जागरण ब्यूरो, नई दिल्ली। जलियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक संशोधन विधेयक आखिरकार बुधवार को राज्यसभा में फंस गया। हुआ यह कि सरकार इस विधेयक को सदन में बगैर चर्चा के ही पारित कराना चाहती थी पर कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई। वह विधेयक के जरिये स्मारक के ट्रस्ट से कांग्रेस अध्यक्ष को हटाने का विरोध कर रही थी। टकराव की स्थिति बनते देख विधेयक को अगले सत्र तक के लिए टाल दिया गया। लोकसभा से यह विधेयक पहले ही पारित हो चुका है।

सरकार इस विधेयक के जरिये जलियांवाला बाग ट्रस्ट में बदलाव करना चाहती है जिसमें कांग्रेस अध्यक्ष को हटाना भी शामिल है। इसके साथ ही वह ट्रस्ट में शामिल विपक्ष के नेता की जगह विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी के नेता को इनमें शामिल करना चाहती है। राज्यसभा में विधेयक पेश करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि यह विधेयक सरकार को किसी भी मनोनीत न्यासी का कार्यकाल बिना कारण बताए पांच साल की तय अवधि से पहले खत्म करने का अधिकार भी देता है।

कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद और आनंद शर्मा ने इस पर आपत्ति की और कहा कि सरकार कांग्रेस अध्यक्ष को क्यों हटाना चाहती है। देश की आजादी के आंदोलन की अगुआई कांग्रेस ने ही की थी। इसे स्वीकार करने में किसी को भी संकोच नहीं होना चाहिए। न ही ऐसा संशोधन होना चाहिए। सरकार को बड़प्पन दिखाना चाहिए।

सरकार की ओर से कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस को जवाब दिया और कहा कि आजादी के आंदोलन में कांग्रेस की भूमिका को कोई कम नहीं कर रहा है। देश ने इसे देखा है। इस बदलाव को किसी दल से जोड़कर देखने के बजाय ट्रस्ट की संरचना से जोड़कर देखा जाना चाहिए। जलियांवाला बाग की शताब्दी वर्ष के महत्व को देखते हुए इसे पारित करना चाहिए। वैसे भी किसी भी सरकारी ट्रस्ट में कोई पद राजनीतिक पार्टी से जुड़ा नहीं होना चाहिए।

सपा और बसपा ने भी इसका समर्थन किया और कहा कि ट्रस्ट का कोई भी पद पदेन होना चाहिए क्योंकि कोई व्यक्ति लंबे समय तक एक पद पर नहीं रहता है। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के निधन और बजट सत्र के अंतिम दिन सरकार कोई टकराव नहीं चाहती थी, लिहाजा विधेयक को अगले सत्र के लिए टाल दिया गया।

राज्यसभा में बजट सत्र के अंतिम दिन दो और विधेयक पेश हुए। इनमें से राज्यसभा से पहले पारित हो चुके जम्मू-कश्मीर आरक्षण विधेयक को अनुच्छेद 370 खत्म होने के चलते वापस ले लिया गया, जबकि सुप्रीम कोर्ट में तीन जजों की और नियुक्ति से जुड़े विधेयक को पारित मानते हुए लोकसभा को वापस भेज दिया गया। वैसे भी यह वित्त विधेयक था और उसे राज्यसभा से पारित कराना जरूरी नहीं था।

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Posted By: Bhupendra Singh

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