माला दीक्षित, नई दिल्ली। लाखों भक्तों की अटूट आस्था और विश्वास यह साबित करने को काफी है कि अयोध्या में यह स्थल भगवान राम का जन्मस्थान है। कोर्ट घोषित करे कि पूरी जन्मभूमि भगवान राम की है और भगवान रामलला को ही उसका कब्जा दे दिया जाए।

ये दलीलें भगवान रामलला विराजमान की ओर से राम जन्मभूमि पर मालिकाना हक का दावा पेश करते हुए सुप्रीम कोर्ट में दी गईं। बुधवार को कोर्ट ने पक्षकारों के वकीलों से अपना-अपना दावा साबित करने को लेकर कई सवाल किये और सबूत मांगे।

कोर्ट ने यह भी पूछा कि आस्था के केन्द्र धार्मिक व्यक्तित्व जैसे पैगम्बर या ईसामसीह के जन्म स्थान के बारे में इसी तरह का कोई मुकदमा किसी कोर्ट में चला है कि नहीं। मामले में बहस गुरुवार को भी जारी रहेगी।

मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधानपीठ अयोध्या राम जन्मभूमि विवाद पर नियमित सुनवाई कर रही है। पीठ के अन्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे, डीवाई चंद्रचूड़, अशोक भूषण और एस अब्दुल नजीर हैं। बुधवार को हिन्दू पक्ष निर्मोही अखाड़ा और भगवान राम विराजमान की ओर से दलीलें रखी गईं।

रामायण में है जन्मभूमि का जिक्र

रामलला की ओर से उनके निकट मित्र द्वारा दाखिल किये गए मुकदमें मे जन्मस्थान पर मालिकाना हक का दावा करते हुए वरिष्ठ वकील के. परासरन ने कहा कि वाल्मीकि रामायण में तीन जगह जिक्र है कि भगवान राम अयोध्या में जन्मे थे।

उन्होंने कहा कि पूरी जन्मभूमि भगवान राम की है। इस बारे में उन्होंने 1776 में भारत आये यात्री के वर्णन का हवाला भी दिया। परासरन ने कहा कि इतने लंबे समय के बाद इस बात का सबूत देना मुश्किल होगा कि भगवान राम ने यहां जन्म लिया था, लेकिन लाखों हिन्दू भक्तों की इस स्थान पर अटूट आस्था और विश्वास यह साबित करने के लिए काफी है कि यह राम जन्मभूमि है।

धार्मिक व्यक्तित्व के जन्मस्थान पर कभी उठा है सवाल

कोर्ट ने परासरन से सवाल किया कि क्या कभी पहले किसी धार्मिक व्यक्तित्व जैसे पैगम्बर या ईसामसीह के बारे में ऐसा सवाल कोर्ट में आया है। क्या कभी ईसामसीह के बेथलहम में जन्म लेने का सवाल कोर्ट में रहा है। परासरन ने कहा कि उन्हें इस बारे में पता नहीं है वह पता करके बताएंगे।

क्या मूर्ति की हुई है कार्बन डेटिंग

कोर्ट ने परासरन से पूछा कि क्या भगवान की मूर्ति का कालखंड परखने के लिए उसकी कार्बन डेटिंग हुई है। हालांकि परासनर ने इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया वह उस दौरान रिसीवर की रिपोर्ट का हवाला कोर्ट को दे रहे थे। तभी कोर्ट ने अयोध्या में 22 और 23 दिसंबर 1949 की रात मूर्तियां रखने से संबंधित सवाल पूछने शुरू किये।

कोर्ट ने पूछा कि क्या मूर्तियां रखा जाना गलत नहीं था और वह गलती लगातार जारी नहीं रही। परासरन ने कहा कि ऐसा करना गलत था कि नहीं यह इस पर निर्भर करता है कि वह ढांचा (जो ढह गया है) मंदिर था या मस्जिद।

उन्होंने कहा कि अगर यह मान भी लिया जाए कि ऐसा होना लगातार चलने वाली गलती थी तो भी कोर्ट ने उसमें दखल देकर और वहां रिसीवर नियुक्त करके उस गलती को रोक दिया था। इस बीच जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि मूर्तियां पहले चबूतरे पर रखी थीं जिन्हें उठाकर अंदर रखा गया था।

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप

Posted By: Bhupendra Singh

अब खबरों के साथ पायें जॉब अलर्ट, जोक्स, शायरी, रेडियो और अन्य सर्विस, डाउनलोड करें जागरण एप