सुरेंद्र प्रसाद सिंह, नई दिल्ली। सरकार की महत्वाकांक्षी योजना 'पीएम-किसान' में बटाई पर खेती करने वाले किसानों को योजना का लाभ नहीं मिल पायेगा। सरकार के समक्ष किसानों की परिभाषा बदलने की चुनौती है, जिसके लिए राज्य सरकारों का सक्रिय सहयोग जरूरी होगा। भूमि पट्टेदारी के माडल कानून को इक्का दुक्का राज्यों में ही आधे-अधूरे मन से लागू किया गया है। इसके चलते केंद्र सरकार के चाहने के बावजूद बटाईदार और भूमिहीन किसानों को इस बड़ी नगदी योजना का लाभ नहीं मिल पायेगा।

शनिवार को खुले केंद्र सरकार के कई आफिस, तैयार हो रहे आंकड़े

पीएम-किसान योजना को जल्द से जल्द लागू करने के लिए सरकार ने युद्ध स्तर पर तैयारियां शुरु हो चुकी हैं। केंद्र सरकार के कई कार्यालय शनिवार को साप्ताहिक अवकाश के दिन भी खोले गये थे। योजना को लागू करने के लिए गाइड लाइन तैयार की गई और उसे हर हाल में सोमवार तक सभी राज्यों को डिस्पैच कर दिया जाएगा। सूत्रों के मुताबिक सोमवार को ही संयुक्त सचिव और अपर सचिव स्तर के अफसरों को राज्यों के दौरे पर रवाना कर दिया जाएगा।

डाटा बेस वाले राज्यों में 15 फरवरी को पहुंच जाएगी पहली किस्त

राज्यों में लघु व सीमांत किसानों का सेंट्रलाइज डाटा बेस बनाने की रफ्तार को तेज करने के साथ भूमि दस्तावेजों के डिजिटलीकरण करने पर जोर दिया जाएगा। मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक इसी महीने के दूसरे सप्ताह तक कई राज्यों के किसानों के बैंक के जनधन खाते में वित्तीय मदद की पहली किस्त यानी 2000 रुपये जमा करा दिये जाएंगे। योजना दिसंबर 2018 से लागू कर दी गई है।

योजना के तहत देश के 12 करोड़ लघु व सीमांत किसानों को सालाना 6000 रुपये दिया जाएगा। तीन किस्तों में दी जाने वाली यह धनराशि सीधे किसान के खाते में जमा कराई जानी है। राज्यों में जाकर केंद्र के अफसर आंकड़े जुटाएंगे। राज्य के मुख्य सचिवों व संबंधित आला अफसरों से विचार-विमर्श कर योजना के क्रियान्वयन को रफ्तार देंगे। फिलहाल योजना का लाभ उन्हीं किसानों को मिलेगा, जो भूमि के वास्तविक मालिक हैं। ये आंकड़े राज्यों से प्राप्त किये जाएंगे।

सभी किसानों को भेजी जाने वाली वित्तीय मदद के लिए उन्हें आधार नंबर से जोड़ा जाएगा। राशन प्रणाली के तहत सभी उपभोक्ताओं के राशन कार्ड आधार नंबर से जोड़ दिये गये हैं। कृषि मंत्रालय के अपर सचिव अशोक दलवई ने बताया कि आधुनिक व नई प्रौद्योगिकी उपलब्ध है, जिसके आधार पर बैंक खाता, आधार नंबर और मोबाइल नंबर से सही लाभार्थियों को चिन्हित किया जा सकता है, लेकिन पहले चरण में यह संभव नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश के 65 फीसद सीमांत वर्ग के किसान हैं, जिनके पास औसतन मात्र 0.6 हेक्टेयर जमीन है। छोटी जोत वाले किसानों की सर्वाधिक संख्या उत्तर प्रदेश में ही है। सीमांत वर्ग में अधिकतम ढाई एकड़ जमीन वाले किसान आते हैं। प्रदेश में लघु किसानों की संख्या भी बहुत है।

राज्य में भूमि सुधार और उसके दस्तावेजों का पूर्ण कंप्युटीकरण कर दिया गया है। प्रदेश सरकार ने बीते खरीफ सीजन में ही उन्नतशील बीज खरीदने के लिए उसकी सब्सिडी का भुगतान डायरेक्ट ट्रांसफर बेनीफिट (डीबीटी) स्कीम के तहत किया है। इससे स्पष्ट है कि राज्य सरकार के पास ऐसे किसानों का पूरा आंकड़ा उपलब्ध है, जिससे पीएम-किसान में मिलने वाली वित्तीय मदद का लाभ राज्य के लघु व सीमांत किसानों को तत्काल देने में सहूलियत होगी।

Posted By: Bhupendra Singh