नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। Citizenship Amendment Bill (CAB) 2019: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की जोड़ी ने बुधवार को नागरिकता संशोधन बिल के जरिए सदन में एक नया इतिहास रचा है। इस जोड़ी ने एक बार फिर अपनी रणनीति का लोहा मनवाया है। नागिरकता संशोधन बिल को लेकर एक तरफ सदन से पूर्वोत्तर की सड़कों तक पर भारी विरोध प्रदर्शन हो रहा है। बावजूद गृहमंत्री अमित शाह ने सोमवार को लोकसभा और फिर बुधवार को राज्यसभा में आसानी से बिल को पास करा लिया। इन सबके बीच जनता के मन में कई सवाल हैं। मसलन सरकार ने इतने विरोध के बावजूद दोनों सदन में आसानी से इस बिल को कैसे पास करा लिया? भाजपा पहले से ही इस बिल के पास होने को लेकर कैसे आश्वस्त थी? कांग्रेस के दबाव में बिल के विरोध में खड़ी हुई शिवसेना ने इसके खिलाफ वोट करने की जगह, राज्यसभा से वॉक आउट क्यों किया? आइये हम आपको बताते हैं इन सभी सवालों के जवाब।

बिना लंच ब्रेक 9 घंटे चली राज्यसभा

जैसी की उम्मीद थी बुधवार दोपहर करीब 12 बजे गृहमंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में जैसे ही नागरिकता संशोधन बिल पेश किया, विपक्ष ने जोरदार हंगामा शुरू कर दिया। सरकार के सामने बिल पर बहस कराने के साथ ही बुधवार को ही इसे सदन में पास कराने की चुनौती थी। शुक्रवार को संसद के शीतकालीन सत्र का अंतिम दिन है। इन दो दिन (गुरुवार व शुक्रवार) में भी कई बिल पेश होने हैं। लिहाजा बुधवार को करीब नौ घंटे तक चली राज्यसभा में लंच ब्रेक तक नहीं हुआ। विपक्ष के तमाम संशोधनों पर वोटिंग कराने के बाद बिल रात करीब 8:45 बजे वोटिंग के जरिए राज्यसभा में पास हुआ।

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पक्ष में 125, विपक्ष में 99 वोट

बिल पर लंबी बहस के बाद सभापति वैंकेया नायडू ने देर शाम करीब साढ़े सात बजे बिल पर वोटिंग शुरू कराई। सबसे पहले बिल को सेलेक्ट कमिटी के पास भेजने के लिए वोटिंग हुई। ध्वनिमत से ये प्रस्ताव गिरा तो विपक्ष को भरोसा नहीं हुआ और उसने वोटिंग की मांग कर दी। बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास भेजने के पक्ष में 99, जबकि विपक्ष में 124 वोट पड़े थे। बिल को संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव जैसे ही गिरा, भाजपा सांसदों का उत्साह बढ़ गया। सरकार पहले से ही आश्वस्त थी कि लोकसभा के बाद, राज्यसभा में भी वह 124 से 130 वोटों के साथ बिल को आसानी से पास करा लेगी। हुआ भी ऐसा ही। करीब एक घंटे तक चली वोटिंग प्रक्रिया के बाद नागरिकता संशोधन बिल 99 के मुकाबले 125 मतों से पास हो गया। संसदीय कार्यमंत्री प्रह्लाद जोशी ने जानकारी दी कि उच्च सदन में 125 सदस्यों ने बिल के पक्ष में और 99 सदस्यों ने बिल के विरोध में वोट किया।

ऐसे बिगड़ा विपक्ष का गणित

राज्यसभा में फिलहाल 240 सांसद हैं। इनमें से 10 सांसद बुधवार को अलग-अलग वजहों से सदन से अनुपस्थित थे। बचे 230 सांसदों में से बिल पास कराने के लिए सरकार को 116 मतों की जरूरत थी। इसके लिए सरकार ने पहले से ही तैयारी कर ली थी। राज्यसभा में भाजपा के सबसे ज्यादा 83 सांसद हैं। पार्टी ने पहले ही सभी सांसदों को निर्देश जारी कर दिया था कि बुधवार को वह हर परिस्थिति में सदन में उपस्थिति रहें। पार्टी ने एनडीए के सभी घटक दलों से बिल के पक्ष में वोट करने के लिए पहले ही बात कर ली थी। इसके अलावा सरकार ने सात निर्दलीय और निर्वाचित सदस्यों को भी बिल के समर्थन में वोट करने के लिए तैयार कर लिया था। भाजपा 83 व सात निर्दलीय सदस्यों के अलावा, जेडीयू के छह, अकाली दल के तीन, एआईएडीएमके के 11, बीजेडी के सात, वाईएसआर कांग्रेस के दो और टीडीपी के दो सदस्यों ने बिल के समर्थन में वोट कर विपक्ष का गणित बिगाड़ दिया।

विपक्ष ने भी की थी तैयारी

विपक्षी दलों ने भी बिल को गिराने के लिए पूरी तैयार कर रखी थी। विपक्षी दलों ने अपने सभी सांसदों को एक दिन पहले ही नागरिकता संशोधन बिल पर वोटिंग के दौरान सदन में उपस्थित रहने का निर्देश जारी किया था, लेकिन उनकी तैयारी धरी की धरी रह गई। टीआरएस समेत कुछ दलों ने बिल के खिलाफ वोट करने के लिए व्हिप भी जारी किया था। बिल का विरोध करने वाले दलों में कांग्रेस, टीएमसी, बीएसपी, सपा, डीएमके, आरजेडी, एनसीपी, टीआरएस और लेफ्ट के सांसद शामिल हैं।

