नई दिल्‍ली [अंजलि सिन्हा]। आम बजट में घोषित सरकार की स्वास्थ्य बीमा योजना-जिसमें दस करोड़ परिवारों को पांच लाख राशि का स्वास्थ्य बीमा देने की घोषणा हुई है- को अब तक की सबसे बड़ी स्वास्थ्य योजना बताया जा रहा है। नीति आयोग के उपाध्यक्ष राजीव कुमार ने इसे पासा पलटने वाली योजना बताया तो वहीं सरकार के विभिन्न स्नोतों ने इस योजना के तहत स्वास्थ्य नीति में बड़े बदलाव का विवरण दिया है। स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार सबसे अहम सवाल हैं। इसलिए इसके आसपास चर्चा तो होनी ही है और घोषणाएं भी, लेकिन क्या वाकई सरकार समस्याओं को सुलझाने के लिए इरादा रखती है। जहां अस्पतालों की, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों जैसे आधारभूत ढांचा अपने यहां आबादी की तुलना में बहुत कम है, डॉक्टर तथा अन्य सहयोगी स्टाफ की भारी कमी है वहां अस्पताल बनाने, नए-नए दूसरे एम्स जैसी अग्रणी संस्थाएं खोलने, डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए और अधिक अवसर मुहैया कराने की जरूरत हो, उस पर कोई चर्चा न हो, यह बेहद आश्चर्यजनक है।

इसमें किसका हित

अगर सारा जोर इस बात पर हो कि आपको पैसा मिलेगा बीमा के द्वारा ताकि आप अपना इलाज करा सकें तो इसमें किसका हित साधन होगा? आम आदमी का या बीमा कंपनियों का, दुकान के रूप में फैले निजी अस्पतालों का? शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों ही बाजार के तर्क से चलने वाले मुद्दे नहीं हैं। तभी उन्नत पूंजीवादी देशों में भी स्वास्थ्य सिर्फ बाजार के हवाले नहीं छोड़ा जाता और चिकित्सा सुविधा सभी को मुहैया कराना उनकी प्राथमिकता में होता है। वहीं इसके बावजूद नीति आयोग के उपाध्यक्ष तो खुले तौर पर बता रहे हैं कि सरकार को केवल बीमा प्रीमियम का बोझ उठाना है, जो कि बहुत थोड़ा होगा। भारी मात्र में खरीद और प्रतिस्पर्धा से लाभ प्राप्त होगा। वे कहते हैं कि यह योजना निजी क्षेत्र के उपक्रमों को प्रोत्साहित करेगी।

दिवालिया घोषित करने वाले लोगों की तादाद में बढ़ोतरी

बताते चलें कि अमेरिका में स्वास्थ्य सुविधाओं के बढ़ते खर्चे और उसके चलते अपने आप को दिवालिया घोषित करने वाले लोगों की तादाद में आश्चर्यजनक ढंग से बढ़ोतरी हुई है। 1981 में किसी चिकित्सकीय इमरजेंसी के चलते अपने आप को दिवालिया घोषित करने वालों की तादाद दिवाला घोषित करने वाले परिवारों में से महज 8 फीसद थी तो यह आंकड़ा 2001 में ही 46 फीसद को पार कर गया। 2007 तक आते आते यह आंकड़ा 62 फीसद से आगे बढ़ चुका है। यह आंकड़े अमेरिकी डॉक्टरों के एक बड़े समूह-जिसमें 2,500 से अधिक पेशेवर शामिल हैं-‘फिजिशियन्स फॉर नेशनल हेल्थ प्रोग्राम’ के अध्ययन के बाद सामने आए थे। इसलिए उन्होंने मांग की थी कि इसका एकमात्र उपाय यही है कि अमेरिका में निजी बीमा प्रणाली को समाप्त कर उसे सरकारी खर्चे से संचालित नेशनल हेल्थ प्रोग्राम से प्रतिस्थापित किया जाए ताकि सभी अमेरीकियों के स्वास्थ्य को ‘कवर’ किया जा सके। अपने यहां स्वास्थ्य को लेकर चिंता बनी हुई हैं क्योंकि भारत उन देशों में शुमार है जहां सरकारी बजट में स्वास्थ पर बहुत कम खर्च होता है।

