शिवेन्द्र राणा। उत्तर प्रदेश और पंजाब समेत देश के कई अन्य राज्यों में विधानसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। लेकिन वामपंथी दल कहीं नजर नहीं आ रहे। वर्तमान भारतीय राजनीति में वामपंथी दलों के लिए यह सबसे बुरा समय है। राजनीतिक रूप से वे इस समय सबसे कमजोर स्थिति में हैं। संसद में उनकी संख्या नगण्य है। जिस बंगाल में वामपंथी दल लगभग 34 वर्षो तक सत्ता में रहे थे, वहां आज वे अपना अस्तित्व बचाने की कोशिश में हैं। एकाध को छोड़ देश के बाकी राज्यों में वामपंथी दल पहचान के संकट से जूझ रहे हैं। वामपंथ के अवसान में कई कारण अंतर्निहित हैं।

वामपंथ के आधारभूत सिद्धांत यथा इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या, धर्म का निषेध, वर्ग संघर्ष पर जोर आदि परंपरागत भारतीय समाज में कभी स्वीकृत नहीं रहे। वामपंथ ने धर्म को लेकर जिस तरह का रुख अपनाया उससे उसके प्रति एक स्थायी घृणा का भाव रखने वाला वर्ग भी तैयार हो गया। वामपंथी राजनीति अक्सर गतिमान राजनीतिक धारा के विपरीत ही नजर आती है। वर्ष 1962 के चीनी हमले के समय भारत का विरोध करना, कठिन समय में अमेरिकी सहायता का विरोध, पिछली सदी के आखिरी दशक में भुगतान संतुलन से जूझ रही हमारी जर्जर अर्थव्यवस्था को संबल देने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाली सहायता और उदारीकरण की नीतियों का विरोध आदि ने वामपंथियों के लिए देश में निरंतर समर्थन कम किया। लेकिन वामपंथियों ने इतिहास से न सीखने की शपथ ले रखी है। वामपंथियों को अगर भारतीय जनमानस की भावना को आहत करने में यदि अपने लिए कोई लाभ दिख रहा है, तो यह सोचनीय विषय है।

कांग्रेस की नीतियों ने वामपंथ का आच्छादन करके भी कम्युनिस्ट दलों के विचारात्मक संघर्ष को कमजोर किया। पिछली सदी के छठे दशक में जवाहरलाल नेहरू का सर्वाधिकारवादी नेतृत्व कांग्रेस पर छा गया। उनके संपूर्ण कार्यकाल में वामपंथी विरोध-सहयोग-समन्वय की नीतियों पर चलते रहे। कांग्रेस मध्यम मार्ग से वामपंथ की ओर झुकती गई, वैसे कमोबेश आज भी कांग्रेस की नीतियां ऐसी ही हैं। भूमि सुधार, दलित-आदिवासी उत्थान, कृषि सुधार, पंथनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे कार्यक्रमों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता घोषित करती रही और न्यूनाधिक इस दिशा में प्रयासरत भी रही। इससे एक प्रकार से वामपंथियों के वैचारिक संघर्ष का आधार ही छिन गया।

पिछली सदी के आखिरी दशक की दो बड़ी घटनाएं जिन्होंने वामपंथ की जमीन दरका दी, एक मंडल कमीशन की रिपोर्ट का लागू होना और दूसरी लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्र के साथ श्रीराम मंदिर आंदोलन। इन दो बड़ी घटनाओं ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। इस दौर में बिहार समेत पूरे भारत में जातीय राजनीति का तेजी से उभार हुआ जिसने अंतत: वामपंथ की राजनीतिक शक्ति का क्षरण किया। जैसे बिहार को ही लें तो कभी इसको वामपंथ के लिए सबसे उर्वर भूमि के तौर पर देखा गया था। अस्मिता और वर्चस्व को लेकर पिछली सदी के नौवें और दसवें दशक में बिहार में भयंकर जातीय संघर्ष हुए। इस संघर्ष का प्रभाव उत्तर प्रदेश समेत कमोबेश पूरे देश की जाति आधारित राजनीति पर पड़ा। हालांकि इस संघर्ष में वामपंथी दलों ने भी अपनी राजनीति चमकाने की बहुत कोशिश की और इसे खूब भड़काया भी, किंतु इसका लाभ मिला पिछड़ी जाति के नेताओं को। इस दौर में उभरे जातीय नेता अपनी जाति आधारित राजनीति और जातिवादी गोलबंदी के जरिये सत्ता पर काबिज हुए एवं तेजी से अपना प्रभाव बढ़ाया। इसके विपरीत सामंतवाद मिटाने और वर्ग संघर्ष के नाम पर वामपंथियों ने सवर्ण जातियों के विरुद्ध जो विष वमन किया उससे इनमें वामपंथी राजनीति के प्रति स्थायी धृणा का भाव घर कर गया।

आपातकाल भारतीय राजनीति का प्रस्थान बिंदु माना जाता है। जनसंघर्ष की इस बेला में वामपंथियों ने दमनकारी सत्ता का सहयोग करते हुए उसे ‘अनुशासन पर्व’ की संज्ञा दी। हालांकि जयप्रकाश नारायण के प्रभाव के कारण ही वामपंथ को बंगाल में कांग्रेस पर हावी होने का मौका मिला। लेकिन शेष उत्तर भारत में वामपंथ का प्रभाव सिमटना शुरू हो गया। इसी समय पिछड़ी जातियों के नेता भी उभरे, जिन्होंने वामपंथियों द्वारा खाली राजनीतिक जमीन पर खुद को खड़ा किया। युवाओं को तरजीह न देना भी वामपंथी दलों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है।

वर्ष 2010 के पश्चात राष्ट्रीय हो या क्षेत्रीय, हर दल ने अपनी अगली पीढ़ी के युवाओं को आगे किया। परंतु वामपंथी दलों में शीर्ष पदों पर 60 वर्ष से अधिक आयु के नेता भरे पड़े हैं। वामपंथी दल ये तो चाहते हैं कि युवा उनके झंडे उठाए और विचारों का वाहक बने, किंतु शीर्ष स्तर पर युवाओं की भागीदारी उन्हें स्वीकार नहीं। युवा नेतृत्व उन्होंने न तो विकसित किया और न ही उन्हें प्रशिक्षित किया। हालांकि युवाओं में वामपंथ के प्रति बढ़ती अरुचि भी एक बड़ा कारण है जिससे इसका फैलाव सीमित हुआ है। कई वर्ष पूर्व शीर्ष माओवादी नेता कोबाद गांधी ने लिखा था, ‘उन लोगों को आत्मचिंतन करना होगा कि उनकी पकड़ जंगल के एक छोटे से हिस्से तक सीमित क्यों हो गई है, क्यों वे मैदानी इलाकों में नहीं बढ़ पा रहे हैं और क्यों वे युवा पीढ़ी तक पहुंचने में नाकाम हो रहे हैं।’

[शोधार्थी, इतिहास]

Edited By: Sanjay Pokhriyal