संजय मिश्र, नई दिल्ली। एनसीपी की अंदरूनी 'बगावत' से हरियाणा और महाराष्ट्र चुनाव नतीजों के बाद विपक्षी एकजुटता की नये सिरे से कोशिश कर रही कांग्रेस के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं है। सियासत के इस जबरदस्त ड्रामे में कांग्रेस की एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार पर अति निर्भरता ने फिलहाल उसे राजनीतिक दिशा भ्रम के मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है। इस घटनाक्रम से एक बार फिर जाहिर हो गया है कि विपक्षी विकल्प के रुप में मैदान में डटे रहना है तो कांग्रेस को दूसरों पर निर्भरता छोड़ अपने सियासी भविष्य की राह उसे खुद तैयार करनी होगी।

महाराष्ट्र की सियासत के ताजा खेल में कांग्रेस के लिए बड़ा झटका

महाराष्ट्र की सियासत के इस ताजा खेल में हाथ डालने से पहले ही कांग्रेस के लिए इसे बड़ा झटका इसीलिए माना जा रहा कि गहन मंथन के बाद राष्ट्रीय राजनीति की जरूरतों के ख्याल से शिवसेना के साथ दोस्ती की पार्टी ने हामी भरी। शिवसेना ही नहीं कांग्रेस को भी इसके लिए अपनी विचारधारा में जरूरी लचीलापन लाने का समझौता करना पड़ा है। लेकिन पार्टी इस वैचारिक समझौते के लिए इस लिहाज से राजी हो गई कि राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा के मुखर हिन्दुत्व की सियासत से निपटने लिए इसे जरूरत के रुप में भी देख रही है।

अजीत पवार को लेकर कांग्रेस के मन में संशय था

महाराष्ट्र की सत्ता के हिसाब से सूबे के कांग्रेस नेता तो राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की सियासत को थामने के लिए पार्टी का हाईकमान शिवसेना को लेकर शुरू से सकारात्मक थे। प्रदेश के नेता हाईकमान पर जल्द फैसले का दबाव भी बना रहे थे क्योंकि अजीत पवार को लेकर कहीं न कहीं उनके मन में संशय था। मगर कांग्रेस हाईकमान अपने नेताओं से ज्यादा शरद पवार की रणनीति पर भरोसा कर रहा था।

अजीत पवार का संदेहास्पद रुख

अजीत पवार का संदेहास्पद रुख शुरू से नजर आ रहा था। राज्यपाल ने जब शिवसेना को सरकार बनाने का दावा पेश करने के लिए मोहलत नहीं बढ़ाई और अजीत पवार को 12 नवंबर रात साढे आठ बजे तक चौबीस घंटे में अपना दावा बताने का समय दिया। मगर अजीत ने आश्चर्यजनक रुप से कांग्रेस और शिवसेना को लूप में लिए बिना तय समयसीमा से काफी पहले सुबह साढे ग्यारह बजे ही राज्यपाल को और समय देने की अपनी तरफ से चिठ्ठी भेज दी। अजीत ने यह चिठ्ठी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ब्राजील दौरे से रवाना होने के कुछ समय पहले भेज दी। इसके बाद राज्यपाल ने तत्काल महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने का प्रस्ताव भेज दिया और पीएम मोदी ने विदेश रवाना होने से पहले कैबिनेट बुलाकर इस पर मुहर लगा दी।

अजीत पवार ने राज्यपाल को पत्र लिखने को लेकर कांग्रेस से चर्चा तक नहीं की

सोनिया गांधी जहां एक तरफ शरद पवार के साथ लगातार सीधा संवाद कर एनसीपी नेता के अगले कदम की प्रतीक्षा कर रहीं थीं। वहीं अजीत पवार ने राज्यपाल को पत्र लिखने को लेकर शिवसेना तो दूर अपने घटक दल कांग्रेस के नेताओं से कोई चर्चा तक नहीं की।

अशोक चव्हाण ने हाईकमान को किया था सतर्क

अशोक चव्हाण जैसे महाराष्ट्र कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने खुले तौर पर न केवल अचरज का इजहार किया बल्कि अपने हाईकमान को सतर्क भी किया। मगर शरद पवार की रणनीति पर कांग्रेस नेतृत्व इस कदर निर्भर थी कि उसने स्वतंत्र रुप से कोई कदम उठाने की जहमत तक नहीं उठाई।

अजीत पवार का था डांवाडोल रुख

दिलचस्प यह भी है कि अजीत पवार ने समय से करीब नौ घंटे पहले राज्यपाल से और वक्त मांगने का पत्र लिखने से एक दिन पहले भी अपने डांवाडोल रुख का संकेत दे दिया था। दरअसल शिवसेना जब कांग्रेस-एनसीपी की चिठ्ठी का आखिरी दिन इंतजार कर रही थी तब अजीत ने मीडिया को बयान दिया कि कांग्रेस की ओर से चिठ्ठी देने में देरी की जा रही है। जबकि कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक और सूबे के नेताओं के साथ वार्ता के बाद सोनिया गांधी की ओर से चिठ्ठी देने पर हामी भर दी गई मगर शरद पवार की ओर से इंतजार करने को कहा गया।

राज्यपाल को चिठ्ठी में देरी की वजह कांग्रेस नहीं है

इसके बाद कांग्रेस की ओर से महासचिव केसी वेणुगोपाल ने बयान जारी कर सोनिया-पवार के बीच और मंत्रणा होने की बात कह साफ किया चिठ्ठी में देरी की वजह कांग्रेस नहीं है। शरद पवार की ओर से भी यही बात दोहरायी गई।

कांग्रेस नेतृत्व अजीत की सियासत को पढ़ने में रही नाकाम

कांग्रेस नेतृत्व और रणनीतिकार अजीत की सियासत को पढ़ने में यहां भी नाकाम रहे। महाराष्ट्र में कांग्रेस की इस पिछलग्गू सियासत से साफ है कि खतरे के संकेत मिलने के बाद एहतियाती कदम नहीं उठाना पार्टी की कमजोर रणनीति को दर्शाता है।

Posted By: Bhupendra Singh

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