दुनिया में 178वें स्थान पर भारत 

भारत सरकार के बजट को देखें तो वह सकल घरेलू उत्पाद का महज एक फीसद के आसपास रहता आया है। इसके बरक्स चीन में सकल घरेलू उत्पाद का 3 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च होता है तो अमेरिका अपनी जीडीपी का 8.3 फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करता है, जबकि ब्रिटेन में यह आंकड़ा 9.6 फीसद तक पहुंचता है, कनाडा में यह आंकड़ा 11.4 फीसद है तो जर्मनी में यह 11.7 और फ्रांस में 11.9 फीसद। एक अनुमान के अनुसार भारत स्वास्थ्य पर सरकारी खर्चे के हिसाब से दुनिया के 184 देशों में 178वें स्थान पर है। निम्न आय वाले देश -बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका से भी वह पीछे है। स्वास्थ्य खर्च के चलते लाखों गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं, इस पर अध्ययन हुए हैं।1संयुक्त राष्ट्र संघ के मुताबिक दुनिया के 1.2 अरब गरीबों की संख्या में से एक तिहाई भारत में रहते हैं। गरीब आबादी के लिए सरकारी स्वास्थ्य सुविधा ही एकमात्र आसरा होता है, जबकि स्वास्थ्य के क्षेत्र में निजी कंपनियों का प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है। स्वास्थ्य उद्योग में लगभग 15 फीसद के दर से हर साल बढ़ोतरी हो रही है।

निजी अस्पतालों को सस्ते दर पर जमीन

निजी अस्पतालों को सस्ते दर पर जमीने मुहैया कराई जा रही हैं और पैकेज के आकर्षण के कारण डॉक्टर अपनी सेवाएं वहां दे रहे हैं। सरकार की उदासीनता तथा नौकरशाही के जंजाल से मुक्त यहां कमाने का अच्छा अवसर दिखता है। सरकार भले ही घोषणा करती रहे कि मेडिकल की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवा सरकारी अस्पतालों को अपनी सेवाएं दें, लेकिन वह बदहाल स्वास्थ्यतंत्र को दुरुस्त करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करती है। बिना बुनियादी सुविधाओं के आखिर सुधार महज घोषणाओं से कैसे हो सकता है। ऐसा भी नहीं है कि भारत के पास संसाधनों की कमी है, यह दरअसल राजनीतिक इच्छाशक्ति का सवाल है। अगर एक छोटा सा देश क्यूबा-जो खुद उसी तरह आर्थिक संकट एवं अमेरिकी घेराबंदी की मार झेलते हुए-हर नागरिक को स्वास्थ्य का अधिकार दिलाने में तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन के हिसाब से दुनिया के लिए नजीर बनने में संभव हो सकता है तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता।

सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली मॉडल 

अगर अमेरिकी डॉक्टरों के समूह ‘फिजिशियन्स फॉर नेशनल हेल्थ प्रोग्राम’ की सिफारिश की तरफ फिर लौटें तो वह कहती हैं कि वह ‘सिंगल पेयर केयर सिस्टम’ यानी ‘सभी एक ही किस्म का भुगतान करेंगे’ इस आधार होनी चाहिए ताकि हर व्यक्ति द्वारा नियत राशि प्रदान करने पर उसे पूर्ण कवरेज दिया जा सके। स्वास्थ्य कार्यकर्ता अमित सेनगुप्ता का कहना है कि दुनिया में जहां जहां एकीकृत और सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों की कामयाबी की चर्चा हुई है, वह सभी देश इसी मॉडल पर आधारित है, जहां हर व्यक्ति अपनी नियत राशि भुगतान करता है और उसी पर उसे महंगा से महंगा इलाज कराया जाता है। ‘क्यूबा हो या कोस्टा रिका, मलेशिया, श्रीलंका या ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस जहां विगत कुछ दशकों से कार्यक्षम और समतामूलक स्वास्थ्य सुविधा वितरण की प्रणाली कायम हुई हैं या हाल के दिनों में चर्चित थाइलैंड और ब्राजील जैसे देश हों, वह सभी इसी पर आधारित हैं।’

(लेखिका स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Posted By: Kamal Verma