यह एक आर्काइव लेख है, जिसे Jun 06, 2018 को प्रकाशित किया गया था। इसमें दी गई जानकारी वर्तमान समय के लिहाज से पुरानी हो सकती है।
सत्ता के गलियारों में शीर्ष पर पहुंचने की जंग में हर तस्वीर कुछ कहती है
कभी-कभी तस्वीरें बड़ी साफगोई से सत्ता की लालसा और महंगाई की चक्की में पिस रही जनता के बीच बड़ी विचित्र व्यथा बयां करती हैं।

नई दिल्ली [जेएनएन]। तस्वीरें बोलती हैं। खासकर राजनीति में हर तस्वीर के मायने गहरे होते हैं। हर तस्वीर कुछ कहती है और हर तस्वीर को मंझे हुए राजनीतिज्ञ एक मौके के रूप में इस्तेमाल करते हैं। कहावत भी है, 'एक तस्वीर हजार शब्दों पर भारी पड़ती है।' तस्वीर भले ही अच्छा वक्त दिखाती हो या बुरा, राजनीतिक लोग उसका अपने लिए इस्तेमाल करना करना बखूबी जानते हैं। चुनाव नजदीक हों तो कई तस्वीरें सामने आती हैं और हर तस्वीर एक पूरी कहानी बयां करने लगती है। यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इन दिनों साइकिल पर सवार होकर लोगों से संपर्क साध रहे हैं। दूसरी तरफ अमित शाह सहित भाजपा नेता भी तमाम लोगों से 'समर्थन के लिए संपर्क' यात्रा पर हैं। इन दोनों और ऐसी ही कई अन्य तस्वीरों ने इन दिनों अखबारों में खूब जगह बटोरी हुई है। ऐसे में कहना तो पड़ेगा कि राजनीति में हर तस्वीर के मायने हैं और हर तस्वीर कुछ कहती है।
राजनीति में भी शब्दों से ज्यादा तस्वीरों का खेल होता है, तभी तो बड़ी-बड़ी तस्वीरों (विज्ञापनों) में सरकार अपना बखान करती है, तो विपक्ष भी ये कहते हुए सत्तासीन को चुनौती देते हैं कि बहुत हुआ.... अब ये तस्वीर (हालात) बदलनी चाहिए।
मौजूदा हालात में कोई कैमरा लेकर निकले तो देश की तस्वीर का जो कोलाज बनेगा वो बड़ा ही रोचक और विचित्र होगा। इस विचित्र कोलाज से पहले देश की स्थितियों पर एक नजर डालते हैं जिनकी तस्वीर से इस संयुक्त वृहद चित्र का निर्माण होगा। ये चित्र होगा भविष्य के महाभारत का यानि 2019 के लोकसभा चुनावों का। जिसमें कई चित्र शामिल होंगे।
वो घटनाएं, जिन्होंने सत्ता के संघर्ष की तस्वीर गढ़नी शुरू कर दी है:-
- कर्नाटक चुनाव और विपक्षी एकजुटता
- आम चुनावों का लिटमस टेस्ट (उपचुनाव)
- किसानों के लिए बड़ी-बड़ी घोषणा और किसान आंदोलन
- संपर्क, समर्थन और सत्ता की दौड़

कर्नाटक में खंडित जनादेश के बाद कुर्सी पाने के लिए जो सियासी नाटक खेला गया, उसे पूरे देश ने देखा। लोगों ने देखा कैसे कुर्सी के लिए नीति और नीयत ताक पर रखी जा सकती है। कैसे लोकतंत्र में सबसे कम सीटों वाली पार्टी का नेता सत्ता के शिखर तक पहुंच सकता है। कैसे सबसे बड़ी पार्टी होते हुए भी बहुमत ना मिलने पर एक पार्टी कुर्सी पर पहुंचकर भी लड़खड़ा सकती है।
लेकिन इन सबके अलावा भी एक और तस्वीर थी जो कर्नाटक में दिखी, वो थी भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए एकजुट हुए नेताओं की तस्वीर। इस तस्वीर में कई नेता तो ऐसे थे जो अब से पहले एक-दूसरे को फूटी आंख न सुहाते थे और 'उस दिन' गले मिल रहे थे। लेकिन लगा कि भाजपा खेमे ने इस तस्वीर को महत्व नहीं दिया।

फिर इस एकजुटता की तस्वीर को धरातल पर लाया गया और उत्तर प्रदेश के कैराना में हुए उपचुनावों में तस्वीर को हकीकत बनाने की कोशिश हुई। एकजुटता का असर दिखा भी और भाजपा की हार हुई। तस्वीर बदल गई। कल तक जहां गन्ना किसानों के दर्द की अनदेखी कर जिन्ना की तस्वीर पर झगड़ा हो रहा था, उपचुनाव के परिणामों ने वहां सत्ता की तस्वीर (चेहरा) ही बदल दी। साथ ही एकजुटता की तस्वीर में दोबारा से जान फूंकी।
'जिन्ना की हार और गन्ना की जीत' के बयान के बाद जरूर भाजपा को चिंता हुई और उन्हें 2019 के राह की तस्वीर में जीत का चेहरा धुंधला दिखने लगा होगा। धुंधलके के बीच 'गांव बंद' कर सड़कों पर लड़ते-भिड़ते किसानों की तस्वीरें देश की मीडिया में छाने लगी। सरकार ने भी किसानों के लिए 8500 करोड़ का राहत पैकेज मंजूर किया, ताकि बिगड़ती तस्वीर में कुछ अपने भी रंग भर दे।
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अब कुछ और तस्वीरें सामने दिख रही हैं, ये तस्वीरें न बिगड़े हालातों की हैं, ना विरोधियों की हार पर जीत की खुशी मनाते लोगों की। न सत्ता मिलने की खुशी की है, न कुर्सी छिन जाने के गम की। ये तस्वीरें हैं संपर्क के रास्ते समर्थन हासिल कर सत्ता तक पहुंचने की इच्छा की।
बात चाहे सबसे बड़े सूबे यूपी के मुखिया रहे अखिलेश यादव की करें या सबसे बड़ी पार्टी भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह की, या फिर सबसे पुरानी पार्टी को जीवनदान देने में जुटे पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की। इन सबकी तस्वीरों में सत्ता पाने की ललक साफ है और सत्ता का रास्ता जनता से ही होकर जाता है। जनता को भी इंतजार है कि कब उसके दुखभरे हालातों की तस्वीर में खुशियों के रंग बिखरेंगे।
