सिर्फ हंगामा नहीं, वोटरों का विश्वास जरूरी... दिल्ली में आक्रामक विपक्ष को उपचुनावों ने दिखाया आईना
उपचुनाव के नतीजों ने विपक्षी दलों को अपनी रणनीति पर आत्ममंथन करने के लिए प्रेरित किया है, खासकर चुनाव आयोग ...और पढ़ें

उपचुनाव नतीजों ने विपक्ष को दिखाया आईना (फोटो-ANI)

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अरविंद शर्मा, नई दिल्ली। चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाकर व्यापक अभियान चलाने एवं सड़कों पर विरोध जताने वाले विपक्षी दलों को छह सीटों के उपचुनाव के नतीजे आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं। उत्तर प्रदेश और पंजाब में विधानसभा चुनाव सामने हैं। ऐसे में विपक्ष के सामने दोहरी चुनौती है।
उसे समझना होगा कि संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ शोर मचाने से अधिक जरूरी जनता के बीच जाकर विश्वास अर्जित करना है। विपक्ष इसे अगर नहीं समझता है तो आगामी चुनावों में भी उसके आंदोलनों एवं चुनावी नतीजों के बीच फासला बना रह सकता है।
बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर भाजपा की बड़ी जीत तथा असम की नवगांव संसदीय सीट पर उसकी सफलता इसलिए महत्वपूर्ण है कि इन दोनों राज्यों में हाल के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा सत्ता में है। इन नतीजों से उसे अपने जनाधार और राज्य सरकार के प्रति समर्थन का दावा मजबूत करने का अवसर मिला है। पुडुचेरी की थट्टानचावडी सीट पर भाजपा के सहयोगी दल की जीत ने भी सत्तारूढ़ गठबंधन को राहत दी है।
दूसरी ओर, तमिलनाडु की धारापुरम और मदुरंतकम सीटों पर राज्य में सत्तारुढ़ पार्टी टीवीके की जीत को भाजपा के विरुद्ध जनादेश नहीं माना जा सकता। राज्य में भाजपा का जनाधार नहीं है। यहां वह सीधे मुकाबले में भी नहीं थी। यह भी सही है कि नतीजों को देशव्यापी सियासी रुझान नहीं माना जा सकता, लेकिन विपक्ष की रणनीति पर सवाल जरूर उठते हैं।
चुनाव आयोग के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर एक होकर आंदोलन चलाने वाले विपक्षी दल क्या चुनाव वाले राज्यों में भी एकता दिखाई। असम एवं बंगाल में विपक्षी दलों में कोई तालमेल नहीं दिखा। अपने आरोपों को भी वोटरों के बीच सत्यापित नहीं कर पाए। क्या उन्होंने स्थानीय मुद्दों, प्रत्याशियों के चयन और शासन के विकल्प पर उतना ही ध्यान दिया, जितना चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाने में लगाया? इन सवालों के जवाब विपक्ष को अपने भीतर तलाशने होंगे।चुनावी व्यवस्था में गड़बड़ियों पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है।
यदि अनियमितताओं के प्रमाण हैं तो उनकी जांच और कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन आरोपों को साक्ष्यों के साथ उठाने और कमजोर तर्कों के साथ हंगामा मचाने के बीच अंतर है। प्रत्येक हार को व्यवस्था की बेईमानी के रूप में प्रचारित करने पर सियासी जवाबदेही का प्रश्न पीछे छूट सकता है। मतदाताओं के बीच यह संदेश भी जा सकता है कि विपक्ष अपनी कमजोरियों की समीक्षा करने के बजाय उनका दोष संस्थाओं पर डाल रहा है।
हालांकि संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर निगरानी भी जरूरी है, मगर संस्थाओं के प्रति अविश्वास को राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए साक्ष्यों की जरूरत होती है। विपक्ष को चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखने के साथ बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और विकास जैसे मुद्दों पर भी जनता के बीच जाना चाहिए था। केवल साझा विरोध से विपक्षी एकता नहीं बनती और न ही सत्ता विरोधी नाराजगी अपने आप वोट में तब्दील होती है।
