नई दिल्ली (जेएनएन)। आज पूरे देश की नजर कर्नाटक में चल रही सियासी उठा-पटक पर थी। बीएस येद्दयुरप्पा को शनिवार शाम 4 बजे कर्नाटक विधानसभा में बहुमत साबित करना था। भाजपा नेता बीएस येद्दयुरप्पा ने 104 सीटें जीतकर कर्नाटक के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। भाजपा बहुमत के जादुई आंकड़े से 7 सीटें दूर थी। सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद शनिवार को उन्हें सदन में बहुमत साबित करना था, लेकिन येद्दयुरप्पा ने बहुमत न होने की स्थिती में फ्लोर टेस्ट होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया। आखिर क्या है फ्लोर टेस्ट, जिसकी वजह से कर्नाटक में भाजपा की सरकार गिर गई और किन परिस्थितियों में इसकी जरूरत पड़ती है।

फ्लोर टेस्ट या शक्ति परीक्षण
बहुमत साबित करने की प्रक्रिया को फ्लोर टेस्ट कहा जाता है। इसमें प्रोटेम स्पीकर के सामने सभी विधायक अपनी पार्टी के लिए वोट करते हैं। अगर किसी भी दल के पास पूर्ण बहुमत नहीं होता और एक से ज्‍यादा पार्टियां सरकार बनाने का दावा करती हैं तो ऐसी स्थिति में राज्‍यपाल किसी एक को बहुमत साबित करने को कहता है। फ्लोर टेस्ट में सभी विधायकों को बहुमत चुनाव के लिए आमंत्रित किया जाता है।

तीन तरह से होता है फ्लोर टेस्ट

1. ध्वनिमत
2. ईवीएम
3. बैलट बॉक्स

सबसे पहले विधायकों से ध्वनि मत लिया जाता है। इस तरीके से वोटिंग के लिए स्पीकर प्रस्ताव के पक्ष में विधानसभा सदस्यों से 'हां' या 'ना' में जवाब लेते हैं। इसके बाद कोरम बेल बजती है। फिर सभी विधायकों को पक्ष और विपक्ष में बंटने को कहा जाता है। विधायक सदन में बने हां या नहीं वाले लॉबी की ओर रुख करते हैं। इसके बाद पक्ष-विपक्ष में बंटे विधायकों की गिनती की जाती है। फिर स्पीकर परिणाम की घोषणा करता है।

इस तरीके को जहां, सबसे सरल और जल्दी संपन्न होने वाला माना जाता है, वहीं इसे विवादास्पद भी माना जाता है। खास तौर पर उस स्थिति में जब किसी भी दल के पास स्पष्ट बहुमत न हो। कई बार ध्‍वनिमत से फ्लोर टेस्‍ट करवा या विधायकों की सदस्‍यता रद कर बहुमत परीक्षण के दौरान कई घपले हो चुके हैं। आइए आपको बताते हैं कि कब-कब क्या हुआ।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव
वर्ष 2014 में महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के दौरान किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। भाजपा के पास सबसे ज्यादा 122 विधायक थे, लेकिन उनके पास पूर्ण बहुमत नहीं था। बहुमत के लिए किसी भी पार्टी के पास 145 सीटों का होना आवश्यक था। भाजपा को किसी अन्य पार्टी ने समर्थन नहीं दिया था। भाजपा के वरिष्ठ नेता हरीभाऊ बागड़े को सर्वसम्मति से महाराष्ट्र विधानसभा का स्पीकर चुना गया था। उसके बाद देवेंद्र फडणवीस सरकार की ओर से पेश किया गया विश्वास प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित घोषित किया गया।

