हरेंद्र प्रताप। जनसंघ से भाजपा तक की यात्रा के 70 वर्ष पूरे हो चुके हैं। 21 अक्टूबर 1951 को दिल्ली में जनसंघ की स्थापना हुई थी। इसके पहले महामंत्री भले ही डा. भाई महावीर बने, परंतु 1952 से 1967 तक इसके महामंत्री पंडित दीनदयाल उपाध्याय रहे। अत: जनसंघ की विचारधारा, संगठन विस्तार और इसकी कार्यपद्धति को विकसित करने का श्रेय दीनदयालजी को जाता है।

जनसंघ की स्थापना के पूर्व दो सितंबर 1951 को लखनऊ में उत्तर प्रदेश जनसंघ इकाई का गठन हुआ और दीनदयाल उपाध्याय प्रदेश मंत्री बनाए गए। 29 से 31 दिसंबर 1952 तक कानपुर में हुए इसके प्रथम अखिल भारतीय अधिवेशन में दीनदयालजी महामंत्री बने। कानपुर अधिवेशन की सफलता और दीनदयाल उपाध्याय के प्रबंधन को देखकर डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा, ‘यदि मुझे दो दीनदयाल मिल जाएं तो मैं भारतीय राजनीति का नक्शा बदल सकता हूं।’

दीनदयालजी की जब भी चर्चा होती है तो उनके साथ ‘एकात्म मानववाद’ शब्द का उल्लेख अवश्य होता है। सामान्य अवधारणा यह है कि जैसे पूंजीवाद, साम्यवाद या समाजवाद है उसी तरह एक और वाद ‘एकात्म मानववाद’ है। दत्तोपंत ठेंगड़ी ने ‘तीसरा विकल्प’ नामक पुस्तक में इस बारे में लिखा है, ‘दीनदयालजी किसी भी ‘वाद’ के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने ‘एकात्म मानवता’ की संकल्पना को जन्म देकर उस शब्द की सृष्टि और स्पष्ट व्याख्या कर मानवता की महान सेवा की है। ‘मानववाद’ शब्द का प्रयोग भी उन्होंने आज के पाश्चात्य अर्थ में कभी नहीं किया। पश्चिम का मानववाद प्राय: स्वयंकेंद्रित है। परंतु पश्चिम प्रभावित बुद्धिजीवियों के आकलन स्तर के साथ समझौता करना था, इसीलिए ‘एकात्म मानववाद’ शब्द की निर्मिति की जो वस्तुत: ‘वादहीनता’ का पर्याय है।’

विचारधारा को लेकर बने राजनीतिक दलों की जब भी चर्चा होती है तो उसमें दो ही दल का नाम सामने आता है- एक कम्युनिस्ट तथा दूसरा जनसंघ/ भाजपा। दरअसल स्वतंत्र भारत में अधिकतर दल जातिवाद और तुष्टीकरण के सहारे अपनी राजनीति कर रहे थे, पर जनसंघ राष्ट्रीय एकता, अखंडता और सुरक्षा को अपनी पहली प्राथमिकता देते हुए हिंदुत्व की बात करता था। गैर जनसंघ दलों ने पहले तो इसको नजरअंदाज किया, पर जैसे-जैसे उसकी ताकत बढ़ने लगी उसे अछूत घोषित कर उस पर सवर्णो और शहरी पार्टी होने का तमगा चिपकाकर उस पर गरीब विरोधी होने का आरोप मढ़ दिया।

जनसंघ का नारा ‘हर हाथ को काम और हर खेत को पानी’ उसकी आर्थिक और सामाजिक नीति समझने के लिए पर्याप्त था, फिर भी इसके विरोधी यह आरोप लगाते रहे कि इनकी कोई आर्थिक नीति नहीं है। आर्थिक विषयों पर जनसंघ को परखने पर यह बात सामने आती है कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय और डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी दोनों आर्थिक विषय के जानकार थे। दीनदयालजी ने आर्थिक विषयों को लेकर तीन पुस्तकें भी लिखीं। जनसंघ ने दीनदयालजी के मार्गदर्शन में ही अपने आर्थिक प्रस्ताव तैयार किए।

वर्ष 1951 में आगामी लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखकर बनाए गए घोषणा पत्र में आर्थिक विषय पर जो नीति घोषित हुई, उसमें कहा गया कि भारत की संस्कृति और मर्यादा के आधार पर राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जनतंत्र बनाया जाएगा। जनसंघ जमींदारी का उन्मूलन कर कृषकों में भूमि बांट देगा। पिछड़ी जातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रयत्न करने और सार्वजनिक स्थान, विशेष रूप से मंदिरों और कुओं आदि को सभी के लिए खोलने की बात कही गई। जिस नागरिकता कानून को लेकर बीते वर्ष देश में अराजकता उत्पन्न करने की कोशिश हुई थी उसका संकल्प भी इसी प्रतिनिधि सभा में प्रकट किया गया था कि ‘पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) से भारत आने के इच्छुक हिंदुओं के मार्ग में किसी प्रकार की बाधा नहीं रहेगी।’

आज के ‘मेक इन इंडिया’ की नींव 1951 में ही उसकी औद्योगिक नीति में रखी गई थी जब यह संकल्प लिया गया था कि ‘थोड़े से समय में सब प्रकार के उद्योगों की स्थापना से जनता के उपयोग में आनेवाली सभी प्रकार की वस्तुओं के विषय में देश स्वावलंबी हो जाए। आदर्श गांव, गांवों में बैंक खोलने, पशुओं और खेती का बीमा करने, ग्रामोपयोगी छोटी मशीनों और कल-कारखानों द्वारा आधुनिक पद्धति से उद्योग चलाने की शिक्षा देने के लिए उद्योग-शिक्षाशालाओं की स्थापना की जाएगी।’ राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर युवाओं को सैन्य शिक्षा देने की व्यवस्था के साथ सुरक्षा संबंधी उद्योगों की स्थापना की प्रतिबद्धता जताई गई थी।

इस दल ने ‘सब का साथ और सबका विश्वास’ केवल नारे तक ही नहीं उसे वास्तविक धरातल पर उतारने का संकल्प भी अपने दल के संविधान में दिखाया। अपनी 51 सदस्यीय कार्यसमिति में तीन महिला, दो अनुसूचित जाति तथा दो अनुसूचित जनजाति के सदस्यों के होने को अनिवार्य कर दिया। कार्यकर्ता आधारित संगठन होने के कारण सभी नीतियां आमजन तक पहुंचने लगीं। स्वतंत्र भारत के पहले आम चुनाव में जनसंघ को दो राज्यों से तीन सीटों पर जबकि कम्युनिस्ट को चार राज्यों से 16 सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा तीन से बढ़कर तीन सौ को पार कर गई। वहीं कम्युनिस्ट पार्टी 1964 में ही टूटकर सीपीआइ और सीपीएम बन गई थी। दोनों मिलकर भी 16 से घटकर पांच सीटों पर सिमट चुके हैं। ऐसे में यह भी स्पष्ट है कि जनसंघ/ भाजपा का विस्तार हुआ और कम्युनिस्टों/ समाजवादियों का संकुचन। यह विदेशी विचारधारा की हार और राष्ट्रीयता की जीत है।

[पूर्व सदस्य, बिहार विधान परिषद]

Edited By: Sanjay Pokhriyal