वर्षों से BJP का साथ दे रही TRS ने किया विरोध

तमिल की दो क्षेत्रीय पार्टियों वाईएसआरसीपी और टीडीपी ने नागरिकता संशोधन बिल 2019 के पक्ष में वोट दिया। दोनों दलों के राज्यसभा में दो-दो सांसद हैं। वहीं तेलंगाना में भाजपा का साया मानी जाने वाली पार्टी टीआरएस ने इस बार बिल के विरोध में वोट किया। टीआरएस के राज्यसभा में छह सांसद हैं। टीआरएस ने बिल के विरोध में वोट करने के लिए व्हिप जारी किया था। इससे पहले टीआरएस तीन तलाक, आरटीआई संशोधन, नोट बंदी और जीएसटी जैसे मुद्दों पर सरकार का साथ दे चुकी है। बताया जाता है कि टीआरएस ने इसलिए बिल का विरोध किया, क्योंकि पिछले दिनों राज्य के मुख्यमंत्री अपने दिल्ली दौरे के दौरान तेलंगाना की समस्याओं को लेकर प्रधानमंत्री से मिलना चाहते थे। उन्हें प्रधानमंत्री से मिलने का समय नहीं मिल सका था।

10 सांसद रहे अनुपस्थित

बुधवार को नागरिकता संशोधन बिल पर वोटिंग के दौरान 10 सांसद राज्यसभा से अनुपस्थित रहे। इनमें से शिवसेना के तीन सांसद (संजय राउत, राजकुमार धूत और अनिल देसाई) बिल पर चर्चा के दौरान सदन में मौजूद थे, लेकिन वोटिंग से पहले वह वॉक आउट कर गए। इनके अलावा अनुपस्थित रहने वाले सात सांसदों में से दो एनसीपी के माजिद मेनन व वंदना चौहान, सपा सांसद बेनी प्रसाद वर्मा, भाजपा सांसद अनिल बलूनी, असंबद्ध सांसद अमर सिंह, निर्दलीय सांसद वीरेंद्र कुमार और एक अन्य निर्दलीय सांसद हैं। ये सातों सांसद खराब स्वास्थ्य की वजह से अनुपस्थित थे, जिसकी इन्होंने पहले से ही सूचना दे रखी थी।

शिवसेना ने मजबूरी में किया वॉकआउट

करीब 35 वर्षों से एडीए का प्रमुख हिस्सा रही शिवसेना के रिश्ते इन दिनों भाजपा से बहुत अच्छे नहीं है। महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर शिवसेना और भाजपा के रिश्तों में खटास आ चुकी है। शिवसेना अपनी विचारधारा और हिन्दुत्व के मुद्दे से समझौता कर राज्य में एनसीपी व कांग्रेस संग सरकार बना चुकी है। हांलाकि, वह हिन्दुत्व के मुद्दे से दूर दिखना भी नहीं चाहती। यही वजह है कि शिवसेना ने लोकसभा में इस बिल का समर्थन किया तो राज्य में उद्धव ठाकरे की मुख्यमंत्री की कुर्सी हिल गई। कांग्रेस की तरफ से तुरंत चेतावनी दे दी गई कि अगर शिवसेना ने राज्यसभा में बिल का विरोध नहीं किया तो राज्य की सत्ता से वह बेदखल हो सकती है। कांग्रेस के दबाव में शिवसेना ने राज्यसभा में बिल का विरोध करने की सार्वजनिक घोषणा भी कर दी। इसके बाद गृहमंत्री अमित शाह ने अपने सियासी कौशल के जरिए शिवसेना को उसी के जाल में फंसा लिया। उन्होंने पूछा रातों-रात ऐसा क्या हुआ कि शिवसेना के सुर बदल गए। लोकसभा में बिल का समर्थन करने वाली शिवसेना ने अब क्यों रुख बदल दिया है। इसके बाद भी शिवसेना अगर बिल के विपक्ष में वोट देती तो उसकी हिन्दुत्वादी छवि को धक्का लग सकता था। लिहाजा बीच की राह पकड़ते हुए शिवसेना ने खुद को वोटिंग से दूर रखा।

क्या है नागरिकता संशोधन बिल 2019

इस बिल के जरिए नागरिकता अधिनियम 1955 में संशोधन किया गया है। इसके जरिए भारत में शरण लेकर रह रहे पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान के उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता प्रदान करने का रास्ता खुल गया है। इस बिल में तीनों देशों के छह अल्पसंख्यक समुदायों हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई के अवैध प्रवासियों को भारती की नागरिकता प्रदान की जाएगी। वर्तमान कानून में किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिकता लेने के लिए कम से कम 11 साल भारत में रहना अनिवार्य है। संशोधन के बाद ये समय सीमा 11 वर्ष से घटकर छह वर्ष हो गई है। बिल में तीनों देशों के मुस्लिमों को शामिल न करने के कारण विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। वहीं इस बारे में सरकार का तर्क है कि तीनों देशों में मुस्लिम अल्पसंख्यक नहीं हैं और न ही उन पर अल्पसंख्यकों जैसा उत्पीड़न हो रहा है, इसलिए उन्हें बिल में शामिल नहीं किया गया है। गृहमंत्री ने सदन में ये भी स्पष्ट किया कि संशोधन बिल मुस्लिमों के खिलाफ नहीं है। किसी भी मुसलमान को इससे डरने की जरूरत नहीं है।

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