अध्यक्ष द्वारा विश्वासमत पर मत विभाजन की मांग ठुकरा दिए जाने के कारण शिवसेना के सदस्यों ने हंगामा कर दिया था। उस समय भाजपा ने तर्क दिया था कि मत विभाजन कराने के लिए मांग विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विश्वास मत के पारित होने की घोषणा के तुरंत बाद की जानी चाहिए थी। भाजपा का कहना था कि शिवसेना या कांग्रेस ने ऐसा नहीं किया। दूसरी तरफ शिवसेना ने भाजपा पर आरोप लगाया गया कि वह नहीं दिखाना चाहती कि उसे एनसीपी के विधायकों का समर्थन हासिल है। हालांकि एक महीने के बाद ही शिवसेना ने भी भाजपा को समर्थन दे दिया और भाजपा सरकार में शामिल हो गई थी।

गुप्त मतदान पर तमिलनाडू में हंगामा
फरवरी 2017 में तमिलनाडु विधानसभा में गुप्त मतदान को लेकर भारी हंगामा हो गया था। सीएम पलानीसामी ने विश्वास मत जीता था। 122 विधायकों ने पलानीसामी का समर्थन किया था। तमिलनाडु विधानसभा में 234 सीटें हैं और फरवरी में विधानसभा में एआईएडीएमके के 134 विधायक थे। उस समय बहुमत के लिए 118 विधायकों के समर्थन की जरूरत थी। आर नटराज के खिलाफ जाने के बाद भी पलानीसामी ने दावा किया था कि उनके पास बहुमत से 5 ज्यादा 123 विधायकों का समर्थन है।

डीएमके और अन्‍य विपक्षी दल गुप्‍त मतदान चाहते थे। विपक्ष गुप्‍त मतदान के जरिए कुछ और विधायकों को अपनी पार्टी में लाना चाहता था। एआइडीएमके के पनीरसेल्वम के सपोर्ट में खड़े विधायक भी सीक्रेट बैलेट से वोटिंग करवाने की मांग कर रहे थे। स्‍पीकर पी. ध्यानपाल ने गुप्‍त मतदान की मांग रद करते हुए विधानसभा में विश्वासमत पर वोटिंग करवा दी। जिसके बाद विधानसभा में जोरदार हंगामा हुआ था।

कर्नाटक में एक हफ्ते में 2 बार बहुमत परीक्षण
वर्ष 2011 में कर्नाटक में ही राजनीतिक उथल-पुथल देखने को मिली थी। भाजपा के 11 बागी विधायकों और 5 निर्दलीय विधायकों ने समर्थन वापस ले लिया था, जिसके बाद येद्दयुरप्पा सरकार खतरे में आ गई थी, लेकिन इसके बावजूद येद्दयुरप्पा ने एक हफ्ते में दो बार बहुमत साबित करके दिखा दिया। पहला विश्वास मत उन्होंने ध्वनिमत से जीता, लेकिन तत्कालीन राज्यपाल हंसराज भारद्वाज ने इसे असंवैधानिक करार दे दिया। इसके बाद येद्दयुरप्पा को एक बार फिर विधानसभा में शक्ति परीक्षण से गुजरना पड़ा, जिसमें वो 100 के मुकाबले 106 मतों से जीत हासिल की।

1997 में यूपी में बहुमत परीक्षण के दौरान मारपीट
भारत के लोकतंत्र में लिए 21 अक्तूबर 1997 काले दिन के रूप में याद रखा जाएगा। उस दिन बहुमत परीक्षण के दौरान विधानसभा में विधायकों के बीच मारपीट तक हो गई थी। उस दिन विधानसभा के भीतर विधायकों के बीच माइकों की बौछार, लात-घूंसे, जूते-चप्पल सब चल गए थे। विपक्ष की गैरमौजूदगी में कल्याण सिंह ने बहुमत साबित कर दिया था। उन्हें 222 विधायकों का समर्थन मिला जो भाजपा से अधिक था। कांग्रेस नेता प्रमोद तिवारी ने सदन में वोटिंग की मांग की थी। कांग्रेस के साथ बीएसपी विधायक भी हंगामा करने लगे। इस बीच एक विधायक ने स्‍पीकर पर माइक फेंक दिया। इसके बाद विधायकों के बीच हाथापाई होने लगी। 40 से अधिक विधायकों को गंभीर चोटें आईं।

Posted By: Arti Yadav

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