माला दीक्षित, नई दिल्ली। जिस अयोध्या राम जन्मभूमि मुकदमें की सुनवाई पर पूरे देश की निगाहें लगीं थीं उसकी सुनवाई एक बार फिर 29 जनवरी तक के लिए टल गई है। गुरुवार को मुस्लिम पक्ष की ओर से सुनवाई पीठ में शामिल जस्टिस ललित के पहले अयोध्या से जुड़े एक मामले में वकील के तौर पर पेश हो चुकने का मुद्दा उठाए जाने के बाद जस्टिस ललित ने स्वयं को सुनवाई से अलग कर लिया। अब मामले की सुनवाई के लिए नयी पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन होगा जिसमें जस्टिस ललित नहीं होंगे।

नयी पीठ 29 जनवरी को सुनवाई करेगी जिसमें सुनवाई की रूपरेखा तय होगी।लंबे समय से पीठ और तारीख का इंतजार कर रहा राम जन्मभूमि मामला गुरुवार को नव गठित पांच सदस्यीय संविधान पीठ के सामने लगा था। 10.34 पर मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, एसए बोबडे, एनवी रमना, यूयू ललित और डीवाई चंद्रचूड़ कोर्ट में आए और जैसे ही सुनवाई शुरू हुई। मुस्लिम पक्षकार एम सिद्दीक के वकील राजीव धवन ने जस्टिस ललित के पीठ में शामिल होने का मुद्दा उठाया। धवन ने कहा कि 1997 में अयोध्या मुद्दे से जुड़े अवमानना मामले में जस्टिस ललित वकील के तौर पर कल्याण सिंह की ओर से पेश हुए थे।

धवन ने कहा हालांकि उन्हें जस्टिस ललित के सुनवाई जारी रखने पर कोई आपत्ति नहीं है लेकिन यह जस्टिस ललित पर निर्भर करता है कि वे पीठ में रहेंगे कि नहीं। तभी जस्टिस ललित ने कहा 'आप असलम भूरे मामले का जिक्र कर रहे हैं। हां मै उस केस में एक पक्षकार की ओर से पेश हुआ था'। मालूम हो कि जब कल्याण सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर ढांचे की सुरक्षा का भरोसा दिलाया था। ढांचा ढहने के बाद असलम भूरे ने कल्याण सिंह व अन्य के खिलाफ अवमानना याचिका दाखिल की थी। इसी मामले में यूयू ललित वकील की हैसियत से पेश हुए थे।

धवन के मुद्दा उठाने के बाद पीठ के न्यायाधीशों के बीच करीब एक मिनट विचार विमर्श हुआ। तभी धवन ने कहा कि वे मामले का जिक्र करने के लिए माफी चाहते हैं। लेकिन जस्टिस गोगोई ने कहा कि इसमें माफी की क्या बात है आपने जो तथ्य थे वो सामने रखे। तभी रामलला के वकील हरीश साल्वे ने कहा कि जिस मामले का जिक्र किया जा रहा है वह मुख्य मामला नहीं था एक रिट से जुड़ा केस था जिसमें मुख्यमंत्री दिए गए शपथपत्र का पालन करने में नाकाम रहे थे। साल्वे ने कहा कि उन्हें जस्टिस ललित के मामला सुनने में कोई समस्या नहीं लगती। साल्वे की बात पर जस्टिस गोगोई ने कहा कि यहां समस्या की बात नहीं है, लेकिन मेरे साथी न्यायाधीश ललित अब इस मामले की सुनवाई करने के इच्छुक नहीं है ऐसे में उनके पास सुनवाई स्थगित करने के अलावा विकल्प नहीं है। कोर्ट ने सुनवाई 29 जनवरी तक के लिए टाल दी।

संविधानपीठ के गठन को सही ठहरायाधवन ने जब मामले को बिना किसी रिफरेंस के प्रशासनिक आदेश के जरिए सीधे संविधान पीठ में लगाने का मुद्दा उठाया और इस पर न्यायिक आदेश देने की बात कही तो मुख्य न्यायाधीश ने सुप्रीम कोर्ट रूल का हवाला देते हुए कहा कि पीठ गठन किसी आदेश का उल्लंघन नहीं करती। नियम में चीफ जस्टिस को कितनी भी संख्या की पीठ गठित करने का अधिकार है।

नियम सिर्फ पीठ में दो न्यूनतम संख्या की बात करता है अधिकतम की नहीं। मुख्य न्यायाधीश को अगर केस देखकर उचित लगता है तो वे कोई भी पीठ गठित कर सकते हैं। रजिस्ट्री जांचेगी दस्तावेजों के अनुवादकोर्ट ने रजिस्ट्री को आदेश दिया है कि वह सील बंद कमरे मे रखे मुकदमें की दस्तावेजों के अनुवादों की जांच करके कोर्ट में 29 जनवरी को रिपोर्ट देकर बताए कि मामला सुनवाई के लिए तैयार है कि नहीं। 

सुप्रीम कोर्ट के सील बंद कमरे में रखे हैं दस्तावेज

अयोध्या राम जन्मभूमि मुकदमें के दस्तावेज सुप्रीम कोर्ट के सील बंद कमरे में ताला लगे 15 बक्सों में रखे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रजिस्ट्री को उन दस्तावेजों की जांच करके यह आंकलन करने को कहा है कि मामला सुनवाई के लिए तैयार है कि नहीं। इस मुकदमें में ट्रायल के दौरान सुनवाई में कुल 120 बिंदु तय हुए थे और 88 गवाहों का परीक्षण हुआ था। मामले में कुल 13866 पेज की गवाहियां हैं जिसमें 257 दस्तावेज पेश किये गये थे। अयोध्या में हाईकोर्ट का फैसला कुल 8533 पेज का था जो कि किताब में छपने के बाद 4304 पेज का हुआ।

मामले में अरबी फारसी संस्कृत गुरुमुखी उर्दू और हिन्दी भाषा के दस्तावेज पेश किये गए थे जिनका अनुवाद कराया गया है। इसी अनुवाद का रजिस्ट्री निरीक्षण करेगी। निरीक्षण के दौरान रजिस्ट्री जितनी जरूरत हो उतने अधिकारियों की मदद ले सकती है। कोर्ट ने इस संबंध में पक्षकारों के वकीलों की मदद देने की अपील ठुकरा दी। कोर्ट ने कहा कि 15 दिन का समय है रजिस्ट्री दिन रात लगकर काम पूरा कर लेगी।
 

 

Posted By: Manish Negi

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