नई दिल्ली [जागरण स्पेशल]। देश की आला खुफिया एजेंसी के दो शीर्ष अधिकारियों के बीच मचे घमासान ने इसकी अंदरूनी कलह को एक बार फिर सामने ला दिया है। सीबीआइ का अंदरूनी विवाद अब जगजाहिर हो गया है और इस झगड़े में आरोपों के छींटे सरकार के दामन तक पहुंच गए हैं। दरअसल, सीबीआइ निदेशक आलोक वर्मा और विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के बीच चल रहे घमासान और एक दूसरे पर लगाए गए आरोपों को देखते हुए सरकार ने सीवीसी की सिफारिश पर आलोक वर्मा से सीबीआइ निदेशक का कामकाज वापस ले लिया और उनकी जगह संयुक्त निदेशक एम नागेश्वर राव को सीबीआइ निदेशक का कामकाज सौंप दिया है। आलोक वर्मा ने इसे चुनौती दी है।

हालांकि इससे पहले भी इसके ऊपर खेमेबाजी के तहत काम करने के आरोप लगते रहे हैं। सीबीआइ के पूर्व संयुक्त निदेशक और हरियाणा कैडर के आइपीएस अधिकारी रहे बीआर लाल ने अपनी पुस्तक 'हू ओंस सीबीआइ : ए नेकेड ट्रुथ' में लिखा है कि देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी किस तरह काम करती है। उनकी पुस्तक के कुछ संपादित अंश:

जैन हवाला केस

बात 1995 की है। जैन हवाला केस में सत्तासीन उच्च अधिकारियों के खिलाफ प्रमाण के बावजूद सीबीआइ कोई मामला नहीं बना सकी। दरअसल एसके जैन ने जब अपने बयान में प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव का नाम लिया तो यह प्रयास किया जाने लगा कि बयान का यह हिस्सा रिकॉर्ड में नहीं जाना चाहिए। खुद सीबीआइ के निदेशक इस मुहिम में लगे थे। जब निदेशक अपनी मुहिम में सफल नहीं हुए तो मामले की जांच कर रही टीम को विभाजित कर दिया गया ताकि जांच के अवांछित तथ्यों को हटाया जा सके। इस प्रकार किसी बड़े नाम से न ही पूछताछ की गई और न ही गिरफ्तार किया गया। केवल जैन के अतिरिक्त कुछ अधिकारियों और विपक्षी राजनीतिज्ञों से पूछताछ हो पाई।

झारखंड मुक्ति मोर्चा केस 1995

इस मामले को ईमानदार एसपी अरुण सिन्हा देख रहे थे। उनको भी तत्कालीन सीबीआइ निदेशक ने आदेश दिया कि इस केस को खास तरीके से पेश किया जाए। उसी आधार पर सुबूतों को भी इकट्ठा किया जाए। जब अरुण सिन्हा ने उनकी बात मानने से इंकार कर दिया तो निदेशक ने उनसे मामला वापस ले लिया और उनका स्थानांतरण दिल्ली से सिलचर कर दिया गया। हालांकि बाद में कोर्ट ने केस अरुण सिन्हा को दे दिया और उनको एवं डीआइजी को निर्देश दिया कि वे कोर्ट को केस की प्रगति रिपोर्ट से अवगत कराएं। साथ ही यह निर्देश भी दिया कि सीबीआइ निदेशक से न ही इस केस के बारे में चर्चा की जाए और न ही उनको कोई कागजात दिखाए जाएं। दरअसल इसमें मुख्य आरोपी कांग्रेस अध्यक्ष पीवी नरसिंह राव थे।

लखूभाई पाठक केस

जब लखूभाई पाठक ने सबसे पहले 1987 में आरोप लगाया था तब पीवी नरसिंह राव का नाम भी लिया था लेकिन राव की पार्टी कांग्रेस सत्ता में थी लिहाजा कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। यह सबको पता है कि इस केस को कई वर्षों बाद रजिस्टर किया गया वह भी तब जब सीबीआइ ऐसा करने को मजबूर हो गई। एक स्पेशल अधिकारी को लखूभाई से केस रजिस्टर करने के लिए ब्रिटेन भेजा गया जिसमें पीवी नरसिंह राव का नाम शामिल नहीं किया गया। इस तरह लखूभाई के आवेदन को संशोधित कर केस रजिस्टर किया गया। ट्रायल कोर्ट में लखूभाई पाठक ने अपने बयान में बताया कि उन्होंने केस में नरसिंह राव का नाम लिया था।

इंडियन बैंक घोटाला 1995

सीबीआइ की एक ब्रांच इस बैंक में 100 करोड़ रुपये घोटाले की जांच कर रही थी। इसी तरह एक दूसरी ब्रांच भी ऐसे ही घोटाले की जांच कर रही थी। इन मामलों में साफ था कि बैंक के चेयरमैन ने अपने अधिकारियों पर दबाव डालकर एडवांस लोन दिलवाए जिनके बारे में पहले से ही पता था कि वे लोन चुकता नहीं कर पाएंगे। इन मामलों की जांच चल ही रही थी कि हमारे पास बैंक के सीएमडी गोपालकृष्णन के सेवा विस्तार से संबंधित कागजात आए। मैंने उनको सेवा विस्तार देने का विरोध करते हुए कहा कि यदि उनको दो वर्षों का सेवा विस्तार दिया गया तो हमको इससे भी बड़े घोटाले की जांच करनी पड़ेगी। इन सारे तथ्यों के बावजूद वित्त मंत्रालय ने उनको सेवा विस्तार दे दिया।

चारा घोटाला 1996

चारा घोटाले की जांच कर रहे संयुक्त निदेशक यूएन बिस्वास की रिपोर्ट को ही सीबीआइ निदेशक ने बदलवा दिया था। उसमें से लालू प्रसाद का नाम हटा दिया गया था। जब पटना हाईकोर्ट में यूएन बिस्वास ने कहा कि यह उनकी रिपोर्ट नहीं है तो कोर्ट ने उनसे कहा कि वह अपनी रिपोर्ट कोर्ट को ही पेश करें। यानी कि कोर्ट ने सीबीआइ निदेशक को विश्वास लायक ही नहीं समझा।  

Posted By: Sanjay Pokhriyal

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