संजय मिश्र, नई दिल्ली। कांग्रेस की मौजूदा अंदरूनी उठापटक को देखते हुए गाहे-बगाहे असंतुष्टों के पार्टी से अलग रास्ता अपनाने तक की आशंकाएं जाहिर की जा रही हैं। मगर हकीकत में इस राह पर आगे बढ़ना असंतुष्ट नेताओं के लिए बेहद कठिन है क्योंकि बीते पांच दशक में कांग्रेस से बगावत कर अलग पार्टी बनाने वाला कोई नेता या गुट राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर अपनी प्रासंगिकता कायम नहीं रखा पाया। हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर कांग्रेस से बगावत करने वाले कई क्षत्रपों ने राज्यों में जरूर न केवल अपनी सियासत जमा ली बल्कि कांग्रेस की राजनीतिक जमीन ध्वस्त कर दी।

कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं का समूह जी-23 शायद इस राजनीतिक हकीकत से वाकिफ है और तभी पार्टी के हालातों पर सवाल उठाने के बावजूद बगावत को उस मोड़ तक ले जाने से बचता दिख रहा है जहां से उनके लिए वापस लौटना मुश्किल हो जाए।

बंगाल में इंडियन सेक्यूलर फ्रंट के साथ गठबंधन को लेकर तीखे सवाल उठाने वाले असंतुष्ट नेता आनंद शर्मा पार्टी की ओर से इस बारे में दिए गए स्पष्टीकरण के बाद इस मामले को फिलहाल और आगे बढ़ाते नहीं दिख रहे तो कांग्रेस भी इसे तूल नहीं दे रही है।

देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में वैसे तो आजादी के बाद दर्जनों बार टूट हो चुकी है मगर पार्टी से अलग होकर जाने वाले नेता तमाम प्रयासों के बावजूद राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का विकल्प नहीं बन पाए। बीते छह दशक में तो कई मौकों पर अपने समय के बड़े-बड़े दिग्गज रहे नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर सियासी विकल्प देने का प्रयास किया मगर राष्ट्रीय फलक पर जनता का भरोसा नहीं जीत पाए।

1999 में शरद पवार पार्टी से हुए थे अलग

राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में आखिरी बड़ी टूट को 1999 में शरद पवार ने अंजाम दिया जब पीए संगमा और तारिक अनवर सरीखे नेताओं को लेकर सोनिया गांधी के नेतृत्व को चुनौती दी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का गठन किया। राष्ट्रीय महात्वाकांक्षा के साथ अलग हुए पवार की पार्टी ने छह महीने के अंदर 1999 में ही महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया और बीते 22 सालों से महाराष्ट्र में कांग्रेस और पवार दोनों को अपनी सियासत के लिए एक दूसरे की जरूरत है। एनसीपी के महाराष्ट्र तक सिमटने को देखते हुए संगमा ने भी अपने जीवन काल के आखिर में मेघालय की क्षेत्रीय सियासत की राह पकड़ ली थी। वहीं तारिक अनवर पिछले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस में वापस लौट आए और आज पार्टी के महासचिव हैं।

1969 में हुआ कांग्रेस में सबसे बड़ा विभाजन

आजादी के बाद राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में सबसे बड़ा विभाजन 1969 में हुआ जब इंदिरा गांधी के खिलाफ मोरारजी देसाई और कामराज ने कांग्रेस संगठन बनाते हुए इंदिरा गांधी को पार्टी से बाहर कर दिया। तब इंदिरा गांधी की कांग्रेस आर ने 1971 में हुए आम चुनाव में बड़ी जीत हासिल की ओर कांग्रेस संगठन कोई छाप नहीं छोड़ पाया। इसी तरह आपातकाल के दौरान 1977 में एक बार फिर कांग्रेस में बड़ा विभाजन जगजीवन राम के नेतृत्व में हुआ। मोरारजी देसाई ने भी कांग्रेस संगठन का जनता पार्टी में विलय कर इसका अस्तित्व खत्म कर दिया। संपूर्ण विपक्ष की एकजुटता से बनी जनता पार्टी और उसकी सरकार भी देश को स्थिर सियासी विकल्प नहीं दे पाई।

इसी तरह नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्व कार्यकाल के दौरान भी कांग्रेस में अंदरूनी घमासान का लंबा दौर चला। उत्तर प्रदेश-उत्तराखंड के दिग्गज नेता रहे एनडी तिवारी और अर्जुन ¨सह ने असंतुष्ट होकर आल इंडिया इंदिरा कांग्रेस तिवारी का गठन किया। मगर 1996 के लोकसभा चुनाव में तिवारी कांग्रेस का यह प्रयोग नाकाम रहा और 1997 में सीताराम केसरी के अध्यक्ष बनते ही एनडी तिवारी, अर्जुन सिंह समेत तमाम नेता वापस पार्टी में लौट आए।

राव से नाराज होकर 1996 में मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस बनाने वाले दिग्गज माधवराव ¨सधिया ने भी अलग पार्टी की राह छोड़ कांग्रेस में घर वापसी की।

ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर बनाई अपनी पार्टी

साफ है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस में टूट को अंजाम देकर सियासी विकल्प बनने का प्रयास अब तक सिरे नहीं चढ़ पाया है। हालांकि बंगाल में ममता बनर्जी और आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी क्षेत्रीय पार्टी बना अपने प्रदेशों में सियासी परचम लहराया है। ममता बीते दस साल से बंगाल में शासन कर रहीं हैं और तीसरी पारी के लिए जोर लगा रहीं वहीं कांग्रेस बंगाल में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिख रही है। आंध्र में कांग्रेस की राजनीतिक जमीन को जगन रेड्डी ने ऐसा बंजर कर दिया है कि पार्टी सूबे की विधानसभा में अपना खाता तक नहीं खोल पा रही है। वैसे शरद पवार भी महाराष्ट्र की राजनीति के बड़े क्षेत्रीय छत्रप होने के कारण अपनी सियासी प्रासंगिकता बचाए रख पाए हैं।

कांग्रेस के असंतुष्ट जी 23 समूह में गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी सरीखे कुछ बड़े और चर्चित नाम जरूर हैं मगर इनमें कोई ऐसा चेहरा नहीं जिसकी सूबे की राजनीति में पवार, ममता या जगन जैसी मजबूत जमीनी पकड़ हो और ऐसे में अलग राजनीतिक विकल्प देने की इनकी राह आसान नहीं है।

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