नई दिल्‍ली [स्‍पेशल डेस्‍क]। गुजरात के बाद भाजपा ने हिमाचल प्रदेश में भी भगवा परचम लहराकर साबित कर दिया है कि फिलहाल उनके सामने कोई भी दूसरी पार्टी नहीं ठहर सकती है। एक तरफ भाजपा ने जहां हिमाचल की सत्ता से कांग्रेस को दूर कर दिया वहीं गुजरात में अपनी सत्ता को कायम रखा है। वास्‍तव में यह भाजपा के लिए दोहरी उपलब्धि तो है ही। अब हमेशा की तरह कांग्रेस इस हार की वजह तलाशने में जुटेगी। हालांकि इसमें किसी को कोई शक भी नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस के लिए जीत का अर्थ गुजरात में भाजपा को हराना ही था। यही वजह थी कि उसने हिमाचल प्रदेश पर न के बराबर ही ध्‍यान दिया और अपनी सारी ताकत गुजरात में झोंक दी।

इसका ही नतीजा रहा कि गुजरात की 182 सीटों में से भाजपा को 99 पर जीत मिली और कांग्रेस ने सहयोगी दलों के साथ यहां 80 सीटें जीत दर्ज की। भाजपा लगातार छठी बार गुजरात में सरकार बनाएगी। उसके लिए बड़ी उपलब्धि जरूर है। वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी एंड पार्टी पूरे चुनाव प्रचार के दौरान गुजरात में ही कभी रैलियां तो कभी रोड शो तो कभी मंदिर दर्शन करते रहे। इतना सब करने के बाद भी कांग्रेस सत्ता की दहलीज को पार नहीं कर सकी। अलबत्ता इस लड़ाई में वह हिमाचल को भो खो बैठी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि इतनी तैयारी के बाद भी आखिर कांग्रेस पिछड़ कैसे गई और भाजपा जीत कैसे गई। इसके कुछ कारण बेहद खास हैं:-

भाजपा ने जीएसटी को यूं नहीं बनने दिया समस्‍या

चुनाव से पहले राज्य में सरकार विरोधी लहर चल रही थी, जिसका भान पार्टी नेताओं को था। इससे निपटने की रणनीति के तहत भाजपा ने अपनी तरह से तैयारियां शुरू की। नाराज पाटीदारों को पटाने के लिए भाजपा ने अपने पुराने विधायकों के टिकट में कोई बदलाव नहीं किए ताकि अपने लोगों में कोई विद्रोह न होने पाए। टिकट की आस लगाए नए लोगों को नाराज होने से पार्टी नेता समझाने में सफल रहे। नोटबंदी व जीएसटी जैसे मसलों पर व्यापारियों की नाराजगी को साधने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सूरत, जामनगर व राजकोट जैसे शहरों में तीन-तीन, चार-चार बार दौरा किया। व्यापारियों की समस्याओं को मौके पर ही निपटाया।

किसानों की समस्‍या का हल

किसानों की नाराजगी से निपटने के लिए कृषि मंत्री राधामोहन सिंह व ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र तोमर के दौरे कराए गए। किसानों की नाराजगी कम करने को चुनाव से पहले सौराष्ट्र जैसे सूखाग्रस्त क्षेत्र में सरदार सरोवर का पानी खेतों तक पहुंचाया गया।

पीएम मोदी ने उठाया गुजराती अस्मिता का मुद्दा

गुजरात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद एक बड़ा चेहरा थे, या यूं क‍हें कि यह चुनाव भी हर राज्‍य की तरह उनके ऊपर ही लड़ा गया था। कांग्रेस के हमलों के जवाब में पीएम मोदी ने गुजराती अस्मिता का मुद्दा उठाया जिसे भुनाने में वह काफी हद तक सफल रहे।

अय्यर का विवादित बयान

चुनाव प्रचार के अंतिम पड़ाव में कांग्रेस के वरिष्‍ठ नेता मणिशंकर अय्यर के दिए बयान ने यहां पर कांग्रेस की हालत खराब करने का काम किया। अंतिम समय में अय्यर के दिए गए बयान को भाजपा काफी हद तक भुनाने में कामयाब रही और कांग्रेस इससे पार नहीं पा सकी। हालांकि अय्यर पर उनके दिए बयान के बाद कार्रवाई भी की गई और खुद राहुल गांधी ने उनके बयान की निंदा की। लेकिन इसका असर गुजरात की जनता पर नहीं पड़ा।

भाजपा के आगे फेल कांग्रेस की रणनीति

गुजरात में चुनाव को लेकर जो रणनीति भाजपा ने बनाई उसके सामने कांग्रेस की रणनीति विफल हो गई। भाजपा ने बूथ लेवल से लेकर ऊपर तक बेहतर तरीके से मैनेज किया। इसमें भाजपा कार्यकर्ताओं ने पूरा जोर लगाया। बूथ स्‍तर पर जो पकड़ भाजपा की दिखाई दी उसमें कांग्रेस बहुत पीछे थी।

