जेएनएन, नई दिल्ली। कुलभूषण जाधव के मामले में आइसीजे ने फिलहाल भारत के पक्ष में फैसला सुनाया है। अब सवाल यह है कि अंतरराष्ट्रीय अदालत का फैसला किसी देश पर कितना बाध्यकारी है? संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 94 के मुताबिक, संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश अदालत के उस फैसले को मानेंगे, जिसमें वह स्वयं पक्षकार हैं।

फैसला अंतिम होगा और इस पर कोई अपील नहीं सुनी जाएगी। हालांकि अगर फैसले की किसी पंक्ति या शब्द के अर्थ को लेकर आशंका हो या उसके एक से अधिक अर्थ संभव हों, तो संबंधित पक्ष अदालत से उसकी पुन: व्याख्या की अपील कर सकता है। इसके अलावा अगर किसी पक्ष को बाद में कोई ऐसा तथ्य पता चले, जिससे फैसले पर प्रभाव पड़ सकता था, तो कोई भी पक्ष फैसले पर पुनर्विचार की याचिका दे सकता है।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि अंतरराष्ट्रीय अदालत के पास अपने आदेश को लागू करवाने के लिए सीधे कोई शक्ति नहीं होती। ऐसे में किसी देश को अगर लगता है कि दूसरे देश ने ICJ के आदेश की तामील नहीं की, तो वह इस पर संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में गुहार लगा सकता है। इस पर फिर सुरक्षा परिषद उस आदेश को लागू करवाने के लिए उस देश के खिलाफ कदम उठा सकता है।

आदेश के उल्लंघन के भी आए हैं मामले
ऐसे मामले भी आ चुके हैं, जब आइसीजे के आदेश का पालन नहीं किया गया। सबसे प्रसिद्ध मामला 1986 का है। उस समय निकारागुआ ने अमेरिका के खिलाफ शिकायत की थी कि एक विद्रोही संगठन की मदद करते हुए अमेरिका ने उसके विरुद्ध छद्म युद्ध छेड़ा है।

निकारागुआ के पक्ष में फैसला देते हुए आइसीजे ने अमेरिका को क्षतिपूर्ति देने का फैसला सुनाया था। फैसले के खिलाफ जाते हुए अमेरिका ने खुद को आइसीजे के अधिकारक्षेत्र से बाहर कर लिया। संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक, सुरक्षा परिषद को अदालत का फैसला लागू करवाने का अधिकार है, लेकिन यहां अमेरिका ने वीटो लगाते हुए फैसला मानने से इन्कार कर दिया था।

पाकिस्तान ने कहा, कानून का करेगा पालन
 कुलभूषण जाधव मामले में आइसीजे से मुंह की खाने के बाद अब पाकिस्तान ने कहा है कि वह कानून का पालन करेगा। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का जिम्मेदार सदस्य होने के नाते पाकिस्तान शुरू से ही इस मामले में प्रतिबद्धता दिखा रहा है। पाकिस्तान ने फैसला सुन लिया है और अब कानून के अनुरूप कदम उठाएगा।हालांकि अंतरराष्ट्रीय अदालत के फैसले के बाद भी पाकिस्तान अपनी दलील पर कायम है। उसका कहना है कि जाधव ने हुसैन मुबारक पटेल के छद्म नाम से बने भारतीय पासपोर्ट पर पाकिस्तान में प्रवेश किया था।

ऐसे तार-तार हुआ पाकिस्तान का झूठ
1. आठ मई, 2017 को भारत ने पाकिस्तान द्वारा वियना संधि के उल्लंघन का हवाला देते हुए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला शुरू किया।
2. भारत ने दलील दी कि पाकिस्तान ने जाधव को तीन मार्च, 2016 को गिरफ्तार किया जबकि भारत को इसकी जानकारी 25 मार्च 2016 को दी। इस तरह समय पर जानकारी न देकर पाकिस्तान ने वियना संधि के अनुच्छेद 36(1)(बी) का उल्लंघन किया।
3. पाकिस्तान ने जाधव को राजनयिक पहुंच उपलब्ध नहीं कराई जबकि भारत इसकी लगातार मांग करता रहा।4. पाकिस्तानी सैन्य अदालत ने हिरासत में बयान के आधार पर सजा सुनाकर अंतरराष्ट्रीय संधियों और नियमों का मखौल उड़ाया।
5. नागरिकों के मुकदमे के लिए सैन्य अदालत का इस्तेमाल करना निर्धारित प्रक्रिया और मानकों का उल्लंघन है।
6. राजनयिक पहुंच के मामले में द्विपक्षीय संधि का हवाला देकर बहुपक्षीय संधि या वियना संधि के प्रावधानों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
7. कानूनी मदद के लिए पाकिस्तान का आग्रह सिर्फ एक दुष्प्रचार था।
8. पाकिस्तान म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी पर राजी नहीं हुआ। उसने सार्क में इसे मंजूरी भी नहीं दी।
9. भारत ने म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस ट्रीटी के संबंध में 20 बार पाकिस्तान से आग्रह किया, लेकिन उसने एक बार भी उसका जवाब नहीं दिया।
10. पाकिस्तान को जाधव की 'गिरफ्तारी' की सूचना बिना किसी विलंब के भारतीय काउंसलर को देनी चाहिए थी।

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Posted By: Sanjeev Tiwari