नई दिल्ली, संजय मिश्र। चुनाव के बाद आंकड़ों के गणित के करीब होने के बाद भी सत्ता सियासत के खेल में कांग्रेस की नाकामियों का दौर थमने का नाम नहीं ले रहा। अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, गोवा और कर्नाटक के बाद कांग्रेस का महाराष्ट्र की सत्ता के खेल में फेल होना इसका ताजा उदाहरण है। बुलेट की स्पीड से चलने वाले भाजपा के सियासी दांवपेच में पुराने ढर्रे पर फूंक-फूंक कर कदम बढ़ाने की कांग्रेस की राजनीति सत्ता से उसकी दूरी को लगातार बढ़ाती जा रही है।

कांग्रेस एक बार फिर पिछड़ी

महाराष्ट्र के नतीजे आने के बाद शिवसेना के साथ गठबंधन में देरी का ठीकरा कांग्रेस भले राकांपा के सिर फोड़कर अपनी रणनीतिक नाकामियों पर पर्दा डाले मगर हकीकत तो यही है कि भाजपा की हाई स्पीड के सियासी दांव में पार्टी एक बार फिर पिछड़ गई। कांग्रेस-राकांपा चुनाव नतीजे आने के बाद बीते तीन हफ्ते से बैठकों का खेल खेलते रहे। शिवसेना को अपने पंजे में लेने की कांग्रेस-राकांपा की कसरत में लगे समय के दौरान भाजपा ने चुपके-चुपके अजीत पवार को ऐसा साधा कि शनिवार सुबह आंख खुली तो कांग्रेस ही नहीं शरद पवार जैसे राजनीति के धुरंधर की सियासी जमीन लुट चुकी थी। इन दोनों पार्टियों के लिए चिंता की बात यह भी है कि एक ओर कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकार अहमद पटेल तो दूसरी ओर खुद शरद पवार जैसे दिग्गज इस रणनीति का संचालन कर रहे थे।

जारी है सत्ता के करीब पहुंचकर बाहर रहने की नाकामी

कांग्रेस के लिए सत्ता हाथ से गंवाने या करीब आकर भी उससे दूर रह जाने की यह कहानी कोई पहली नहीं है। पिछले कुछ साल में सत्ता के दांवपेच में कांग्रेस के नाकामी की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश से हुई। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 2016 में दो महीने बाद कांग्रेस की सरकार बहाल हुई और पेमा खांडू मुख्यमंत्री बने। मगर दो महीने के भीतर ही पार्टी रणनीतिकारों को चकमा देते हुए खांडू ने कांग्रेस के 44 में से 43 विधायकों के पूरे विधायक दल का ही पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल प्रदेश में विलय कर दिया। अरुणाचल पीपुल्स पार्टी पूर्वोत्तर में तब भाजपा की अगुआई वाली एनडीए का हिस्सा थी। खांडू ने बाद में पीपीए का विलय भाजपा में कर लिया और इस तरह सूबे में बिना चुनाव के ही 60 सदस्यीय विधानसभा में 9 विधायकों वाली भाजपा की पूरी सरकार हो गई।

कई राज्‍यों में भी हाथ से छिटक गई थी सत्ता

गोवा और मणिपुर में 2017 के चुनाव के बाद तो सरकार बनाने से चुकने की दोहरी नाकामी की टीस कांग्रेस अभी तक महसूस कर रही है। गोवा की 40 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस 17 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। बहुमत के लिए चार सीटें जुटाने की कोशिश तत्कालीन कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने की। मगर हाईकमान से हरी झंडी मिलने में देरी हुई तब तक वरिष्ठ नेता नितिन गडकरी के संचालन में भाजपा ने सियासत पलट दी। तब रक्षामंत्री रहे मनोहर पर्रिकर ने तत्काल केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया और भाजपा ने अपने 13 विधायकों के साथ उनकी अगुआई में निर्दलीय और स्थानीय पार्टियों के बूते सरकार बना ली। दिग्विजय ने हाईकमान के निर्णय में देरी की बात तो सार्वजनिक रूप से कही भी। शायद इसीलिए उन्हें पार्टी महासचिव पद भी गंवाना पड़ा।

एक साल में ही कांग्रेस-जदएस की रणनीति फेल

मणिपुर में भी कुछ ऐसा ही हुआ जहां 60 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस 28 सीटों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी। मगर बहुमत के लिए कांग्रेस तीन सीट जुटाए उससे पहले ही 21 विधायकों के साथ दूसरे नंबर की पार्टी भाजपा ने कुछ क्षेत्रीय दलों व निर्दलीयों के समर्थन का दावा ठोक सरकार बना ली। भाजपा की इस तेज रफ्तार सियासत से मात खाने से पैदा हुआ यह भय ही था कि 2018 में कर्नाटक चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा बनी तो नतीजे आने के साथ ही कांग्रेस ने अपने से आधी सीट वाली जद सेक्यूलर के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनाने का एलान कर भाजपा की राह रोक दी। हालांकि एक साल में ही कांग्रेस-जदएस की यह रणनीति फेल हो गई और वे अपने विधायकों को ही भाजपा के पाले में जाने से बचा नहीं पाए और येदियुरप्पा की सरकार पांच महीने पहले ही दुबारा लौट आई। मगर इन नाकामियों के बाद भी कांग्रेस की सियासत की चाल पुराने दौर में ही चल रही है और महाराष्ट्र की नजदीक आई सत्ता की थाली एक बार फिर उसे छीन गई है।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

डाउनलोड करें जागरण एप और न्यूज़ जगत की सभी खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस