नई दिल्ली (जागरण स्पेशल)। अहं का टकराव किसी व्यक्ति या व्यवस्था का क्या हाल करता है इसका नमूना देखना हो तो देश की तीन परिवार आधारित पार्टियों में मचे राजनीतिक घमासान पर नजर डाली जा सकती है। हरियाणा के चौटाला परिवार में मचे राजनीतिक घमासान के बीच परिवार आधारित राजनीतिक पार्टियों की लोकतंत्र में भूमिका और उनके भविष्य को लेकर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है। हरियाणा के अलावा बिहार में लालू प्रसाद यादव के परिवार में बड़े बेटे तेजप्रताप और छोटे बेटे और पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव के बीच सियासी जंग अपने चरम पर है। उधर, उत्तर प्रदेश के यादव परिवार में भी वर्चस्व की लड़ाई के बीच समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव ने एलान कर दिया है कि वे अपने बेटे अखिलेश यादव के साथ नहीं बल्कि छोटे भाई शिवपाल के साथ हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये परिवार आधारित राजनीतिक पार्टियां अंतर्कलह और विखंडन के लिए अभिशप्त है और देश के लोकतंत्र के भविष्य में इनकी कोई भूमिका नहीं है।

चौटाला परिवार की खटपट

बात शुरू करते हैं चौटाला परिवार से। पैरोल पर आए इनेलो मुखिया ओपी चौटाला ने 7 अक्टूबर को गोहाना में अपने पिता देवीलाल के सम्मान में रैली की जिसमें उनके बेटे अभय चौटाला की हूटिंग की गई। इससे नाराज चौटाला ने जेल में बंद दूसरे बेटे अजय चौटाला के सांसद बेटे दुष्यंत चौटाला और उनके भाई दिग्विजय चौटाला को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। बता दें कि ओपी चौटाला और अजय चौटाला जेबीटी टीचर घोटाले में सजायाफ्ता हैं।

वनवास खत्म होने पर सवाल

चौटाला परिवार में एक ऐसे समय में सियासी घमासान छिड़ा है जब वह राज्य की सत्ता से 14 साल का वनवास खत्म करने की तैयारी में जुटी है। बसपा प्रमुख मायावती से समझौते से पार्टी में उत्साह का संचार हुआ था लेकिन परिवार में शुरू हुई खटपट ने इसमें पलीता लगा दिया है। कहना गलत न होगा कि यह जंग यहीं खत्म होने वाली नहीं है। पार्टी में दोफाड़ का खतरा मंडरा रहा है। इसकी वजह है ओपी चौटाला का अभय चौटाला की ओर झुकाव। पार्टी में उनकी बढ़ती अहमियत को अजय चौटाला के बेटे दुष्यंत और दिग्विजय पचा नहीं पा रहे हैं। जबकि पार्टी में खासकर युवाओं में दुष्यंत और दिग्विजय की बढ़ती लोकप्रियता को अभय चौटाला गले से नीचे नहीं उतार पा रहे हैं।

पटना में भी वार-पलटवार

यही हाल लालू प्रसाद यादव के परिवार का है। उनके दोनों बेटों में दुश्मनी कितनी बढ़ गई है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब तेजस्वी अपनी मां राबड़ी देवी के साथ बुधवार को पटना में अपने आवास में लालू की जेल से मुक्ति के लिए नवरात्र के पहले दिन कलश स्थापना कर रहे थे तो तेजप्रताप दूर हरियाणा के कुरुक्षेत्र में तीर्थयात्रा कर रहे थे। वहां से उन्होंने जो संदेश दिया उसके भी गहरे राजनीतिक अर्थ निकाले गए। कुरुक्षेत्र से उन्होंने ट्वीट किया, `कुरूक्षेत्र में हूँ, कोटी-कोटी प्रणाम यहाँ की पवित्र धरा को। पवित्र ब्रह्म सरोवर में स्नान कर महाभारत में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेशों वाली पवित्र स्थान का भ्रमण किया। 19-20 का चुनाव भी महाभारत से मिलता जुलता है, कुरुक्षेत्र अपना बिहार है और लड़ाई जारी भी है।` अब इसमें छुपाने को कुछ भी नहीं रह जाता कि तेजप्रताप किस कुरुक्षेत्र और किससे लड़ाई की बात कर रहे हैं।

सपा भी अब नहीं रहा परिवार

उत्तर प्रदेश में पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी परिवार में शुरू हुआ सत्ता संघर्ष खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। हालांकि सपा पूरी तरह से मुलायम सिंह यादव के बेटे और पूर्व सीएम अखिलेश यादव के कब्जे में है लेकिन उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव ने अलग पार्टी बनाकर उन्हें नुकसान पहुंचाने की पूरी तैयारी कर ली है। हाल में मुलायम सिंह ने शिवपाल के पक्ष में खड़े होने का बयान देकर इस सियासी जंग के जारी रहने का संकेत दे दिया। इस परिवार में मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता की बेटे प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव की राजनीतिक महात्वाकांक्षा भी किसी से छुपी नहीं है।

शिवपाल की शिकायत भी जायज

सपा को खड़ा करने में शिवपाल सिंह का योगदान किसी भी मामले में मुलायम सिंह यादव से कम नहीं है। यह बात मुलायम से बेहतर कौन जान सकता है। इसी बुनियाद पर शिवपाल खुद को मुलायम के बाद पार्टी का उत्तराधिकारी मानते थे। लेकिन पुत्रमोह के वश में मुलायम ने बेटे अखिलेश को सत्ता सौंप दी। संतुलन के लिए शिवपाल को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बना दिया। यह अखिलेश को कतई नागवार लगा क्योंकि वे एकछत्र राज चाहते थे। अब हालत यह है कि शिवपाल भले की खुद कोई सीट न जीत पाएं लेकिन कई सीटों पर सपा की खाट खड़ी कर सकते हैं।

क्या ऐसी पार्टियों का कोई भविष्य है

किसी भी पार्टी में अंतर्कलह और विखंडन उसके भविष्य के लिए नुकसानदेह होता है। इससे कोई भी पार्टी बची हुई नहीं है, लेकिन सिद्धांतों पर आधारित पार्टी इससे उबर जाती है क्योंकि उसके अंदर ऐसी व्यवस्था होती है, जबकि वंशवादी पार्टियां एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द बनती है और उसके नहीं रहने या कमजोर होने पर पार्टी भी टूटने लगती है। यहां जिन तीनों पार्टियों का जिक्र किया गया है, वे मंडल आंदोलन के बाद बने जनता दल से अलग-अलग हुए नेताओं की महत्वाकांक्षा के परिणास्वरूप अस्तित्व में आईं। एक खास जाति की राजनीति की, जिसकी अपनी सीमाएं हैं। ऐसी पार्टियों का कमजोर होना लोकतंत्र के लिए शुभ है क्योंकि इनका लोकतंत्र से दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।

Posted By: Brij Bihari Choubey