प्रशांत मिश्र, नई दिल्ली। वर्ष 1984 की बात है। ओडिशा में इंजीनियरिंग के एक विद्यार्थी की हत्या के विरोध में छात्र आंदोलन खड़ा हो गया था। तालचर के एक गांव में पंद्रह सोलह साल का एक बच्चा भी इस हत्या के विरोध में बैनर लेकर आंदोलन में न सिर्फ कूद पड़ा बल्कि अपने गांव में अन्य छात्रों को भी इसके लिए प्रेरित कर रहा था। बौखलाए हुए प्रशासन ने आंदोलन को दबाने के लिए इस बच्चे को जेल में डाल दिया। तीन-चार दिन बाद ही 15 अगस्त यानी स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा था। लेकिन इस बच्चे का वह दिन भी सलाखों के पीछे बीता। आठ दिनों के बाद उसकी रिहाई हुई। वह बच्चा..यानी आज का धर्मेंद्र प्रधान। मोदी सरकार में लगातार दूसरी बार केंद्रीय मंत्री बने धर्मेंद्र प्रधान का राजनीतिक सफर शायद उसी दिन से शुरू हो गया था और उन्हें वकील बनाने की इच्छा रखने वाले डॉक्टर और बाद में राजनेता बने पिता देबेंद्र प्रधान को भी उसी दिन अहसास हो गया था कि बेटे की राह कुछ और है।


दरअसल प्रधान की जिंदगी कुछ ऐसे नेताओं में गिनी जा सकती है जिसे खून में और घुट्टी में राजनीतिक संस्कार मिला। पहले दादा और फिर पिता का संस्कार हावी हो गया। दादा जी के वक्त तालचर ब्रिटिश सरकार के अधीन एक छोटी सी रियासत थी और प्रधान के दादाजी ने आंदोलन का झंडा उठाया था। विद्रोह की आंधी कुछ इतनी बड़ी थी कि चर्चा ब्रिटेन तक पहुंच गई थी। प्रधान के अंदर भी उसी खून का संचार हो रहा था। देश में पहली राजशाही स्टेट का विलय जो सरदार पटेल ने कराया था वह यही थी। छोटी उम्र में ही प्रधान ने कई बार यह कहानी सुनी थी और आंदोलन का महत्व समझा था।


वह महज दस ग्यारह साल के होंगे जबसे घर में कुशाभाऊ ठाकरे जैसे वरिष्ठ भाजपा नेता व संघ के दूसरे नेताओं का आना जाना रहा। चर्चा देश और प्रदेश की विभिन्न समस्याओं से लेकर जवाहर लाल नेहरू के शुरूआती दर्शन तक पर होती थी। विभिन्न मुद्दों पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार की नीतियों की व्याख्या होती थी। तब प्रधान बड़े चाव से इसे सुना करते थे। भाजपा की विचारधारा की घुट्टी तभी मिल गई थी। 1983 में मैट्रिक पास कर कॉलेज पहुंचे तो कुछ दिनों बाद ही एबीवीपी का सदस्यता अभियान शुरू होना था। तत्काल उस अभियान में शामिल हो गए। दो साल बाद ग्रेजुएशन में पहुंचे तब तक राजनीतिक नेतृत्व की इच्छा हिलोरें मारने लगी थीं। पहले ही साल एबीवीपी छात्र संघ चुनाव में अध्यक्ष पद के लिए खड़े हो गए। कुछ लोगों के लिए प्रधान का यह फैसला चौंकाने वाला था क्योंकि साधारणतया अंतिम वर्ष में जाकर ही कोई अध्यक्ष पद की सोचता था। खैर, चुनाव हुआ और प्रधान एक वोट से बाजी मार गए। दोबारा मतगणना हुई लेकिन नतीजा नहीं बदला। प्रधान का जुझारूपन और कुछ नया करने की क्षमता ने रंग दिखाना शुरू कर दिया था। वह सुबह निकलते, लोगों से मिलते, जेल में जाकर रक्षाबंधन का पर्व मनाते, समाज के लिए ब्लड डोनेशन कैंप आयोजित करते। समाज में एक छवि बनने लगी थी कि छात्र नेता केवल आंदोलन ही नहीं कुछ सकारात्मक भी कर सकता है।


अब तक यह तय हो चुका था कि प्रधान न तो अपने पिता की इच्छा के अनुसार वकील बनेंगे और न ही किसी रोजगार की तलाश में जाएंगे। आगे का रास्ता साफ था- जिस तरह पिता जी सक्रिय राजनीति में आए और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री बने उसी पथ पर प्रधान को भी आगे बढ़ना था। भाजपा की विचारधारा शुरुआती जीवन में ही पैठ कर गई थी, मशक्कत में कोई कमी नहीं थी लिहाजा सीढ़ियां भी मिलती गईं। करीब पंद्रह साल तक एबीवीपी के साथ जुड़े रहने के बाद 1998 में भाजपा में आए और वर्ष 2000 में विधायक बने। केंद्रीय नेतृत्व ने विधायक के रूप में उनकी परख की और 2004 में लोकसभा के लिए टिकट दे दिया। वह जीत भी गए। संगठन में उनकी विशेषता, नेतृत्व की ओर से दिए गए काम के प्रति समर्पण और जनसंपर्क में विशेष रुचि जैसे कुछ ऐसे गुण थे जिससे प्रधान आगे ही बढ़ते गए। दरअसल जनसंपर्क का महत्व उन्होंने तभी सीख लिया था जब वह कॉलेज में थे। पास के गांव अंगुल में आदित्य प्रसाद सिंह एक वरिष्ठ नेता थे। हालांकि वह विरोधी पार्टी से थे लेकिन प्रधान का लगाव था। उस बार आदित्य प्रसाद चुनाव मैदान में मात खा गए थे, लेकिन जनसंपर्क बनाना और लोगों के बीच उनका आना-जाना बरकरार था। प्रधान चकित थे आखिर अब वह क्यों दौरा कर रहे हैं। तभी उन्होंने समझाया था कि जनसंपर्क केवल हार-जीत का जरिया नहीं है बल्कि हिम्मत और साहस बांटने और बटोरने का माध्यम भी है। प्रधान ने तभी से इसे मूल मंत्र बना लिया। आज वही जनसंपर्क उनकी सबसे बड़ी शक्ति है।


दरअसल आज की भाजपा में प्रधान ऐसे कुछ गिने-चुने नेताओं में शुमार हैं जिसे सरकार और संगठन दोनों में अहम भूमिका मिलती है। बिहार, बंगाल, कर्नाटक, त्रिपुरा, असम, झारखंड जैसे राज्यों में नेतृत्व ने संगठन का काम दिया और अधिकतर उसे पूरा कर लौटे। केंद्र में मंत्री रहते हुए उन्हें अलग-अलग राज्यों में विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी मिली जिसे बखूबी निभाया। कहा जा सकता है कि धर्मेंद्र प्रधान एक ऐसे सैनिक हैं जो अपनी कर्तव्यपरायणता के कारण भरोसे की कसौटी पर हमेशा खरा उतरने में विश्वास रखते हैं।

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Posted By: Shashank Pandey

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