नई दिल्ली, जेएनएन। गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा एक बार फिर पाटीदार समुदाय को लुभाने के लिए हार्दिक पर बड़ा दांव खेल रही है। माना जाता है कि गुजरात में पाटीदार की आबादी 1.5 करोड़ के करीब है और लगभग 70 विधानसभा सीटों पर ये प्रभाव डालते हैं। बता दें कि हार्दिक पटेल गुरुवार को भाजपा में शामिल हो गए। 2019 में कांग्रेस में शामिल होने वाले हार्दिक ने इस साल 18 मई को कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। पाटीदार आंदोलन की वजह से भाजपा को 2017 के विधानसभा चुनाव में काफी नुकसान उठाना पड़ा था।

ऐसे में आइए जानते हैं कि हार्दिक पटेल के आने से भाजपा को कितना फायदा होगा? क्या 2017 के चुनाव में हार्दिक के चलते ही भाजपा को नुकसान हुआ था? गुजरात चुनाव में पाटीदार इतने अहम क्यों हैं? पाटीदार आंदोलन पहचान बनाने वाले हार्दिक पटेल भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो चुके हैं। गुजरात में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इस चहलकदमी के राजनीतिक मायने टटोलती रिपोर्ट:

भाजपा को लाभ की आस

- हार्दिक पटेल के आने से सबसे बड़ा लाभ भाजपा को सौराष्ट्र में मिलेगा जहां पार्टी को मजबूती मिलेगी। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सौराष्ट्र की 27 सीट में से मात्र नौ सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी।

- दक्षिण गुजरात में सूरत शहर की सभी छह सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की थी। सूरत में हीरा उद्योग में कार्य करने वाले अधिकांश कामगार सौराष्ट्र के हैं और चुनाव में एक बड़ा वोट बैंक हैं। हार्दिक पटेल के आने से उनका भाजपा के साथ फिर से जुड़ाव होगा।

- हार्दिक पटेल उत्तर गुजरात व अहमदाबाद ग्रामीण में भी खासे लोकप्रिय हैं। इन स्थानों की कई सीटें ऐसी हैं जहां कांग्रेस मजबूत स्थिति में दिखती है। इनमें सबसे प्रमुख हार्दिक पटेल के पैतृक गांव वीरमगाम समेत मानसा, कलोल, धानेरा, सिद्धपुर, बेचराजी के अलावा अहमदाबाद से राजकोट तक की कुछ सीटें हैं जहां भाजपा को इस युवा नेता के आने से फायदा हो सकता है।

- वर्ष 2015 में हार्दिक पटेल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल सरकार के खिलाफ पाटीदार आरक्षण आंदोलन छेड़कर हार्दिक पटेल गुजरात ही नहीं राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी चर्चित हो गए थे। उन्हें करीब नौ माह तक जेल में रहना पड़ा था।

- माना जा रहा है कि हार्दिक के आने के बाद आगामी विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भाजपा अपने परंपरागत पाटीदार वोट बैंक को साधने में कामयाब रहेगी।

-इसका एक और कारण यह भी है कि पाटीदार आरक्षण आंदोलन के दौरान दर्ज हुए केस राज्य सरकार एक के बाद एक करके वापस ले रही है जिससे पाटीदार समुदाय को राहत मिलेगी।

- मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल खुद पाटीदार समुदाय से आते हैं, ऐसे में अब भाजपा के पाटीदार वोट बैंक में कांग्रेसका सेंध लगाना असंभव सा हो गया है।

- हार्दिक के साथ युवा मतदाता भी जुड़ा हुआ है जो आरक्षण आंदोलन के चलते भाजपा से नाराज था लेकिन अब वह भी भाजपा के साथ दिख सकता है।

कांग्रेस को क्या नुकसान

-कांग्रेस को हार्दिक पटेल के जाने से एक बड़ा झटका लगा है। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस के साथ आया पाटीदार समुदाय का एक धड़ा हार्दिक के चले जाने से कांग्रेस से अलग हो सकता है।

- कांग्रेस का भी मानना है कि पाटीदार समुदाय कभी भी एक तरफा कांग्रेस के समर्थन में नहीं रहा है इसलिए उनकी रणनीति भी दलित एनं ओबीसी तथा आदिवासी वोट बैंक को लेकर रही है।

- वैसे पाटीदार कार्ड के लिए कांग्रेस खोडल धाम के ट्रस्टी नरेश पटेल पर दांव खेलना चाहती थी लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते अब नहीं लगता कि नरेश पटेल भी कांग्रेस के साथ काम करेंगे।

नापसंदगी के भी स्वर

- गुजरात भाजपा में एक धड़ा ऐसा है जो हार्दिक पटेल को पसंद नहीं करता है। हार्दिक की महत्वाकांक्षा के चलते पार्टी के कुछ वरिष्ठ पाटीदार नेता खुद को असुरक्षित भी महसूस करते हैं। पूर्व उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने तो दलबदल को सही नहीं ठहराया है। हार्दिक के कांग्रेस छोड़ने के बाद उन्होंने कहा था कि हार्दिक का अध्याय पूरा हो गया है। उसने कांग्रेस का बेजा इस्तेमाल किया है।

-इसके अलावा शिक्षा मंत्री जीतूभाई वाघाणी, विधायक गोविंद भाई पटेल, युवा नेता रुत्विज पटेल, महेश कसवाला आदि भाजपा कई नेता हैं जिनका प्रभाव कम हो सकता है।

अब तक की राजनीतिक यात्रा

-वर्ष 2015 में हार्दिक पटेल ने तत्कालीन मुख्यमंत्री आनंदीबेन सरकार के खिलाफ पाटीदार आरक्षण आंदोलन छेड़कर गुजरात ही नहीं राष्ट्रीय परिदृश्य पर भी चर्चीत हो गए थे, उन्हें करीब 9 माह तक जेल में रहना पड़ा था।

- पाटीदार आंदोलन के चलते ही आनंदीबेन को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था तथा उनकी जगह 2016 में विजय रुपाणी को मुख्यमंत्री बनाया गया था।

- वर्ष 2017 में हार्दिक पटेल ने बाहर रहकर कांग्रेस का समर्थन किया था। वर्ष 2019 में वह कांग्रेस में शामिल हुए और उन्हें प्रदेश कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।

Edited By: Sanjeev Tiwari

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