नीलू रंजन, नई दिल्ली। पाकिस्तान के भीतर बालाकोट में जैश ए मोहम्मद के ठिकाने पर हमले और अलगाववादी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई के साथ ही कश्मीर में आतंक के खिलाफ लड़ाई निर्णायक दौर में पहुंच गई है। सरकार ने एक ओर आतंकियों के सीमा पार से जुड़े नाभीनाल को काट दिया है, तो दूसरी ओर जमाते इस्लामी को प्रतिबंधित कर आतंक के वैचारिक धरातल पर चोट की गई है।

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पाकिस्तान की भाषा बोलने वाले अलगाववादियों की न सिर्फ सुरक्षा हटाई गई, बल्कि करोड़ों रुपये की संपत्ति को जांच के दायरे में लाकर उन्हें आम जनता के बीच बेनकाब भी कर दिया गया।

दरअसल, पिछले तीन दशक से घाटी में आतंकवाद और अलगाववाद को सीमा पार संचालित किया जाता रहा है। हिजबुल मुजाहिदीन का सरगना सैयद सलाउद्दीन चौधरी, लश्करे तैयबा का हाफिज सईद और जैश ए मोहम्मद का मसूद अजहर पाकिस्तान से ही आतंकी गतिविधियां संचालित करता रहा है।

भारतीय संसद और मुंबई में हमले के बाद भी उनका बाल-बांका तक नहीं हुआ। ऐसे में कश्मीर घाटी में आतंकियों व अलगाववादियों को मनोबल को तोड़ना संभव नहीं था। पहली बार बालाकोट में 27 सरगनाओं समेत 300 से अधिक आतंकियों की मौत ने न सिर्फ घाटी में आतंकी समर्थकों का मनोबल हिला है, बल्कि पाकिस्तान को भी आतंकी समर्थन की कीमत समझ में आ गई है।

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जम्मू-कश्मीर पर नीति-निर्धारण से जुड़े गृहमंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि बालाकोट हमले के पहले ही घाटी में आतंकी तंत्र को ध्वस्त की प्रक्रिया शुरू हो गई थी। उनके अनुसार अलगाववादी संगठन, आतंकी संगठन और कट्टरपंथी धार्मिक संगठन सभी आतंक के तंत्र में एक-दूसरे के पूरक थे। यहां तक कि राजनीतिक दल भी इससे अछूते नहीं थे।

राज्य के संसाधनों पर भी एक तरह से इसी तंत्र का कब्जा था। जाहिर है इसे ध्वस्त करना भी आसान नहीं था। एक रणनीति के तहत सबसे पहले नगर निकाय और पंचायत का चुनाव कराया गया। कश्मीर में 2004 से नगर निकायों के चुनाव नहीं हुए थे और पंचायत चुनाव 2011 के बाद नहीं हुए थे। चुनाव होने के बाद 14वें वित्त आयोग की अनुशंसा के अनुसार लगभग 4300 करोड़ रुपये सीधे इन निकायों को स्थानीय विकास कार्यो के लिए चले जाएंगे।

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2017 से आतंकी फंडिंग पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। एनआइए और ईडी द्वारा आतंकी फंडिंग के आरोप में कई अलगाववादी नेताओं को गिरफ्तार किया गया। पुलवामा हमले के बाद इन नेताओं को मिलने वाली सुरक्षा को हटाकर सरकार ने साफ कर दिया कि कश्मीर समस्या के स्थायी समाधान में उनकी कोई अहमियत नहीं है।

इसके साथ ही 80 के दशक से आतंकियों के लिए वैचारिक धरातल मुहैया कराने वाले जमाते इस्लामी को प्रतिबंधित संगठनों की सूची में शामिल कर सरकार ने कश्मीर में कट्टरपंथी विचारधारा को फैलने से रोकने का पुख्ता इंतजाम किया है।

सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि इन तमाम उपायों का असर कश्मीर में जमीनी स्तर पर भी दिखने लगा है और लोग धीरे-धीरे आतंकवाद के खिलाफ बोलने लगे हैं। कुछ दिनों पहले आतंकियों के पोस्टर फाड़ने वाला वीडियो भी वायरल हो गया था। यही नहीं, आतंकियों के जनाजे में उमड़ने वाली भीड़ भी कम हो रही है। दो साल पहले तक सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन गई पत्थरबाजी की घटनाएं काफी कम हो गई हैं।

 

Posted By: Arun Kumar Singh

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