शिलांग, जेएनएन। पांचवी बार विधानसभा में प्रवेश करने के लिए मेघालय के मुख्यमंत्री मुकुल संगमा दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे। 27 फरवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए उन्होंने अपनी पारंपरिक अमपाटी के अलावा दूसरी सीट से भी नामांकन दाखिल किया है। संगमा ने पूर्वी गारो पर्वतीय जिले में सोंगसाक से निर्वाचन क्षेत्र से भी पर्चा भरा है। यह पहली बार है जब संगमा दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे। संगमा पिछले 10 सालों से मेघालय के मुख्यमंत्री हैं।

नामांकन पत्रों की जांच के बाद यह बात निकलकर सामने आई है कि अमपाटी से मुख्यमंत्री संगमा सहित केवल तीन ही उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं, जबकि सोंगसाक से 7 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने अमपाटी से पूर्व ब्यूरोक्रेट बकुल हजोंग को टिकट दिया है जिससे मुकाबला काफी रोचक होने की उम्मीद है। निर्दलीय उम्मीदवार जंयतो मारक को भी एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है।

वरिष्ठ भाजपा नेता और मेघालय के प्रभारी नलिन कोहली ने मुकुल संगमा पर निशाना साधा है। उनका कहना है कि 'दो सीटों से चुनाव लड़ना विश्वास का संकेत नहीं है'। 

 374 उम्मीदवार हैं मैदान में

मुख्य निर्वाचन अधिकारी एफ.आर. खारकोनगोर ने बताया कि  नामांकन पत्रों की जांच के बाद राज्य में कुल  374 उम्मीदवारों के चुनाव लड़ने का रास्ता साफ हो गया है, इनमें से 33 महिलाएं और 85 निर्दलीय उम्मीदवार शामिल हैं। ईस्ट गारो हिल्स जिले के रोंगजेंग विधानसभा में सर्वाधिक 11 उम्मीदवार मैदान में हैं। मेघालय में कुल 60 सीटें हैं। टिकरीकिल्ली और उत्तरी तुरा विधानसभाओं से क्रमश:10-10 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।बता दें कि कांग्रेस को 2013 के विधानसभा चुनाव में 60 में से 29 सीटें मिली थी। संगमा का 2013 में दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। 2008 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 25 सीटें मिली थी। मेघालय में 27 फरवरी को होने वाले चुनाव के लिए 3 मार्च को मतगणना होगी।

मेघालय और नगालैंड में मौजूदा सरकारों की स्थिति उतनी अच्छी नहीं है जितनी होनी चाहिए। मगर भाजपा इस बार तीनों राज्यों के किले को भेदना चाहती है। वहीं कांग्रेस के अलावा वाम दलों ने भी अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है। त्रिपुरा में 18 फरवरी और नगालैंड व मेघालय में 27 फरवरी को मतदान होंगे और नतीजे एक साथ होली के दूसरे दिन यानी तीन मार्च को आएंगे।

उत्तर-पूर्व की राजनीति में चल रही है बदलाव की हवा 

प्रमुख राजनीतिक दलों के लिए मेघालय और नगालैंड के अलावा त्रिपुरा काफी खास है। विशेषकर माकपा के लिए त्रिपुरा बहुत खास है, क्योंकि त्रिपुरा में तीन दशकों से उसकी सरकार है जिसे बरकरार रखने की कोशिश होगी। वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्तर-पूर्व के चुनाव राजनीतिक रूप से बहुत अहम माने जा रहे हैं। देखा जाए तो हाल के वर्षो में जिस तरह से उत्तर-पूर्व की राजनीति में बदलाव की हवा चल रही है। उससे वहां की स्थानीय पार्टियां खुद को बचाने की जद्दोजहद में लगी हैं। उनको डर है कि कहीं उनका हाल भी उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम सिंह यादव की तरह न हो जाए। भाजपा ने असम, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में सत्ता पर काबिज होकर सभी को चकित कर दिया है। इसलिए स्थानीय पार्टियां यह भांप चुकी हैं कि उनका अगला लक्ष्य पूवरेत्तर के राज्य ही हैं।

कांग्रेस की अग्निपरीक्षा

वामदल के लिए अलावा कांग्रेस के लिए भी इन राज्यों के चुनाव अति महत्वपूर्ण हैं। उनकी भी पूरी कोशिश होगी कुछ अच्छा करने की। सभी जानते हैं कि त्रिपुरा में मुख्य मुकाबला हमेशा कांग्रेस और माकपा के बीच रहा है, लेकिन माकपा हमेशा बढ़त बनाने में सफल रही है। यही नहीं, माणिक सरकार के दौरान माकपा की सीटों की संख्या भी बढ़ती रही है। मगर माकपा की जीत के इन आंकड़ों के पीछे ही उसकी कमजोरियों भी दिख रही हैं। दरअसल इन तीनों छोटे राज्यों के विधानसभा चुनाव को 2019 के आम चुनाव की रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि तीनों राज्यों में चुनाव की कमान खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संभालेंगे और सभी जगहों पर चुनावी रैली भी करेंगे।1चुनाव आयोग भी इस बार सर्तकता से काम कर रहा है। आयोग इन राज्यों में पर्ची वाली इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम से चुनाव कराएगा।

इस बार की परिस्थितियां पहले से जुदा

चुनाव आयोग की तरफ से कुछ और भी बदलाव किए हैं जैसे उम्मीदवारों के लिए चुनाव में खर्च की सीमा भी घटाकर इस बार कम की गई है। इस बदलाव पर कुछ विपक्षी पार्टियों ने चुनाव आयोग पर केंद्र के इशारे पर काम करने के आरोप लगाए हैं। चुनाव की तारीखों पर भी विपक्ष ने एतराज जताया है। उसका मानना है कि होली के बाद अगर चुनाव होते तो और अच्छा होता। कई दशकों से त्रिपुरा में माकपा सरकार काबिज रही है, लेकिन इस बार की परिस्थितियां पहले से जुदा हैं, क्योंकि इस बार उसका मुकाबला भाजपा से होने वाला है। वहीं कांग्रेस मुक्त का नारा देती रही भाजपा इस बार वाममुक्त त्रिपुरा की राह पर है। अगर त्रिपुरा हाथ से निकला तो वामपंथियों के पास सिर्फ केरल बचेगा। ऐसा न हो, इसके लिए उनको अभी से कमर कसने की जरूरत है।

By Kishor Joshi