 

नहीं चले कांग्रेस के तीन पत्‍ते

कांग्रेस ने अपनी जीत के लिए जिन मुद्दों को हवा दी थी उसमें आरक्षण और जीएसटी प्रमुख था। लेकिन दोनों का ही जोर कुछ कम दिखाई दिया। वहीं कांग्रेस ने जिस तरह से हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश पर ज्यादा भरोसा जताया उससे ऐसा भी लगा कि पार्टी के पास अपने लिए जीत की सही राह खोलने का विकल्‍प नहीं है। हालांकि इन तीनों की तिगड़ी ने भाजपा को कुछ जगह जरूर नुकसान पहुंचाया लेकिन कांग्रेस के लिए यह सत्ता की चाबी नहीं बन सके।

सौराष्‍ट्र में पाटीदारों का जोर

हालांकि पाटीदारों के गढ़ सौराष्ट्र में भाजपा को नुकसान हुआ, लेकिन उसकी भरपाई दूसरे क्षेत्रों से हो गई। सौराष्ट्र-कच्छ की 54 सीटों में भाजपा 24 सीटें ही जीत पाई जबकि कांग्रेस को 30 सीटें मिलीं। यह वही क्षेत्र था जहां हार्दिक पटेल का पाटीदार आंदोलन तेज रहा। अहमदाबाद और उसके आसपास के मध्य गुजरात में भाजपा ने दबदबा कायम रखा। यहां की 61 में से 40 सीटें उसने जीतीं। कांग्रेस को 19 सीटें ही मिलीं। जीएसटी से दक्षिण गुजरात में भाजपा को नुकसान की आशंका थी, लेकिन पार्टी ने यहां 35 सीटों में से 24 पर जीत दर्ज की।

भारी पड़ा साथियों के लिए सीट छोड़ना

गुजरात में कांग्रेस ने जिन पार्टियों के साथ समझौता किया उन्‍हें सीट छोड़ना भी पार्टी के लिए भारी पड़ गया। मसलन छोटू वसावा की भारतीय टिब्यूनल पार्टी के लिए सात सीटें छोड़ना महंगा पड़ा। यह पार्टी केवल दो सीट ही जीत सकी। अल्पेश ठाकोर व उनके साथियों को टिकट देने हेतु पुराने चेहरों की अनदेखी से दर्जन भर से अधिक सीटों पर खामियाजा भुगतना पड़ा। सूबे के दिग्गज कांग्रेस नेताओं का अति आत्मविश्वास भी महंगा पड़ा।

हिमाचल में सत्ता विरोधी लहर

हिमाचल प्रदेश की यदि बात करें तो वहां पर कांग्रेस को लेकर जबरदस्‍त जन आक्रोश साफतौर पर दिखाई दे रहा था। इस बात को कांग्रेस भी भलिभांति जानती रही होगी। शायद यही वजह थी कि कांग्रेस अध्‍यक्ष ने इस ओर न के ही बराबर ध्‍यान दिया। राहुल की कुछ गिनीचुनी रैलियों को छोड़ दें तो यहां पर राहुल ने कोई खास मेहनत नहीं की। यहां का चुनाव प्रचार पूरी तरह से प्रदेश कांग्रेस और राज्‍य के सीएम के दम पर ही लड़ा गया था। लिहाजा हार तय थी।

अब 19 राज्‍यों में भाजपा

आपको बता दें कि गुजरात-हिमाचल के नतीजों के साथ अब देश के 19 राज्यों में भाजपा व उसके सहयोगी दलों की सरकार है। इसके साथ ही देश की 67 फीसद आबादी और 78 फीसद भू-भाग पर राजग का कब्‍जा है। देश की एकमात्र बड़ी विपक्षी पार्टी कांग्रेस एक केंद्र शासित समेत पांच राज्यों और 7.78 फीसद आबादी तक सिमट कर रह गई है। आपको बता दें कि वर्ष 2018 में मध्‍य प्रदेश, जो बड़ी जीत मिली है उसका असर इन राज्‍यों पर भी दिखाई दे सकता है। इन राज्यों में से एक कर्नाटक में फिलहाल कांग्रेस सत्ता में है।

कांग्रेस के लिए आराम का समय नहीं

भाजपा अब हिमाचल और गुजरात की जीत को इन राज्‍यों में भुनाने की पूरी कोशिश करेगी। वहीं कांग्रेस के लिए आराम का कोई समय नहीं है। उसको अपनी हार भुलाकर तुरंत ही इन राज्‍यों के चुनाव की तैयारी में जुटना होगा। इन सभी के बीच यह भी बेहद खास है कि लगभग डेढ़ साल के बाद आम चुनाव भी होने हैं। लिहाजा कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौतियां अभी बरकरार हैं।

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Posted By: Kamal Verma

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