नई दिल्ली [ शैलेंद्र चौहान] । गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनाव कांग्रेस के लिए जहां अपनी खोती जमीन को बचाने का संघर्ष था तो भाजपा के लिए कांग्रेस को एक और चुनाव में पछाड़ने का। मतदाताओं ने गुजरात में भाजपा को कमजोर कर और कांग्रेस को मजबूत कर साफ किया है कि उन्हें उनके हकों के लिए लड़ने वाला मजबूत विपक्ष चाहिए। ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा रहा, लेकिन भाजपा को मात देने और सरकार बनाने के लिए तो उसे शहरी इलाकों में भी ऐसा ही प्रदर्शन दोहराने की जरूरत थी। पिछले चुनाव में भी 64 में से 60 सीटें भाजपा की ही थीं। कांग्रेस पार्टी इन शहरी इलाकों में भाजपा के गढ़ को ध्वस्त नहीं कर पाई। कांग्रेस की सारी कोशिशें अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट, सूरत जैसे शहरी इलाकों में आकर रुक गईं।

गुजरात चुनाव में स्थानीय मुद्दों की कमी
इस बार के चुनाव में कोई स्थानीय नेता या मुद्दा सामने नहीं आया। पूरा चुनाव मोदी बनाम राहुल लड़ा गया। ये कांग्रेस की एक उपलब्धि है क्योंकि पहली बार कांग्रेस ने नरेंद्र मोदी को उलझाया। अब तक मोदी आगे दौड़ते थे और कांग्रेस पीछे खिसकती रहती थी, लेकिन इस बार राहुल गांधी इस राज्य में एक चुनौती की तरह सामने आए। एक समय था कि कांग्रेस और राहुल गांधी को चुनौती तक नहीं माना जाता था, लेकिन इस बार ऐसी हड़बड़ाहट इस हद तक हुई कि प्रधानमंत्री को अपने ‘गुजरात का बेटा’ और ‘चाय वाला’ जैसे कार्ड भुनाने पड़े। प्रचार अभियान के बीच भाजपा ने कुछ ऐसे फैसले किए जिनका फायदा उन्हें तुरंत मिला जैसे सूरत में जीएसटी को लेकर गुस्सा था तो उन्होंने बीच में उसमें बदलाव कर दिए।

कुछ कहता है हिमाचल का चुनाव
वहीं हिमाचल प्रदेश के नतीजे भाजपा के लिए सुख व दुख दोनों वाले नतीजे हैं। आम तौर पर वह अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं करती, लेकिन हिमाचल में जीतने के लिए उसने ये किया, लेकिन उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार प्रेम कुमार धूमल का हारना दिखाता है कि जनता को उम्मीदवारों में भी बदलाव चाहिए। कांग्रेस को काटने के लिए कांग्रेस जैसी राजनीति को लंबे समय तक समर्थन नहीं मिलेगा। कांग्रेस ने असम के बाद फिर वही भूल की और वयोवृद्ध मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को फिर से उम्मीदवार बनाया। जब भी पार्टी ये फैसला नहीं कर पाएगी तो फैसला जनता करेगी और हिमाचल में मुख्यमंत्री को बदलने की हिम्मत न दिखा सकने वाले पार्टी नेतृत्व का फैसला मतदाताओं ने कर दिया। जिस देश की 65 प्रतिशत आबादी की उम्र 35 साल से नीचे हो, वहां अब बुजुर्ग नेता उनकी आकांक्षाओं को पूरा करने की हालत में नहीं हैं। भारत के राजनीतिक दल शायद जर्मनी के बवेरिया प्रांत से कुछ सीख सकते हैं, जहां पिछले हफ्ते 67 वर्षीय मुख्यमंत्री ने 47 वर्षीय युवा नेता माकरुस जोएडर को कुर्सी सौंपने का फैसला किया है। बवेरिया के चुनाव अगले साल होंगे। नए नेता तब तक अपनी जगह बना सकेंगे और मतदाताओं को प्रभावित कर सकेंगे। सत्ताविरोधी लहर से बचने के लिए बवेरिया की सत्तारूढ़ पार्टी की ये रणनीति है।

दोनों दलों को आत्मचिंतन की जरूरत
कांग्रेस और भाजपा को आत्ममंथन करने की जरूरत है। पीएम मोदी को विचार करना होगा कि आखिर कब तक वे ‘मेरे साथ अन्याय हुआ’ जैसी बातों पर चुनाव लड़ और जीत सकते हैं। उन्होंने सरकार भले ही बचा ली, लेकिन उन्हें समझना पड़ेगा कि ग्रामीण इलाकों में उनकी राजनीति कमजोर हो रही है। दूसरे, मजबूत होता विपक्ष उनके लिए आगे चलकर परेशानी खड़ी कर सकता है। भाजपा को यह भी सोचना होगा कि सिर्फ एक शख्स के नाम पर राजनीति करते रहने से क्या होगा। कांग्रेस में भी एक समय में इंदिरा गांधी पार्टी से बड़ी हो गई थी। ‘इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’ के दौर में कांग्रेस के जमीनी काडर को जो नुकसान हुआ, कांग्रेस पार्टी आज तक उससे निकल नहीं पा रही है। भाजपा का कांग्रेसीकरण होने से ये सारी परेशानियां उनके हिस्से में भी आएंगी।

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Posted By: Lalit Rai

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