लिए एयरफील्डस बनाये। चीन को रणनीति संदेश देने के लिए सीमा पर वैसी ही पेट्रोलिंग की जैसी चीनी सेना करती थी। चीनी सेना जब पीछे हटती थी तभी हम भी पीछे हटते थे। मगर डोकलम सीमा विवाद मामले में इसे कुछ हटकर चीजें दिखीं। मैं मानता हूं कि डोकलम को डील करने में कहीं न कहीं कोई चूक हुई है।

सैन्य ताकत में इजाफे और आधुनिकीकरण में बजट बड़ी बाधा रही और एनडीए ने यूपीए की नीतियों को सुस्ती के लिए जिम्मेदार माना है?

एनडीए ने सत्ता में आने के बाद से ही हम पर रक्षा बजट में कटौती का आरोप लगाया है जो तथ्यों से परे है। संसद के सवालों के जवाब और रक्षा मंत्रालय के आंकड़े यूपीए के दस साल के रिकार्ड को साफ करते हैं। हमने रक्षा बजट में उल्लेखनीय वृद्धि ही नहीं की बल्कि सेना के पूंजीगत व्यय जिसका उपयोग सैन्य साजो-समान व आधुनिकीकरण के लिए होता है, उसमें इजाफा किया।

इसका तात्पर्य है कि आपके समय रक्षा बजट पर्याप्त रहा?

बात पर्याप्त की नहीं बल्कि गौर इस पर भी किया जाना चाहिए कि बीते दशकों में भारतीय सेना का वैश्विक आयाम बढ़ा है। दुनिया के सभी प्रमुख देश भारत की सेनाओं के साथ सैन्य रिश्ते बढ़ाने को इच्छुक रहे हैं। इस लिहाज से सेना का रोल बढ़ा है और जरूरतें भीं। एनडीए जब विपक्ष में था तो यही कहा था कि हम सत्ता में आएंगे तो सेना को जितना पैसा चाहिए होगा उतना देंगे। मैं कोई जवाबी आरोप नहीं लगा रहा मगर यूपीए के आखिरी चार साल और एनडीए के चार साल की तुलना तथ्यों पर करेंगे तो साफ है कि सेना का बजट मौजूदा सरकार पिछले 50 साल में सबसे कम स्तर पर ले आयी है।

सेना के पास हथियारों की कमी को लेकर भी यूपीए की नीतियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं?

हथियारों की कमी से इनकार नहीं मगर सच्चाई यह भी है कि यूपीए के आखिरी पांच सालों में्र सैन्य खरीद को तवज्जो दी। रुस और इजरायल से अहम हथियार खरीदे गए। अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन से भी कुछ साजो-समान लिये गए। आर्डिनेंस फैक्ट्री समेत देश की रक्षा क्षेत्र की सरकारी कंपनियों से काफी सैन्य खरीदी हुई।

एनडीए के इस आरोप पर क्या कहेंगे कि आप अपनी इमानदारी की छवि को लेकर इतने ज्यादा सचेत रहे कि रक्षा सौदों में देरी हुई?

यह सही है कि रक्षा सौदे में भ्रष्टाचार के खिलाफ मैं काफी सजग था मगर हमारा रिकार्ड देखिये की हथियारों की खरीद में यूपीए दो में काफी तेजी आयी। पूंजीगत बजट आवंटन पूरा खर्च हुआ। एयरक्रॉप्ट खरीदे, नौसेना के लिए साजो-समान और सेना के लिए हथियार खरीदे। साथ-साथ भ्रष्टाचार की शिकायत पर हमने पांच बड़ी कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई कर उन्हें ब्लैक लिस्ट किया। अगस्ता वेस्टलैंड के खिलाफ सीबीआई जांच की। इटली की अदालत में पहली बार भारत सरकार ने जाकर मुकदमा लड़ा। जीत हासिल कर एडवांस दी गई रकम वापस ही नहीं ली बल्कि तीन हेलीकाप्टर भी लिये। पर भ्रष्टाचार पर सख्ती की वजह से खरीददारी में देरी की बात सही नही।

बतौर एनडीए रॉफेल जेट खरीदी में विलंब भी आपकी अति सर्तकता की नीति रही?

अति सर्तकता नहीं बल्कि सौदे को लेकर आयी शिकायत से इसमें देरी हुई। तत्कालीन विपक्ष जिसमें भाजपा के कई बड़े नेता शामिल थे उनकी शिकायत मिली। इसमें रॉफेल खरीद में उसके लाइफ साइकल खर्च को ज्यादा बताते हुए सवाल उठाया गया था। इसलिए मैंने फाइल पर लिखा कि वायुसेना रॉफेल सौदे के अनुबंध को अंतिम रुप दे मगर कैबिनेट की सुरक्षा मामलों की समिति में फाइल तब तक नहीं आए जब तक इस शिकायत की जांच पूरी नहीं हो जाती। अब मौजूदा सरकार ने पुरानी डील रद्द कर केवल 36 रॉफेल जेट खरीदे हंै। हमने 126 में 18 उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार और बाकी 108 भारत में ही बनाने का सौदा किया था। एनडीए ने इसमें दो अहम बदलाव किये हैं। पहला टेक्नोलाजी ट्रांसफर नहीं हुआ और दूसरा रॉफेल का निर्माण एचएएल में नहीं होना। पर मैं कोई आरोप नहीं लगा रहा बल्कि तथ्य साफ कर रहा हूं।

सेना के सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर उठे विवादों को आप कैसे देखते हैं?

भारत की फौज एक शानदार पेशेवर सेना है और वह चुनौतियों के किसी दबाव में नहीं आती। सर्जिकल स्ट्राइक कब, कैसे और कहां करना है यह सेना खुद तय करती है। सर्जिकल स्ट्राइक पहले भी सभी सरकारों के समय हुए हैं पर इसका कभी खुलासा नहीं किया गया। इस बार फर्क यही है कि मौजूदा सरकार ने इसका खुलासा किया और यह उसकी सोच है। मगर सर्जिकल स्ट्राइक के बाद भी सीमा पर ही नहीं सेना के प्रतिष्ठानों पर आतंकी हमले बढ़े हैं और इसका जवाब तो सरकार ही दे सकती है।

Posted By: Bhupendra Singh